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Jun
19

अपण धरोहर अपण कोशिश: केदारताल (उत्तरकाशी)

हिमालय के सुंदरतम स्थलों में से एक है केदारताल। मध्य हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित यह ताल न केवल प्रकृति की एक विशिष्ट रचना है बल्कि अनूठे नैसर्गिक सौंदर्य का चरम भी है। जोगिन शिखर पर्वत श्रृंखला के कुछ ग्लेशियरों ने अपने जल से पवित्र केदारताल को निर्मित किया है। यह समुद्र तल से १५,००० फुट से कुछ अधिक ऊंचाई पर स्थित है। इसके पास ही मृगुपंथ और थलयसागर पर्वत हैं जो अपनी चोटियों के प्रतिबिंब से ताल की शोभा में चार चांद लगाते हैं। केदारताल से केदारगंगा निकलती है जो भागीरथी की एक सहायक नदी है। कहीं शांत और कहीं कलकल करती यह नदी विशाल पत्थरों और चट्टानों के बीच से अपना रास्ता बनाती है। अपने आप को पूर्ण रूपेण गंगा कहलाने के लिए गंगोत्री के समीप यह भागीरथी में मिल जाती है।

गंगोत्री से तीस कि.मी. दुर्गम हिम शिखरों में केदार ताल झील अपने दिव्य सौंदर्य के लिए विख्यात है। इस उच्च हिमालय के क्षेत्र में यह अलौकिक झील प्रकृति की अद्भुत संरचना है। निर्मल नीले जल वाली केदार ताल झील के बारे में जनश्रुति है कि समुद्र मंथन से निकले विष को पीने के बाद भगवान शिव ने अपने कंठ की भीषण ज्वाला को केदार ताल का जल पीकर ही शांत किया था। गढ़वाली लोग इसे ‘अछराओं का ताल’ भी कहते हैं। समुद्र तल से 4,050 मीटर ऊंचाई पर गंगोत्री से 19 कि.मी. दूर भागीरथी को पार करते हुए केदार गंगा के किनारे पैदल यात्रा मार्ग है। केदार ताल के सामने थल सागर है, बायीं तरफ सुमेरु पर्वत और शिवलिंग शिखर है। अक्सर ट्रेकिंग करने वालों के लिये प्रारम्भ में केदारताल का रास्ता कठिन है। परन्तु 8-10 किलोमीटर चलने के उपरान्त व्यक्ति रास्ते की कठिनाइयों का अभ्यस्त होने लगता है और मार्ग भी सुगम होने लगता है। हालांकि ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी जैसी समस्याओं को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। ऐसे क्षेत्रों में चलने का मूलमन्त्र है धीरे चलना, ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिये अधिक से अधिक पानी पीना, ग्लूकोज लेना और कभी भूखे नहीं रहना। आप कितने भी होशियार हों, सुरक्षित चलने में ही समझदारी है। ऊंचाई पर अज्ञानतावश लोग संकट में पड जाते हैं।

इस यात्रा में गंगोत्री और ऊपर की ओर चलते हुए प्रचुर मात्रा में भोजपत्र के वृक्ष और अन्य कई प्रकार के पेड-पौधे मिलते हैं। सारे क्षेत्र में ‘शिवजी की धूप’ नामक एक बूटी फैली हुई है। इसकी घासनुमा पत्तियों को जलाने पर गुग्गल धूप जैसी सुगन्ध से वातावरण महक उठता है। स्थानीय लोग इसे बडा पवित्र मानते हैं। बिच्छू बूटी भी यहां बहुत अधिक मात्र में पाई जाती है। ऊंचाई के साथ-साथ वनस्पति भी लुप्त प्रायः होने लगती है। केवल घास, पहाडी पौधों के झुरमुट, झाडियां और छोटे-छोटे पौधे मिलते हैं। वन्य प्राणियों में प्रायः भरल हिरण छोटे-बडे झुंडों में दिखाई दे जाते हैं। एक विशेष प्रजाति का बाज (फाल्कन) यहां पाया जाता है जो बर्फीले क्षेत्रों में रहता है। इसके अतिरिक्त कौवे के आकार के पीली चोंच और काले रंग के पक्षी प्रायः दिखाई देते हैं। गंगोत्री से केदारताल की दूरी तय करते हुए 12 किलोमीटर के बाद केदार खडक में पहला पडाव डाला जाता है। दूसरे दिन भोज खडक पहुंचते हैं। यह स्थान केदार खडक से लगभग दस किलोमीटर दूर है। तीसरे दिन आठ किलोमीटर चलने के पश्चात 6772 मीटर ऊंचे भृगुपथ शिखर और ऊंचे थलय सागर शिखर के दर्शन होते हैं । और कुछ समय बाद आप भव्य केदारताल पहुँच जाते हैं । कुछ लोग इस मार्ग को दो दिन में तय करते हैं।

यहाँ पहुचने के लिए ऋषिकेश या उससे पहले हरिद्वार तक उत्तर भारत के सभी प्रमुख शहरों से रेल व बस, दोनों से पहुंचा जा सकता है। निकट के शहरों से टैक्सी से भी जा सकते हैं। दिल्ली से ऋषिकेश का सफर लगभग छह घण्टे का है। ऋषिकेश से उत्तरकाशी केवल सडक द्वारा लगभग 8 से 9 घण्टे में पहुंचा जा सकता है। उत्तरकाशी में कम से कम एक दिन ठहरना उचित रहता है। यहां सस्ते होटल उपलब्ध हैं। उत्तरकाशी से गंगोत्री की दूरी 99 किलोमीटर है। इस सफर में 5 से 6 घण्टे लगते हैं। गंगोत्री में ठहरने के लिये गढवाल मंडल विकास निगम का होटल, साधुओं की धर्मशालाएं और अन्य छोटे होटल उपलब्ध हैं

चित्र सौजन्य: गूगल

 

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