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Apr
13

अपण धरोहर अपण कोशिश: माणागाँव (बद्रीनाथ)

हिन्दू धर्म के पावन तीर्थस्थलों में एक वैष्णव तीर्थ बद्रीनाथ के समीप स्थित है- बद्रीनाथ से पांच किलोमीटर आगे है मणिभद्रपुर.. जिसे अब माणा गांव कहा जाता है। माणा गांव, भौगोलिक व सामरिक नजरिए से तिब्बत-चीन सीमा पर स्थित  भारत का आखिरी गांव भी है। यहां भारतीय सेना मुस्तैदी से तैनात है। पहले भारतीय सेना माणा गांव के बीच में ही थी लेकिन  1968 में ग्लेशियर गिर जाने से कई जवानों की मौत हो गई इसलिए अब सेना सुरिक्षत स्थान पर है। पहले माणा गांव में सीमा पार से व्यापार भी होता था लेकिन 1962 के चीन हमले के बाद व्यापार बंद हो गया है। माणा गांव के स्थानीय लोग भी सर्दी में पहाड़ से नीचे चले जाते हैं। ये लोग बहुत मेहनती होते हैं। भेड़-बकरों के ऊन से कई तरह के सामान बनाते हैं और यात्रियों को बेचते रहते हैं। उनके छोटे-छोटे घरों के पास जरा भी जगह खाली मिल गई तो सब्जियां वगैरह उगा लेते हैं।
वहीं, यहां पर पौराणिक महत्व के अनेक पवित्र स्थान भी हैं। जिनमें से एक पवित्र  स्थान  है ब्रह्मकपाल । ब्रह्माकपाल पर जाकर लोग पुरखों को पिण्डदान करते हैं और अलकनंदा में तर्पण करते हैं। पुराणों में लिखा है कि आसत्त ब्रह्माजी पर क्रोधित भगवान शिव ने उनका एक  मस्तक काट डाला तो वह कटा हुआ शीश उनके त्रिशूल से चिपक गया। शिव के बद्रीनाथ आने पर वह मस्तक त्रिशूल से छूटकर अलकनंदा में गिरा। इसीलिए उस स्थान को ब्रह्माकपाल कहते हैं। मंदिर के पास तप्त कुंड भी हैं, इसका जल केदारनाथ के समीप वाले गौरीकुंड से अधिक गर्म है। गौरीकुंड में स्नान करना सुखद लगता है लेकिन बद्रीनाथ के तप्तकुंड में अधिक देर रुकने पर जल की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती।

मणिभद्रपुर से होकर ही पांडवों ने सशरीर स्वर्गारोहण किया था। उनके स्वर्गारोहण की  कथा से जुड़ा है  यहाँ का सरस्वती नदी पर बना भीमपुल। यह अचंभित करने वाला पाषाण पुल है। यह पुल किसी लकड़ी या लोहे की सामग्री से नहीं बना है, बल्कि पत्थर की एक बड़ी शिला से नदी के दोनों किनारों को जोड़कर बनाया गया है। इसके नीचे से सरस्वती नदी बहती है।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इतने बड़े और भारी पत्थर से पुल बनाने का यह कारनामा पांडू पुत्र महाबली भीम द्वारा किया गया था। इससे जुड़े प्रसंग के मुताबिक जब पाण्डव स्वर्ग की ओर जाने के लिए इस स्थान पर पहुंचे तो कुंती व द्रोपदी सरस्वती नदी को पार नहीं कर पाए । जब सरस्वती नदी ने पांडवों द्वारा रास्ता मांगने पर रास्ता देने से इंकार किया, तब बलशाली भीम ने एक भारी पत्थर रखकर कुंती व द्रोपदी के लिए नदी पर पुल बना दिया। इसलिए इस पुल का नाम भीम पुल हो गया। देश भर में लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी को मणिभद्रपुर में इस तरह प्रवाहित होते देखना मन को  प्रसन्नता से भर देता है। यहां से कुछ ही मीटर पर दो स्थानों  से पानी बहता है.. माना जाता है यह मानसरोवर का जल है।
इस पुल के नीचे से अदृश्य मानी जाने वाली सरस्वती नदी बहुत वेग व शोर के साथ बहती है। यह नदी आगे चलकर अलकनंदा में मिलकर अदृश्य हो जाती है। इलाहाबाद में त्रिवेणी संगम पर गंगा, यमुना व सरस्वती के मिलन में भी यह नदी गुप्त मानी जाती है।
इससे भी पौराणिक मान्यता यही जुड़ी है कि जब सरस्वती के रास्ता देने से इंकार करने पर भीम ने गुस्से से जमीन पर अपनी गदा से प्रहार किया तो,सरस्वती नदी पाताल लोक में चली गई।

मणिभद्रपुर होकर ही पांडवों ने सशरीर स्वर्गारोहण किया था। अठारह पुराणों का रचना स्थल भी मणिभद्रपुर ही है। यहां गणेश और व्यास गुफाएं हैं। अब दोनों जगह मंदिर बना दिए गए हैं। लेकिन मूल गुफा स्पष्ट परिलक्षित होती हैं। पहाड़ी चट्टानों के नीचे आश्रय स्थल जैसा है। मान्यता है कि वेदव्यास ने यहीं पर अठारह पुराण लिखवाए और भगवान गणेशजी ने लिखे।

चित्र सौजन्य: गूगल

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