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Mar
07

उत्तराखंडी होली

वैसे तो होली लगभग सभी जगह बड़ी ही धूम-धाम से मनाई जाती है, पर उत्तराखंडी होली की बात ही कुछ और है. होली हो और उसमें संगीत की बात न हो सुनने में  कुछ फीका सा लगता है| संगीत के बिना होली का आनंद न के बराबर लगता है|  इसलिए उत्तराखंडी होली में संगीत का अपना एक विशेष स्थान है. होली में संगीत के समावेश से इसका आनंद दो गुना हो जाता है|

उत्तराखंड में तीन प्रकार की होली मनाई जाती है. १-खड़ी होली २- बैठक होली ३- महिला होली . कुछ स्थानों में खड़ी होली को “बंजारा होली” के नाम से भी पुकारा जाता है. खड़ी होली में मुख्यतः सभी पुरुष भाग लेते हैं. बैठक होली पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा मनाई जाती है. महिला होली जैसा  कि नाम से ही पता चलता है केवल महिलाओं के लिए होती है.

उत्तराखंड में मुख्य होली का प्रारंभ फाल्गुन मास की एकादशी से होता है . इस दिन भद्रारहित काल में देवी-देवताओं पर रंग डालकर पारंपरिक तरीके से विधिपूर्वक चीर बांधी जाती है. चीर बांधने के लिए पद्म्न की एक टहनी (जिसे उत्तराखंड में ‘पैयाँ’ के नाम से जाता जाता है) पर रंग-बिरंगे कपड़ों के कुछ टुकड़े बांधे जाते हैं चीर बांधने के लिए किसी ब्राह्मन को बुलाया जाता है जो विधिपूर्वक मंत्रौच्चार करते हुए चीर बंधन करता है . चीरबंधन के लिए हमारे पूर्वजों द्वारा एक स्थान निश्चित किया हुआ होता है जिसे उत्तराखंडी भाषा में ‘खई’ या ‘खोई’ के नाम से पुकारा जाता है  हर वर्ष चीर वहीँ पर बांधी जाती है और होली की शुरुआत भी वहीँ से की जाती है. होली के दौरान किये जाने वाले सभी महत्वपूर्ण कार्य यहीं पर संपन्न किये जाते हैं. चीर बांधने का कार्य पूरा होने के बाद लोगों या ‘होल्यारों’ द्वारा अपने होली के कपड़ों पर रंग डाला जाता है. होली में मुख्यतः सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहना जाता  है और सर पर गाँधी टोपी पहनी जाती है.

कहीं-कहीं पर जिसके पास अपनी व्यक्तिगत चीर नहीं होती है वहां पर सामूहिक रूप से चीर बांधी जाती है. यह चीर बांस के डंडों पर बांधी जाती है,जिसमें पैयाँ की एक टहनी, जों की कुछ बालियाँ और खीशे के फूल का होना जरूरी होता है.

पुराने समय से चीर बांधने की अनुमति कुछ ही गावों को है . हमारे पूर्वज चीर को शक्ति का प्रतीक मानते थे  जिस गाँव के पास अपनी चीर होती थी उस गाँव को शक्तिशाली गाँव के रूप में देखा जाता था. चीर के सन्दर्भ में ऐसा माना जाता है कि यदि इसके धागे या कतरे को किसी दुसरे गाँव द्वारा चुरा लिया जाता है तो चीर उस गाँव की हो जाती थी जिसके द्वारा यह चुरायी जाती थी और चोरी किये जाने वाले गाँव से चीर बांधने का अधिकार छिन जाता था इसलिए जिस गाँव में चीर बांधी जाती है उस गाँव के लोग रात भर इसका पहरा देते हैं,जिससे कि कोई इसे चुरा न ले जाय.

वैसे बैठक होली की शुरुआत पौष मास के प्रथम रविवार से मानी जाती है परन्तु उत्तराखंड में बैठक होली की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है. पौष मास में इसका स्वरुप और कथ्य कुछ और होता है जो समय के साथ-साथ बदलते रहता है, बसंत पंचमी तक केवल आध्यात्म से सम्बंधित होली गाई जाती है जो शिवरात्र तक आते-आते अर्द्ध-श्रंगारिक हो जाता है,शिवरात्र के बाद पुर्णतः श्रृंगार में डूबी हुई होली गाई जाती है.

बैठक होली में लगभग सभी रसों का समावेश पाया जाता है जिसमें भक्ति,छेड़-छाड़,वैराग्य,विरह,हंसी-ठिठोली,गोपी कृष्ण प्रेम,प्रेमी-प्रेमिका की रार- तकरार,पति- पत्नी का विरह,देवर-भाभी की छेड़-छाड़ आदि प्रमुख हैं.

होली का आह्वाहन राग धमार से किया जाता है. पहली होली राग श्याम-कल्याण में गायी जाती है समापन राग भैरवी पर होता है, दादरा,कहरवां लगभग सभी तालों में होली गाई जाती हैं. प्रसिद्द साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी के शब्दों में “होली जैसे धमाल भरे त्यौहार को बैठक होली गरिमा प्रदान करती है ”

उत्तराखंड में गंगोलीहाट,अल्मोड़ा,लोहाघाट,चम्पावत,पिथौरागढ़,और नैनीताल अपनी शास्त्रीय होली के लिए प्रसिद्द हैं.

खड़ी होली गाने का अपना एक विशेष अंदाज़ होता है. लोग एक गोल घेरे में २ अलग-अलग ग्रुप बनाकर ताल से ताल मिलाकर होली गाते हैं . होली के संचालन के लिए गाँव के किसी सयाने व्यक्ति को एक विशेष पद दिया जाता है जिसे कुमाऊ में ‘डांगर’ कहते हैं . होली की शुरुआत डांगर करता है और फिर बारी-बारी से लोग होली गाते हैं. सभी लोग ‘डांगर’ की बात मानते हैं और उसी के अनुसार होली गायी जाती है. जब होली किसी के आँगन में जाती है तो सबसे पहले ‘चीर’ पूजन होता है उसके बाद सभी ‘होल्यारों’ को अबीर लगाया जाता है और जोश और उमंग के साथ होली गायी जाती है .

शहरों में सिर्फ एक दिन की होली मनाई जाती है परन्तु उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग ४-५ दिनों तक होली मनाई जाती है इन ४-५ दिनों तक सम्पूर्ण उत्तराखंड होली के रंगों में रंग जाता है. दिन में बारी-बारी से सभी के घरों में जाकर खड़ी होली गाई जाती है और रात में ‘खई’ में पहले खड़ी चौताल होली और बाद में बैठक होली गाई जाती है. होली का समापन ‘छरड़ी’ के साथ होता है इस दिन होली के रंग को नदी में बहाकर तथा नहा-धोकर ‘खई’ में ‘हलुवा’ बनाया जाता है जिसमें चीर के धागे का एक-एक टुकड़ा रखकर सभी ‘होल्यारों’ के घरों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है. होली के बाद उत्तराखंड में झोड़े प्रारंभ हो जाते हैं.

एक उत्तराखंडी चौताल होली की कुछ लाइनें यहाँ प्रस्तुत हैं …….

नदिया तीर की झोपड़ी, लाला घड़िया घड़िया की तीस,

की समझो मेरो बालमा, की समझो जगदीश,

नदिया तीर की झोपड़ी, लाला घड़िया घड़िया की तीस,

की समझो मेरो बालमा, की समझो जगदीश,

जल जो प्यारी मछली, लाला मछली को प्यारो तेल,

मुरख जो प्यारी निद्रा, चतुर प्यारो खेल,

जल जो प्यारी मछली, लाला मछली को प्यारो तेल,

मुरख जो प्यारी निद्रा, चतुर प्यारो खेल,

नदिया तीर की झोपड़ी, लाला घड़िया घड़िया की तीस,

की समझो मेरो बालमा, की समझो जगदीश,

नदिया तीर की झोपड़ी, लाला घड़िया घड़िया की तीस,

की समझो मेरो बालमा, की समझो जगदीश,

  • Dhirendra Belwal

    होली आई

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