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Aug
16

सन 2100 ई . मा सम्पादकीय टिप्पणी

सन 2100 ई . मा सम्पादकीय टिप्पणी

भोळ दिख्वा : भीष्म कुकरेती
ब्याळि सुपिनम मीन सन 2100 को एक क्षेत्रीय अखबारौ सम्पादकीय पौढ़ -

आज गढ़वाळि-कुमाऊंनी समाज एक संक्रमण काल से गुजरणु च। समाज मा अर संस्कृति मा नई नई कुरीति ऐ गेन अर सरकार अर हमारा बुद्धिजीवी तमाशा दिखणा छन ।
क्या सुंदर हमर गढ़वाळि लोक हजारो की तादातम पलायन करदा छा , दीं दुनिया दिखदा छा अर रूप्या कमांदा छा । आर्थिक दृष्टि से हम सम्पनता की तरफां चली गे छया । पण अब बिजोग पड़ी गे कि गढ़वाल से पलायन ही नि होणु च उल्टां प्रवासी अपण अपण गाऊं मा बसणा छन । यो प्रवास्युं अपण गाऊं मा पुनर्वास से हमारी लोक संस्कृति पर बडो धक्का लगणु च । हम सरा दुनिया से संस्कृति उधार लीण गीजि गे छा अब पलायन नि होण अर प्रवास्युं अपण अपण गाऊं मा बसण से हमारी संस्कृति मा बदलाव हूण कम ह्वे ग्यायी जो हमारी लोक संस्कृति बान एक बडो खतरा च । संस्कृति मा यदि तेजी से बदलाव नि होलु तो दुनिया हम तैं कूप-मंडूपी लोक बुलणा छन। हरम संस्कृति उधान लीण बंद करण पर नेता लोग संवेदनहीन हवे गेन अर हमारा विचारक मूक दर्शक ह्वे गेन ।
लोक गीत हमेशा ही संस्कृति का प्रतीक होंदन अर संस्कृति संवाहक होन्दन । हमारी फुर्की बांद , लालू रुमाल जन श्रंगारिक लोक गीत रच्याण बंद ह्वे गेन अर अब स्वदेश प्रेम , समाज सुधारक विषय का भोंडा गीतुंन फुर्की बांद , लालू रुमाल जन श्रंगारिक लोक गीतुं जगा लहे आल । देव रूप गजेन्द्र राणा की लगायीं डाळी बनि बनि श्रृंगारिक गीत बजार मा लाणि छे अर अचकाल राक्षसनुमा नरेंद्र सिंह नेगी का समर्थक फिर से स्वदेश प्रेम , समाज सुधारक विषयी गीत गाण बिसे गेन । गजेन्द्र सिंह राणा का गीत हमारी संस्कृति का परिचायक छा अर अब हम अपणी संस्कृति छोड़ि दुसर संस्कृति नकल करणा छंवाँ । कुज्याण नई संस्कृति को क्या हाल होलु ? नेता सियां छन , बुद्धिजीवी बौंहड़ पड़्याँ छन ।
परिधान हमारि पछ्याणक हूंदी । क्या सुन्दर हम लोग अपण लोक परिधान जन कि जींस -पैंट -बरमुदा पैरदा छा अर अब नई साखी , नई जनरेसन धोती -कुर्ता अर मॉडर्न जनानी -बेटी -ब्वारि साडी -बिलौज पैरण गीजि गेन । परिधान का मामला मा गढ़वाऴयूँ मध्य जो ह्रास ये दशक मा दिखे ग्यायि वो ह्रास आज तलक इतिहास मा नि दिखे ग्यायि । हमर समाज एक ब्लंडर करणम मशगूल च अर हमार नेता अर विचारक , समाज सुधारक चुपचाप संस्कृति विनाश दिखणा छन ।

खाणा मामला मा हमारो लोक भोजन जन कि चाऊ -माऊ , भौं भौं किस्मौ सैंडविच, बर्गर, पिजा, आदि लोक भोजन प्रचलित छौ अर यु खाणा हमर संस्कृति को अभिन्न अंग छौ पण काण्ड लगिन नै जमानो अपर कि हमर लोग अब चुनै रुट्टी , फाणु -बाड़ी -झंग्वर, कपिलो -कंडाळी जन भोजन पर ढबी गेन । कुनगस त या होणु च कि होटलूंम अब ढुंगळ -उड़दौ दाळ उपलब्ध ह्वे ग्यायि । लोग अपण लोक भोजन चाऊ -माऊ , भौं भौं किस्मौ सैंडविच, बर्गर, पिजा, आदिकी बेज्जती से आतंकित छन उख हमारा राजनेता अर जणगरा भोजन संस्कृति मा बदलाव का मामला मा सर्वथा उदासीन छन ।
पैल हम लोगुंन हिंदी तैं मातृभाषा अर अंग्रेजी तैं पितृभाषा घोषित करी आल छौ। हमन हिंदी अर अंग्रेजी की पूजा करिक ग्लोबलाइजेसन का हिसाब से हमन गढ़वाळि -कुमाऊंनी भाषा तैं ख़तम ही करी दे छौ पण कुछ उछद्यूं कुकर्मो से अब हर मैना दस बारा गढ़वाळि किताब छप्याणि छन , गाऊं अर शहरुं माँ गढ़वाळि -कुमाऊंनी सिखाणौ कोचिंग क्लास खुली गेन अर नै पीढ़ी गढ़वाळि -कुमाऊंनी भाषा सिखणम अभिमान महसूस करणी च । हमारी मांग च कि राष्ट्रीय भाव -विरोधी यूँ गति विध्युं जन कि गढ़वाळि -कुमाऊंनी सिखाणौ कोचिंग क्लासुं तैं तुरंत बंद करे जावो । अचकाल गढ़वाळि -कुमाऊंनी फिलम अर वीडिओ कसेट धड़ले से बिकणा छन अर इन बुल्याणु च बल गढ़वाळि -कुमाऊंनी फिलम उद्योग भौति लाभ कमाणु च । हमारी मांग च बल गढ़वाळि -कुमाऊंनी फिल्मो पर दस गुना जादा टैक्स लगाए जावो जां से गढ़वाळि -कुमाऊंनी फ़िल्म उद्यम बंद हवे जावो ।
इंटरनेट पर अब गढ़वाळि -कुमाऊंनी लोग हिंदी अर अंग्रेजी छोड़िक अपणी बोली तैं प्रमोट करणा छन । या भावना हिंदी अर अंग्रेजी प्रसार का वास्ता एक जघन्य अपराध च पण भारत सरकार ये जघन्य अपराध तैं रुकणौ कुछ नी करणी च ।

इनि भौत त सि बात छन जो हमारी संस्कृति तैं खतम करणा छन अर सरकार कु कर्तव्य च कि संस्कृति -विध्वंसक माध्यमों पर तुरंत रोक लगाए जावो । बुद्धिजीवी -चिंतकों को कर्तव्य च कि संस्कृति -विध्वंसक चिंगारी तैं रुकणो बान आन्दोलन की तैयारी कारन ।

Copyright@ Bhishma Kukreti 16/8/2013

[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी के जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के पृथक वादी मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण वाले के भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]

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