«

»

Apr
18

आज फिर से उत्तराखंड आंदोलन की अत्यंत आवश्यकता

आज फिर से उत्तराखंड आंदोलन की अत्यंत आवश्यकता च

विमर्श :भीष्म कुकरेती
(s =आधी अ = अ , क , का , की , आदि )

जब उत्तराखंड राज्य बौण अर इख मुंबई मा बि नौ नवम्बरो खुण जलसा ह्वेन। स्व . गुसाईं जीन एक जलसा मा भाषण दीणो निमंत्रण दे बि छौ त मीन गुसाईं जीमा बोलि छौ – उत्तराखंड भौत जल्दी मील गे अर आबि त उत्तराखंड आंदोलन तै अगनै जाण चयेणु छौ।
मीन एक लेख लेखि छौ कि उत्तराखंड राज्य बणनो बाद उत्तराखंड आंदोलन की हौर ज्यादा जरूरत ह्वे गे तो चूँकि लेख गढ़वाली भाषा मा छौ तो वै लेख संपादकन बि नि बाँचि होलु अर मै नि लगद कि कै पाठकन बि पौढ़ ह्वा धौं।
म्यार बुलण छौ कि उत्तराखंड आंदोलन केवल राज्य प्राप्ति साधन नी च अपितु राज्य मा बहु उद्द्येशीय कार्य प्राप्ति साधन च अर यूं कार्यों तैं पूरो करणो एक ही साधन च उत्तराखंड आंदोलन।
आज फिर से उत्तराखंड आंदोलन की अत्यंत आवश्यकता च।
जी हाँ मि ढोल बजैक , रौंटळ बजैक , जंघड़ ठोकिक बुलणु छौं कि आज 2014 मा उत्तराखंड आंदोलन की बड़ी आवश्यकता च।
भारत स्वतंत्र ह्वै अर भारत आंदोलन समाप्त ह्वे गे जब कि भारत आंदोलन की आवश्यकता आज जादा ह्वै गे।
कॉंग्रेस्युंन क्या कार कि संविधान लागू कार अर जू आंदोलन का मुख्य उद्द्येस्य छा वूं उदेस्य पूर्ति की जुम्मेवारी संविधान तैं दे द्याई अर स्वतंत्रता का साठ पैंसठ साल बाद बि भारत भारत नी च। संविधान अर बजट निर्जीव डंडा छन यूंसे भारत नि बौण सकुद। भारत बणाणो वास्ता ज़िंदा भावना चएंदी जो कि भारत आंदोलन मा ही मिलदी। जब बि भारत मा क्वी सामजिक बीमारी भगाणो बात ह्वे होलि त नेतौंन एक नया नियम भारत तैं दे दयाई। बीमारी त नि भागि उलटा नया नियम से एक नई बीमारी जि ऐ गे।
भ्रस्टाचार एक सामजिक अर मानवीय बीमारी च अर हमर नेताओँन संविधानिक नियम बणैक भ्रस्टाचार पर लगाम लगाणो कोसिस करणो स्वांग कार अर भ्रस्टाचार दुगणो हूंद गे। इनि बलात्कार का बि हाल छन। बलात्कार एक शारीरिक , मानवीय अर सामजिक बीमारी च त हमर नेता संविधान का नियमुं से बलात्कार रुकणो बात करणा छन।
सामजिक चेतना की हर समय भारत तैं जरूरत हूंदी। हमर नेताओंन हर छै सौ (600 ) मनिखों पैथर एक NGO भारत तैं दे द्याई अर कुज्याण सामजिक चेतना कख हर्ची गे धौं !
इनि उत्तराखंड बणनो बाद उत्तराखंड आंदोलन खतम ह्वै गे अर उत्तराखंड अब उ उत्तराखंड नि बौण जांक कल्पना या योजना आंदोलन का बगत करे गे छे।
सुचे गे छौ कि जल , जमीन अर जंगळ कु समुचित उपयोग से पहाड़ों से पलायन रुकल किन्तु क्वी सामाजिक आंदोलन नि हूण से समाजन जल , जमीन अर जंगळ की जुमेवारी सरकारी उत्तरदायित्व मानि आल तो पलायन दुगणा -तिगुणा दर से हूँणु च। . समाजन पल्ला झाडी आल अर पलायन की जुमेवारी से दूर ह्वे गे।
शिक्षा का कुहाल छन किन्तु सामाजिक आंदोलन नि हूण से शिक्षा अब कुमचयर पोड़ी च।
मैदानी मानसिकता विकास का पैमानों पर भारी च अर हमन सड़क , बिजली , पाणि नळको तैं विकास मानि आल अर उत्पादक शीलता तैं खाड जोग करी आल। उत्तराखंड सामाजिक आंदोलन ज़िंदा हूंद तो विकास का पैमाना /तराजू उत्पादक शीलता हूंद।
पर्यटन क्रान्ति अब केवल सरकार पर निर्भर ह्वे गे अर जनता तैं पर्यटन की पडीं बि नी च तो इन माँ क्या उत्तराखंड आंदोलन की आवश्यकता नी च ?
सब परेशान छन कि गूणी -बांदर अर सुंगरुँ से कृषि काम पहाडूं मा खतम ह्वे गे। तो भई एक बात बतावो कि सरकार पर दबाब कु बणालु ? केवल समाज ही सरकार पर दबाब बणालु , किन्तु समग्र उत्तराखंड अान्दोलन नि हूण से जंगली जानवरुं समस्या जख्याकि तखि च।
इनि दसियों सवाल छन जो सामजिक चेतना से ही संभव छन। किन्तु क्वी समग्र पहाड़ी आंदोलन नि हूण से सबि सवाल तो उखी छन अर जबाबुं हरचंत हुयुं च।
आज फिर से समग्र उत्तराखंड आंदोलन की आवश्यकता च।

Copyright@ Bhishma Kukreti 18 /4/2014

Copy Protected by Chetans WP-Copyprotect.