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Jun
29

काश, केदारनाथ का वह कुंड न दबा हो !

मेरी केदारनाथ की यादें कोई आधी सदी पुरानी हैं पर आज भी ताज़ा हैं | अगस्त्यमुनि से पैदल यात्रा, लगभग ३०००’ से ११५००’ तक की धीरे धीरे कठिन और दुर्गम होती चढाई जिसका अंतिम चरण तो यात्री के धैर्य और ऊर्जा की परख होता था |

आज कौन विश्वास करेगा कि तब केदारनाथ में रात में रहने का रिवाज़ नहीं था | कुछ साधु – सन्यासी, पुजारी – रावल, देवालय के सेवक, उनसे जुड़े कुछ पेशेवर और कुछ गिने-चुने ढाबे वाले ही वहाँ टिकते थे | यात्री सुबह गौरी कुंड से चलकर केदारनाथ पहुँचते और दर्शन करने के बाद शाम तक गौरीकुंड या रामवाडा लौट आते | जो लोग इतनी लंबी पैदल यात्रा ( १४ + १४ कि मि )करने की स्थिति में न हों वे रामवाडा में पडाव करते और केदारनाथ के दर्शन कर वापिस रामवाडा या गौरीकुंड लौटते थे | यदि किसी विवशता से रुकना ज़रूरी हो जाए तो कोई होटल या गेस्टहाउस नहीं, पंडे व्यवस्था करते थे | उनके पास यात्रियों द्वारा दान में दिए गए बिस्तर, रजाइयां या कम्बल इतने होते थे कि ऐसे यात्रियों को कठिनाई नही होती थी | कुछ धर्मशालाएं भी थीं पर वही बात कि सामान्य स्थिति में वहाँ टिकने का रिवाज नहीं था !

एक बहुत वृद्ध सन्यासी वहाँ के एकमात्र स्थायी निवासी थे | जब स्वयं केदारनाथ जी उखीमठ को अपने लावलश्कर और सेवकों के साथ प्रस्थान कर लेते, पक्षी और शायद कीट-पतंगे भी पलायन कर चुकते, तब भी ये साधू केदारनाथ नहीं छोडते थे, उनके दर्शन किए, कुछ पूछा जिसका उत्तर कुछ ही शब्दों में मिला |उनके साथ न कोई चेला, न कोई पाला हुआ सेवक | जानकर आश्चर्य हुआ |पंडाजी ने बताया ये वर्षों से यहाँ हैं | उखीमठ को जाने से पहले इनके लिए धूनी और जलावन की व्यवस्था कर दी जाती है और खाने के लिए मंदिर के चढावे से सूखे मेवे कुटिया में रख दिए जाते हैं | छह माह बाद जब कपट खुलते हैं तो अक्सर ऐसा भी होता है कि इनकी कुटिया बर्फ में दबी होती है ! वे साधू इस लिए भी याद आते हैं कि आज के ‘अवतारी भगवान’ किस्म के बाबाओं की तुलना में वे कितने अलग थे| इतनी बड़ी कष्टकारी तपस्या और बिना किशी शोर के !

मैं पंडाजी की अनुमति से दो रात वहाँ टिका था कि भैरव मंदिर और वासुकी ताल देख सकूँ | पहले दिन भैरव मंदिर और आसपास के बुग्याल देखने के बाद अगले दिन वासुकी ताल देखने की योजना थी | दूसरे दिन का अनुभव अद्भुत और अविस्मरणीय है! मैं अंध आस्तिक कभी नहीं रहा, तब तो उम्र और संगत भी परंपरा की तर्कसम्मत व्याख्या करने की थी; पर जो हुआ-देखा वह आज भी उतना ही अबूझ है, उतना ही अनुत्तरित |

पंडा जी मुझे मंदिर से कुछ ही कदम ऊपर बगल की ओर ले गए| एक छोटा -सा कुंड, मुश्किल से चार वर्गफुट आकार और शायद इतना ही गहरा | कुछ अनगढ़ से पत्थरों की छतरी से छाया हुआ जहाँ एक बार में दो-तीन आदमी ही खड़े रह सकते हैं | उस शांत वातावरण में पंडाजी ने कहा, “आप थोड़े ऊँचे स्वर में ‘हर-हर-गंगे’ या ‘नमः शिवाय’ बोलिए” | मैंने ऐसा किया और आवाज गूंज ही रही थी कि कुंड की गहराई से पानी के बीसियों बुलबुले कुंड की तलहटी से सतह की ओर उठने लगे | मुझे विश्वास नहीं हुवा पर मैंने जितनी बार कहा उतनी बार यही हुआ ! गूँज समाप्त होने की थोड़ी देर बाद सतह पर के बुलबुले भी विलीन हो जाते |कोई उत्तर आस्था या अंधश्रद्धा से बाहर सूझा ही नही था, तर्कबुद्धि साथ नहीं देती थी |

आज समझ में आता है और सोचता हूँ कितना संवेदनशील और नर्म-नाजुक था वहाँ का पर्यावरण ! जो एक विशेष स्वर कंपन में भी कांप उठता था! और इस आधी सदी की भीषण हलचलों ने उसे कितना कंपाया होगा ! शायद उसी के संचयी ( cumulative ) परिणाम को हम भोग रहे हों आज | कौन जाने !

मैं मन में मना रहा हूँ काश, वह छोटा-सा कुंड आज की जलप्रलय में न दबा हो | अपने मन को समझा रहा हूँ जैसे मंदिर बच गया वह भी बच गया होगा ! मुझे चमत्कारों पर सहज ही विश्वास तो नहीं होता, पर कौन जाने, तर्क के परे भी तो कुछ होता है | फिर लगता है जब हज़ारों लोग नहीं बचाए जा सके, उनके लिए कोई चमत्कार नही हुआ तो उस ‘खबटोले’ के लिए इतना मोह क्यों – “इस धनु पर ममता केहि हेतू”, पर दिल है कि मानता नहीं !

तो उस दिन कुंड का चमत्कार देखने के बाद बासुकी ताल के लिए निकलते – निकलते देर हो जाने पर पंडा और कुछ सयाने लोगों ने मना कर दिया यह कहकर कि आजकल दोपहर बाद मौसम खराब हो जाता है आप मुसीबत में पड़ जाएँगे | वे लोग वैज्ञानिक नहीं, साधारण पढ़े लिखे थे पर अनुभवजन्य ये मौसम की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई थी और मैं सकुशल लौट आया था |

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