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Mar
27

“ऊँचाई में अभिमान नहीं, गहराई में निराशा नहीं”…धारावाहिक उपन्यास, लेखक – दीप पाठक

पहली किस्त (जंजीरें कायम थीं पर दिखती न थी) 

जहां धूप तो पर्याप्त थी पर उसका ताप फीका था, हवा खूब थी पर उसकी विरलता उन फेफड़ों का दम उखाड़ देती थी जो कदरन नीची जमीनों पर रहने जीने के आदी थे,पानी साफ चमकीला था पर इतना ठंड़ा कि जरुरत से घूंट भर भी ज्यादा पीना मुशकिल था, ठंडी सख्त जमीन जहां कि चौड़ी पत्तियों वाली मखमली हरियाली के विपरीत तीखी कंटीली सख्तजान झाड़ियां और खूब घास वो तभी तक जब तक सूरज निचले मैदानों को दहकाता था पर यहां बस नरम दूब को पोषण भर गरमी दे पाता था|

इन बरफीली उंचाइयों के वीराने में गरमियों में फूल खिलते थे और मीलों तक फैली घाटियां हर उस बीज को उगा देती थी जो नीची जमीनों के नर्म मौसम के उलट सख्त जमीन में उगने की कला में माहिर हो!देशों की सीमायें ही यहां मिला करती हों ऐसा नहीं है यहां भी जीवन है भले साल के सात महीने ही जीने लायक हो चरवाहे उनकी भेड़ें उनके लददू गधे, झापू याक मोटी दुम वाले बड़े-बड़े कुत्ते जो भेड़ो-बकरियों के रेवड़ों के पक्के चौकीदार हैं, जिंदगी यहां हर सेकेंड एक अनवरत श्रम है ना समय का एक कतरा फालतू और ना मौजूदा साधनों में कंटीली झाड़ियों का एक कांटा फालतू है न घास का एक तिनका जाया होता है झाड़ियां सूख जाय तो ईंधन का काम देती हैं घास जानवरों का पेट भरती है जानवरों की मेंगनियां गोबर सब ईंधन फटे कपड़े की धज्जी भी बिछावन है|

बरसों से गिनती के चार परिवार यहां रहते हैं उन का कारोबार है मांस के लिये बकरियां हैं और बदले में चाहिये राशन-नमक-गुड़-चीनी,चलायमान जिंदगी को भारी बनाने वाला अतिरिक्त ताम-झाम कतई नहीं चाहिये |

हवा में आक्सीजन की मात्रा सौ में सत्तर पर चरवाहों के फेफड़े तंदुरस्त हैं बच्चे खेलते-सीखते रहते हैं काम में हाथ बंटाना भी एक खेल है और बड़ों के रोजमर्रा के कामों को सीखना जीवन का दर्शन भाषा है बोलने को करने को काम है जीने को लंबा जीवन है थकान है नींद है ना ज्यादा खुश होने के लिये समय है ना ज्यादा दुखी होने के लिये |

चार परिवारों में 19 बच्चे हैं बचपन से किशोरवय: तक चार लंबी पकी उम्र के बूढ़े-बुढ़िंयां आठ जवान पुरुष दस महिलायें और गांव में एक गूंगा-बहरा सा चरवाहा जो बोलने-सुनने की कमी को अपने हुनर और काम में बाधा नहीं पाता और ना चरवाहों के लिये परेशानी था बल्कि वो तो इस गांव का मनोरंजन और कला केन्द्र था!समय ने करवटें बदली पर यहां समय की चाल नियमित थी पर समय के बदलने का असर सारीधरती पर था तो यहां भी पड़ना तय था………(क्रमश:)

 दूसरी किस्त  (जंजीरें कायम थी पर दिखती न थी)

 गांव के बचे सयाने बूढ़ों ने खूब उम्र देखी थी, चरवाहा जीवन सादा मगर दर्शन के लिहाज से खूब अनुभवी होता है बदलते मौसम का पक्का हिसाब उनको पूर्व सूचित कर देता है, हर वक्त तैयार रहना कुदरत की मूक भाषा पढ़ना चरवाहे जानते हैं अपनी परंपरा में जरुरी चीजों को,हिदायतों को,सीख को गीतों में, त्योहारों में, किस्सों में कहानियों में सहेज लेते हैं और नयी पीढ़ी को सोंप देते हैं A बदलते समय के लक्षण कुछ देर से दिखे पर दिखने लगे थे पड़ावों में जब वे रुकते अपने माल की खरीद-बेच करते तो व्यापारियों और नयी चीजों को देखते न चाहते हुवे भी निचली गर्म घाटियों का जीवन और आधुनिकता और अतिरिक्त संसाधनों का आराम और जीवन की आरामतलबी कहीं मन में जम जाती और उनके जीवन से अपने जीवन की तुलना न सही पर कुछ सामान और पास हो ये चाहत तो होती ही थी, घड़ी, रेडियो, टार्च, पालीथीन की सीट तो जरुरत बनी और पानी से बचाव में कारगर|

सो चरवाहों के जीवन में बहुत कुछ बदल गया पर जीवन को अनुदान देती इन चीजों ने विकास क्रम को बहुत बारीक तरीके और सजग तरीके से बदलना शुरु कर दिया A गाँव में आज त्योहार है क्यों कि सर्दियों के लंबे प्रवास को खतम कर निचली गर्म घाटियों से गरमी की शुरुआत के बाद उंचे ठंडे मैदान खिलने लगे थे घास से बर्फीले मैदानों में जीवन गरमाने लगा, बंद पड़े घरों के चूल्हे गरमाये और गांव के उंचे स्थान पर बने मंदिर के देवता को उसका काम सोंपा याद दिलाया गया और जरुरत भर श्रद्धा दी गयी मौजूदा सामग्री से बेहतर खाना छक कर खाया गया ताकि छ: महीने के पर्यावास की शुरुआत अगले दिन से की जाये |

अगले दिन की सुबह से इस गांव के लोगों का परिचय और कामकाज शुरु होगा और लंबी प्राकृतिक जानकारी के साथ फिलहाल भौगौलिक रुपरेखा से परिचय तो हो ही गया आगे आप जानेंगे कि कठिन जीवन यहां के लोगों के लिये सहज कैसे है |

जीवन के कई विशेष नियम होते हैं पर चरवाहे आपको बतायेंगे कि जीवन भी एक आदत है Aजीवन को नियमों में बांधने का दावा करने के ठीक उलट कहीं सच ये तो नहीं है कि जीवन जीने बाले को अपने नियम से चलाता है! कौन सी जंजीरे हैं जो न दिखते हुवे भी कायम हैं ? अधिक तम आजादी के बाद भी बांधे रखना ही नियम है कुदरत का ……..(क्रमश:)

 तीसरी किस्त (जिंदगी बहती थी,विरल हवा सी समय गुनगुनी धूप सा कीमती था)

अल्सुबह कुत्ते भोंक रहे थे मुंह से भाप निकलती थी बाड़ों में भेड़े दुही जा रही थी पानी इतना ठंडा था कि गाँव के लोग दिन गरमाने के बाद ही मुँह धोते थे पर गूंगा माधो जरुर कहता कि पानी ठंडा है पर वो मुंह धो आया सभी हो-हो हंसते थे, गाँव के सबसे सयाने बूढ़े नैनसिंह ने नमकीन चाय पीते हुए इस सीजन की चराई का हिसाब लगाया भेड़ों की ऊन उतारी जानी थी, भेडिये कहां कहां बकरियों को मार सकते थे, सफेद पहाडी बाघ का कुनबा कहां-कहां था, ये सारी बातें वे पडोसी जगत सिह से कर रहे थे, चार परिवारों के ये दो, मुखिया थे पक्के चरवाहे देशों की सीमाओं के आर-पार उनकी पीढीयों ने हजारों मील का सख्त पहाड़ी प्रदेश देखा था पहाड़ी दर्रे-रास्ते, नदियां, पड़ाव, चारगाह सब तो उनके खून में शामिल था दुनियां की समझ थी पर मैदानी समतल जमीन, समुद्र भी धरती की बनावट में है ये उन्होंने सुना था पर कभी देखा न था वे सोचा करते थे कि धरती की बनावट बगैर पहाड़ी घाटियों के कैसे हो सकती है ? वजह दुरुस्त थी उंचे और बहुत उंचे पहाड़ो तक ही जिंदगी बीती थी बहुत नीचे आ गये तो गरम घाटियों तक उतर आये |

महिलायें जानवरों को दुह कर जरुरी भोजन तैयार कर रही थी बच्चे धूप में पगड़ंडियों में आते जाते खुश थे जवान पुरुष बाड़ों की हालत का मुआयना कर रहे थे कि क्या-क्या ठीक करना है |

गूंगे माधो ने अपनी बघिर भाषा में बताया कि बड़े दादा ने बताया कि चरायी शुरु कैसे करनी है A भेड़-बकरियों की तादात सैकड़ो में नहीं बल्कि हजार में थी पर संख्या पूछना बुरा माना जाता है A छ: महीनों में फसल के नाम पर आलू, राजमा, पहाड़ी दालें, सब्जियां उगती थी, जौ भी उगती थी जिसका सत्तू बनाया जाता A चावल की शराब बनती और पी जाती नशा नहीं जिंदगी के लिये ये जरुरी पेय है A याक और गधे ही नहीं यहां भेड़ों और बकरियों की पीठ पर जरुरत का बोझ लादा जाता था, सारा सामान छोटी इकाइयों में परिवहन के मौजूदा साधनों से ढोया जाता A तलहटी की मीलों लंबी घाटियां घास से भर गयी थी चरायी जारी थी हर ऐक प्राणी चाहे दो पैरों वाला हो या चार पैरों वाला अपना-अपना काम किये जाता था, यही जिंदगी थी काम ही जीवन और जीवन एक काम |

बच्चे भेडों, याकों, बकरियों गधों को चरता देखते और चरवाहा जीवन बिना सिखाये सीखते थे छ: महीने भेड़ों के बाल काट ऊन जमा करना, दूध का मक्खन बिलोना जानवर इंसानी जीवन के नियम तय करते थेजिंदगी बहती थी विरल हवा सी समय गुनगुनी धूप सा कीमती था |……..(क्रमश:)

 चौथी किस्त (अभागों का गाँव नहीं अभागे वो हैं जो जीवटता और सरलता से दूर भाग्य को ढूंढता फिरे)

ऊंचे ऊँचे पहाड़ों के बीच बहुत सी बंद पर खुले कटोरे जैसी जादुई घाटियां होती हैं जमीन जिस पर महज घास उगा करती है, वही घास कितने लोगों को रोजगार देती है और कठिन भौगौलिक जगह पर एक मजबूत अर्थव्यवस्था के गिर्द समाज का निर्माण करती है, पोषण देती है A गाँव की घाटियों में जीवन हरहरा कर फूट पड़ा जबकि कुछ समय पहले बर्फ की सफेद चादर के नीचे सब कुछ दबा पड़ा था मानो सुन्न ठंडा रेगिस्तान हो पर आज हजारों भेड़ बकरियां चर रही हैं, सर्पिल नदी साफ पानी को दौड़ाती हुई निचले मैदानों की तरफ लिये जाती है, उंचे झरनों से पानी को धकेलती है तो फिर गहरी घाटियों में धीमी चाल से गुनगुनाते हुए बहती है हर रंग में पहाड़ों में पानी, पानी को ढ़ूंढकर मिलकर बडी नदी बनता है और मैदानों में पहुंचते ही अल्हड़ता को छोड़ मंद-शांत गहरे बहाव में बदल जाता है, जिंदगी का फलसफा समझाते हुए कि जैसे से नदी और उम्र बढ़ती है तो गहरी और मंद पड़ जाती है पर रुकती नहीं है|

गांव में काम ही काम है भेडें-जानवर चरते थे कुत्ते जीभ लपलपाते तेज नाक से सूंघते रखवाली करते बच्चे ऐसे खेलते कि काम करना ही खेल था महिलायें हंसते बतियाते अनवरत काम में जुटी थी पुरुष जहां-तहां रेवड़ों को चराते ऊन उतारते बूढ़े तकली कातते साग बाड़ियां लहलहा रहीं थी A कहीं रेड़ियो पर “वक्त” फिल्म का गाना बज रहा था  ”दुनिंयां का बोझ जरा सिर से उतार दे, जीना है तो जिंदगी को धारे पे डाल दे” A  इस सख्त चरवाहा जिंदगी को नीची जमीनों के लोग अभागों सा जीवन समझते थे, पर जिंदगी तो अभागों या भागों के इल्जाम से दूर सबके साथ है कहीं उसे जीना पहाड़ सा भारी है तो उंची घाटियों पहाड़ों में वह कटती है अगर सख्त जीवन अनवरत श्रम ना हो तो पहाड़ से भारी होगी ही, पर यहां के लोगों को भी चाहिये कि रास्ते बने रहें स्कूल, बिजली और दूररस्थ गांव तक सड़क पहुंचे बीमारों को इलाज मिले हांलांकि वैकल्पिक इलाज के तरीके और बीमार न पड़ने की सोच-समझ ही बचाव है|

साधन पर्याप्त होना ही भाग्य है A अभागा तो वही है जो भरपूर मेहनत के बाद भी साधनों से महरुम है A दो युवा गडरियों ने बताया कि आज दो भटकी हुई भेड़ें या तो बाघ का शिकार बनीं हैं या फिर भेड़ियों का नुकसान का दुख थापर ब्याने वाली भेड़ों बकरियों के नये बच्चे इस दुख को कम कर देते पर जीवन के बदले जीवन था भेड़ियों का भी बाघों का भी चरवाहों का भी A बूढ़ों ने कहा फंदे बनाओ भेड़ियों की तादाद को काबू करना पडेगा……(क्रमश:)

 पांचवी किस्त (भेड़ों को भेड़ियों से बचाना अपनी आत्मा को पाप से,ऊँचाई भी पड़ाव है गहराई भी)

 बूढ़े नैनसिंह ने सभी पक रही उमर के अपने गांव के बेटे भतीजों को बताया कि भेड़िये भी साथ ही चलते हैं इनकी जिंदगी भी हमारे साथ है पर इनकी तादात काबू में रखो फिर गांव के गिनती के चरवाहों ने फंदे बनाये, ये एक गहरे खड़्ड में भेड़ उतार देते थे भेड़ रात भर मिमियाती, भेड़िये शिकार की नीयत से खड़ड में कूद जाते पर भेड़ तो लकड़ी के पिंजरे में होती थी पर खड़ड में उतर आये भेड़िये फंस जाते गांव के लोग भेड़ियों को पत्थर से मार देते भेड़ को निकाल लाते थे A इस सीजन भी चार छ: भेड़िये पिजरों में फंसे चरवाहे खुश तो थे पर भेड़िये मारना रुचिकर न था, पर करते थे A नैनसिंह के बड़े लड़के जिसका नाम नेमसिंह था ने बताया कि चार भेड़िये मार दिये, पर हर दो हफ्ते में जाने कैसे भी एकाध जानवर मार ही डालते हैं A ऊन उतरायी जोरों पर थी भेड़ों के बाल कतरे जा रहे थे जवान लड़कियों पारंपरिक पुराने पहाड़ी करघों पर बुनती एक ताना दूसरा बाना (करघे की बुनावट के धागे लंबाई चौड़ाई में खिचे रहते हैं उनको ताना बाना कहते हैं) ये अपनी जरुरत भर का बुनते थे बाकी तो वे बालों को साफ कर बेचते थे |

अब इस बार बूढ़े  नैनसिँह की तबीयत साथ नहीं दे रही थी वे इस बार के सीजन हाथ की तकली में कताई को भी भी अंजाम नहीं दे पा रहे थे A उनका शरीर आराम मांगता था इलाज मांगता था सेवा मांगता था, पर वे काम तो नहीं कर पाते थे लेकिन दूसरों को अपनी वजह से बाधित करें या सेवा लें ये उनको गवारा न था, सारा कुनबा उनकी सेहत की चिंता रखते हुवए काम में जुटा था, नैंनसिँह जी भी जान रहे थे हालात को सो वे देर रात तक अपने संचित ज्ञान को लगभग सारा दे जाना चाह रहे थे|

दिन की गुनगुनी धूप में सारे चरवाहे घाटियों में रेवड़ चरा रहे थे घरों में दुपहर को महिलायें हल्के भीतरी कामों में जुटी थी A अचानक एक युवा किशोर ने अपने पिता को आवाज दी, यह किशोर नैंनसिंह का पोता था वजह रही कि उनकी तबीयत मंद हो गयी उन्होंने लड़कों को बुलाने को कहा गांव अनहोनी की आशंका के लिये तैयार होने लगा जवान लड़कों को पिताओं ने अपनी जगह चराने भेज दिया, सयाने पुरुष घर लौट आये A नैंनसिंह समझ गये थे जमा हुए बच्चों को देखकर संतोष की सांस ली सभी शांत थे और मन पक्का कर रहे थे कि पिता का वक्त आ गया था A पर नैन सिंह जी ने समझाया कि मेरा समय आ गया सो सुनो हमेशा रेवड़ की तरह जुट बनाकर रहना, भेड़ों को भेड़ियों से बचाना और अपनी आत्मा को पाप से, उंचायी भी पड़ाव है और गहरायी भी आखिरी पड़ाव तक भलाई साथ रखना……….(क्रमश:)

छठी किस्त ( मी मी थथकश्यी बकन,छम छिछिल बकन )

 माहौल भारी हो चला था आज की रात लंबी होने वाली थी क्योंकि दिन भारी हो चला था A नैनसिंह जी को चुप रहो बाबू आराम करो बोलते बेटे भतीजों बहुओं को देखकर असीम संतोष हुआ जाता था, पर उखड़ती सांसों के बीच वे कह रहे थे मी “मी थथकश्यी बकन छम छिछिल बकन” (आदमी साथ रहने से और ऊन धोने से समझ में आता है) वे बोल रहे थे और फिर वे चुप हो गये मानो नींद आ रही हो |

सांझ उतर रही भेड़ बकरियां भी समझ जाती हैं बाड़ों में लौटने का समय हो गया जब शाम ढलती है तो उदास होने का मन होता है रात की नीरवता तो शांति लौटा लाती है पर आज तो कुनबा शांत था, भेड़ें शांत थी, पर किसी भी आहट को ध्यान से सुन कर कुत्ते बीच-बीच में भौंक रहे थे, चरवाहों के परिवार का मुखिया आज अपने आखिरी चिर पड़ाव पहुँच चुका था पर जिंदगी रुक नहीं सकती जिसकी कमी खलेगी जब तक हमारे अपने साथ होते हैं बेफिक्री रहती है भले वे जवानों सा काम ना करें पर जब नहीं होंगे उसी पल समझ आता है कि क्या और कितनी जगह थी हमारी जिंदगी में, जो उनके द्वारा भरी थी अब खाली हो गयी जिसे हमने भरना है A जैसे ही ये अहसास हुआ तो भीतर से भावनाऔं का ज्वार उठता है आंसू खुद ब खुद निकल आते है तो फिर भाँय-भाँय रोना आता है, जीवन में रोना भी जरुरी है ये ना सिर्फ मन को शांत कर देता है बल्कि आगे आने वाले समय के लिये मन को दृढ़ता  भी देता है|

चरवाहों के रिवाज के मुताबिक गांव के सयाने को समाधी दी गयी A आज आधी उमर में पहुचे नैनसिंह के लड़के सोच रहे थे कि इस सीजन ने पिता को विदा दी A सब चुप थे, गूंगे माधो ने इशारे से बताया कि भेड़ो के बच्चे जनने का समय शुरु हो गया पहली भेड़ का बच्चा हुवा है, उदासी के बीच जीवन नयी जिम्मेदारियों के लिये आह्वान कर रहा था, भेड़ों के ब्याने का समय नजदीक आ रहा था तैयारी करनी थी पर जाने क्यों पिता नैनसिंह के शब्द याद आ रहे थे- ”मी मी थथकश्यी बकन छम छिछिल बकन”  पर इस दुख: से ज्यादा हताश नहीं होना था समय कम था और काम में व्यस्त हो जाना हर शोक का इलाज है|

पटवारी ने अपने कारिंदे को भेजा था, ये चरवाहों के लिये वो इंसानी भेड़िये थे जो भेड़ों का गोस्त और गांव की बनी शराब फोकट में पीते थे और फिर भी गुर्राते थे चरवाहे तो दूर गूंगा माधो भी इनसे खार खाता था बेबसी थी इनको भी भेड़ियों की तरह पिंजरे में डाल देने को मन करता था पर जीवन में कई चीजें होती हैं जो न चाहते हुए भी सहन करनी पड़ती हैं गांव में दुख है पटवारी को क्या दुख: …(क्रमश:)

 सातवीं किस्त (मौसम भी सख्त हालात भी सख्त उपर से ये कमबख़्त)

 इस जानसोख जिंदगी और सख्त हालात के बाद जो पैसा टका बचे तो कहाँ खरचें ? ये जिंदगी एक आदत तो बना ही देती है कि जीवन रक्षक आवश्यकता ही आवश्यकता है बाकी अर्थशास्त्र की दो अन्य आवश्यकतायें भूमि के किसी और टुकड़े की जीवनशैली के लिये बनी हैं A सरकार चाहे इन दुर्गम क्षेत्रों के लिये अभी आगे आने वाली एक शताब्दी तक कुछ ना करे पर अपनी ताकत ड़ंडे का दखल तो रखती ही थी |

चाहे शासन राजा का हो मुगलो का हो गोरख्यों का हो या अंग्रेजों का, या आज की आधुनिक सरकार का हर आदमी चाहे जहां हो उसे वहीं परेशान करो, ये चलता रहता है पटवारी तो छोड़ो यहां तो सटवारी (पटवारी का चपरासी) भी खुद को तहसीलदार से कम नहीं समझता A ये तो फोकट की शराब बकरों का गोस्त तो चट करते ही थे अगर बस चले तो इंसानी गोस्त भी सूंघते थे, पर बदले हालात ने अब आगे बढ़ने की हदें बांध दी थी, पर टुच्ची हरकतें तो बेहयायी की हद से परे थीं |

नैंनसिंह के छोटे बेटे रामसिंह बोले-यहां तो मौसम भी सख्त हालात भी सख्त उपर से ये कमबख्त A छोटा सा चालीस बयालीस लोगों का ये पहाड़ों का बंजारा कुनबा सरकारी तंत्र की मेहरबानियों के बाद भी अपनी भेड़ों के नये बच्चों को देखकर खुश थे, चटख धूप में खिली हरी घास में उछलते छौने यही तो भविष्य की पूंजी है और उनके खुद के बच्चे जो काम की साज संभाल में हाथ बंटाते स्वस्थ सुंदर गड़रिये कहते हैं कि पहाड़ों की पुरानी कहावत है कि- ” आदमी स्वस्थ है तो सुंदर तो होगा ही” |

गरमी ही जीवन का ताप है ये बात ठंड़े मौसमजीवी लोग कहते हैं कोसों की चढाई पार कर इस सीजन के आधा बीत जाने के बाद अपनी कोई डेड़ सौ का रेवड़ लेकर एक नया कुनबे के दो सयाने और दो युवा अणवाल(चरवाहे) यहां पहुंचे हैं A यहां बात रिश्ते की होनी है नैनसिंह जी और भाई जगत सिंह की पोतियों के लिये युवा चरवाहे बतौर दूल्हा तय हैं ये बात बर्षों पहले ही तय थी जिनके बारे में गांव के सयाने पुरुष और महिलायें जानते हैं पर अभी होने वाले वर-वधू को इस बाबत कोई खबर नहीं है, गांव में काम जोरों पर है और नये आये इन मेहमानों की रात को पारंपरिक खातिरदारी की जाती है और दिन भर की व्यस्त जिंदगी के बाद बातों का सिलसिला आगे बढ़ता है |

युवा चरवाहे अपनी धुन में हैं पर लड़कियों को आभास है कि अब कुछ गांव में से जायेगा तो कुछ गाँव में आयेगा यानि बेटियां जायेंगी तो बहुएँ आयेंगी उनके भाईयों को भी किन्हीं दूसरी जगहों पर अपनी भेड़ बकरियों को लेकर जाना है पसंद है |… (क्रमश:)

आठवीं किस्त (पांव चलते रहे,पेट पलते रहे,पता ही न चला कब उम्र के पड़ाव पार होते गये)

 जीवन की गति चक्राकार भी और सर्पिल भी, पर जब आप चल पड़ें तो रास्ता भी कटता है उम्र भी कटती है जिंदगी भी, पुराने बूढ़े आंखों के उपर हाथ का छज्जा बनाकर दूर क्षितिज को देखते हैं लगता है कि पूरी उम्र का काटा गया मीलों लंबा सफर का पुनरावलोकन कर रहे हों, पता ही नहीं चला कब चौथी पीढी के बच्चे खेलने लगे, कुनबे का जीवन हमेशा बचपन जवानी, बुढापा सब साथ लेकर चलता है मानो एक पूरी जैविक इकाई मानों एक डोर में पिरोयी हो |

इन दो महीनों तक युवा चरवाहों को यहां काम भी करना है और इसी काम के प्रति समर्पण और जिंदगी के प्रति संजीदगी सब को दिख जाती है A सही कहते थे सयाने नैंनसिंह जी कि ऊन धोने से और आदमी साथ रहने से समझ आता है A समय बीत रहा था, खुरों से रोंदी गयी इस जमीन में भावी फसल के लिये मानो जुताई-निराई भी जानवर अनजाने में खुद ही करते जाते हैं A स्वस्थ युवा भावी दंपतियों ने एक दूसरे को खूब परख लिया था बारीक ऊन के रेशे पश्मीना की समझ रखने वाली चरवाहों की पारखी आँखें चाहे जानवर हो या आदमी हर जिंदा देह की समझ रखते हैं |

ऊन बटोर लिया गया जरुरी जड़ी-बूटी सहेज ली गयी जानवरों की पीठ पर लादे जाने वाले थैले भरकर सिलकर तैयार कर लिये गये हैं जिंदगी का लश्कर रोज अपनी तैयारियों को पेशेवराना फौजी तरीके से अंजाम दिये जाता है A मौसम के बदलने से पहले ही तैयारी पूरी है जश्न की तैयारी है, कुनबे की रवायत के मुताबिक अब सबको विवाह के बारे में बता दिया गया है, रस्मों की सादगी से दो युवा दंपति नये परिवार की जिम्मेदारी उठायेंगे और जानवरों के नये रेवड़ को उन्हें सोंपा गया है रेवड़ फलें-फूलें परिवारों की नयी शाखें बढ़ें और हरी घास जैसी जिंदगी लहराती रहे A परिवार ने एक मुखिया खोया, दो लड़कियां ब्याही अब बारी है दो किशोर चरवाहों के लिये गृहस्थी जोड़ने का अत: रेवड़ के आंशिक हिस्से की जिम्मेदारी उनको सोंप दी गयी है, दो सयाने तब तक उनके मुखिया रहेंगे जब तक इसी तरीके से उनका विवाह संपन्न न हो जाये |

मौसम में बदलाव के संकेत हैं उपरी पड़ावों से निचले पड़ावों को जाने की तैयारी की जा रही है पर वो दिन गुप्त रखा जाता है जिस दिन पड़ाव उठेगा ये पुरानी परंपरा है |

जल्दी ही गरमी का ताप मंद पड़ेगा तो निचली गरम घाटियों में नये पड़ाव डाले जायेंगे और मौसम की जमापूंजी की खरीद-बेच होगी A शाम को जब सूरज लाल होकर ऊंचे पहाड़ों के पीछे उतर जाता है तो पहाड़ी घरों से बनते खाने की महक उठती है|…  (क्रमश:)

 नवीं किस्त (जीवन है तो ताप है और ताप है तो जीवन है)

 नीचे बहती नदी की धुंधलायी में घरों के आगे जलती आग की परछाईयां सुनहले मकोड़ों की तरहा नाचती हैं, ठंड़ बढ़ने से पहले गुनगुनी धूप का पीछा करना जरुरी है, सच ही कहते हैं कि जीवन है तो ताप है और ताप है तो जीवन है,जी चाहता है इस गुनगुने ताप भरे सूरज को बाँध के रख लें A भेड़ों ने पुराने बाल दिये तो इन गरमियों में नये बाल उगाये सूरज के ताप का क्या वनस्पति क्या घास,जानवरों और इंसानो ने जमकर लुत्फ लिया घाम तापा, काम किया आज जिया कल जिया, पर जीवन कल के लिये आज थोड़ा तैयारी मांगता है |

दो नये चरवाहे नयी गृहस्थी से खुश है तो कुनबे को जिम्मेदारी निभा लेने की खुशी है, पर भेड़ों की बालों में फंसे कुम्मरों (चिपकने वाले कांटे) की तरह जिम्मेदारी के कांटे भी कहां छूटते कितनी कोशिस करो फिर आ चिपकते हैं | याद तो होगा आपको लाटा(गूंगा) माधो कुनबे का मनोरंजन केन्द्र गांव में शादी निपट जाने के बाद उसने मांग रखी है कि मेरी भी शादी करो, माहौल में माधो की बातों का आनंद है A इसी बहाने सभी ने कुछ ना कुछ फालतू बातों के स्टाक निकाले हैं पर सयाने लोगों का मानना है एक ही लकड़ी ठीक नहीं, काम में लाना है तो तोड़ के दो, करना ही पड़ेगा सो माधो के लिये भी जीवन का जोड़ ढूंढ़ना ही पड़ेगा A अच्छी ऊन  जमा है भेड़ों का रेवड़ भली भांति बढ़ा है पर आने वाले बर्फीले जाड़े की बादशाहत के आगे कौन टिक पाया है ? सो अब तो वहीं जाना पड़ेगा जहां सूरज मेहरबान है और मौसम में बरफ का कहर ना टूटे यहां तो बरफ की चादर के नीचे सब कुछ ढक जायेगा पर जिंदगी और कुदरत दूसरे रास्ते खोलते हैं ताकि नये मौसमों को जीते हुवे जीवन खूब सम़द्ध हो और फिर आप ताप और ठंड़ को जीवटता से निभायें और अगले चराई के सीजन में बरफ की चादर पिघलेगी तो नयी उष्मा का संचार होगा पर अब तो फिलहाल अपने इन चरवाहों को ऊँचाई के पड़ावों को विदा कहना ही होगा |

आग के पास बैठे जगत सिंह ने बताया कि तैयारियां जोरों पर रखो क्योंकि जिस सुबह चलना होगा, वो कूच करने का दिन होगा अतः हर नये दिन को तैयारी का दिन मानों और तैयार रहो पड़ाव छोड़ने में और चलायमान जिंदगी में चरवाहों को कोई परेशानी आयी तो फिर चरवाहों की जिंदगी बेकार है, पहाड़ों के हम बंजारे हैं ये पड़ाव बस इसलिये था कि अगले पड़ाव की तैयारियां करने के लिये समुचित समय मिल जाये A सयानों की सलाह जरुरी होती है जो किताब का काम भी करती है, सलाह पर ही काम हो ऐसा नहीं होता………….(क्रमश:)

 दसवीं किस्त (बहता पानी चलता जीवन दोनों साफ दोनों में रवानी)

 सितंबर की सुबह अचानक इस कुनबे का कारँवा चल पड़ा निचली गरम घाटियों की तरफ, ओह क्या नजारा था बकरे, मेढ़े, झापू याक, खच्चर सब जरुरी सामान से लदे हुए, चरते हुए और पूरा कुनबा साथ में अब तो कई हफ्तों तक चलना है, रात रुको सुबहा दिनभर चलते रहो, घड़ी दो घड़ी दम लो फिर चल पड़ो, क्या गजब होते हैं चरवाहों के बड़े-बड़े कुत्ते भी कुशल मार्गदर्शक चौंकन्ने ऊबड़-खाबड़ रास्तों के हर उतार पर विहंगम नजर रखते चलते हैं A वीरान पहाड़ खुरों के संगीत से गूंजता है कुत्ते बीच बीच में भटकती भेड़ों को हल्की खदेड़ से फिर रास्ते पर ला देते हैं |

नदी के अविरल बहाव से थोड़ा अलग रेवड़ के झुंड़ किसी धूमकेतु तारे की तरहा चलते हैं या जूलूस की तरहा मानो लंबा जलूस हो आगे चौड़ा उत्साहित पीछे गर्द-गुबार छोड़ता किसी पतली पूंछ की तरह निकलता है आगे से देखेंगे तो लगता है मानो बाढ़ आ गयी और अंत में पतली धारा सा |

इस बार रामसिंह के हाथ में मुख्य चरवाहे की कमान है खूब जीवन देखा है इन पहाड़ों का रास्तों का पड़ावों का वे सोचते हैं कि काश ये रास्ते चौड़ी सड़क बन जाते कोलतार या डामर की जगहा नरम हरी घास से भरे तो उतार चढ़ाव भरे रास्ते आसान होते, मन करता मीलों तक धरती नाप दें काश धरती पूरी गोलाई में चौड़ी सड़क होती, दोनों ओर पेड़ और नरम घास भरी हरी सडक उनकी कल्पना में कुदरत की अनोखी छटा बनती है |

मील भर से लंबे रेवड़ का हर भाग में अलग-अलग टुकड़ियों में संपालन होता है बड़ी कुशलता के साथ हे हे हुर्र हुर्र की आवाजों के साथ A खूब खाते रहो चलते रहो घड़ी दो घड़ी रुको चलते रास्ते के बीच चूल्हा जलाओ चाय बनाओ पीओ बकरियां भेड़े कुत्ते याक खच्चर सब अल्प विश्राम के बाद रात्रि के विश्राम की खुशी में खुश रहते हैं, सबकी पीठ से बोझ उतर जाता है पड़ाव पानी-खाना आराम और फिर चल पड़ना चरवाहे जानते हैं कि ईसा मसीह हों या इस्लाम या कबीले गोत्र परंपरा वाले धर्म मूल उत्पत्ति चरवाहों से ही ज्ञान-परंपरा चल निकली, बौद्ध दर्शन भी चरैवति-चरैवति यूं हीं नहीं कहता कुछ तो सार है |

धर्मों का निर्देशन खतम हुवा पर जिंदगी किसानी से आग से चक्के चलने लगी मूल आविष्कार तो आग पहिया और खेती ही हैंरात के पड़ाव में जानवर उंघते जुगाली करते हैं पता नही जानवर क्या सोचते होंगे पर हमेशा या तो जिज्ञासु लगते हैं और आराम करते हैं तो देखना लगता है कि गहन चिंतन कर रहे हों,पर कुनबे के आदमी तो अबकी बार की कमायी का हिसाब लगा रहे हैं जब से पैसा ईजाद…………(क्रमश:)

 ग्यारहवीं किस्त(उंचायी में जीवन और पानी साफ होता है,ज्यों ज्यों नीचे उतरता है गंदला होता जाता है!)

 जब से पैसा ईजाद हुआ बेजान सिक्कों, नोटों ने जानदार चीजों का वजूद खुद में समेट लिया रामसिँह जी का परिवार रात के पड़ाव में खूब आग जलाकर आग के गिर्द बैठा है, बातें चल रही है जब जमा गयी पश्मीना ऊन के लिये जमा भेड़ के बालों का सौदा होगा तो व्यापारियों की बुद्धि और मक्कारियां मेहनत के भाव में भी डंड़ी मार जाते हैं A रामसिंह जी का लड़का किशन बोला-”अरे बाबू नीचे के लोग मक्कार होते हैं सब ! रामसिंह अनुभवी थे बोले- ऐसा नहीं है बहुत सारी चीजें जमा करते हैं वो लोग ज्ञान भी खूब होता है उन्हें, पर जो जितना ज्यादा जमा करेगा सो उतनी कीमत चुकायेगा तो फिर मक्कारी स्वभाव में आयेगी ही अब देखो ऊंचाई में पानी साफ होता है जीवन सीधा और कठिन पानी नीचे उतरता होता है तो बहुत सारी चीजें मिल जाती हैं पानी गंदला होता जाता है ऐसे ही ज्यों ज्यों जीवन नीचा और सपाट होगा तो बहुत सी सुविधायें उसमें घुलेंगी तो वो भी पारदर्शी और चमकीला नहीं रहता |

रामसिंह जी की बातें सीधी थी पर सारगर्भित थी, पानी से जोड़ के जिंदगी समझा दी थी मोटी बातें थी पर इनमें पश्मीना के रेशों जैसी कई बारीक चीजें थी A रात की नीरवता और गहरी होने लगी सोने वाले बेखबर सो रहे जागने वाले खटके पर नींद रख के सोते थे, भेड़ें और जानवर अधमुंदी आँखों से ऊंघ रहे थे कुत्ते पंजों पर मुंह रखे सो रहे थे पर कान हर जंगली पहाड़ियों से आती आवाज पर लगे थे, कौन सी आवाज जो अतिरिक्त है उस पर चौंकन्ने तैयार हो जाते, इंसानों ने जो शरीर में कमियाँ थीं उसे जानवर पालकर मानवता को उंचाईयों पर पहुंचाया है जानवरों ने इंसानी जीवन को बड़ा अनुदान दिया है |

पास में युवा नये चरवाहे जोड़ों का रेवड़ है अस्थायी टेंट में कुनबे के साथ भी है और बाहर भी हैं उनकी नयी दुनियां है इन दिनों जीवन का नया प्रवाह ! बाघ भी फिराक में है भेड़ों के, वे भी पलायन करते हैं भेड़ों के रेवड़ से दूर मौके की तलाश और पूरे छलावरण कौशल के साथ कितनी भी हिफाजत कर लो पर उनका मौका पड़ता है तो नुकसान तो होकर रहता है |

निचली घाटियों में जंगल घने होते जाते हैं जंगली सूकर सूं सूं सूं रेवड़ को सूंघते हुए जिज्ञासा से टोह लेते हैं पर चरवाहों के कुत्ते उन्हें खदेड़ देते हैं भागते हैं, जंगली सूकर सरपट झाड़ियों में गायब पर दूर किसी सूकर के चिंचियाने की आवाज आती है, कुत्तों ने घेर लिया है अति जिज्ञासा मौत का कारण बनी रेवड़ तो सुरक्षित है पर चरवाहों की दावत का इंतजाम हो गया !……….(क्रमश:)

बारहवीं किस्त (सूकरों को गंदगी में लोटना ही आराम देता है अब ये उनका सुख है)

 मारे गये शिकार को वन विभाग के लोगों को खबर लगे बिना चुपचाप हजम कर लिया जाता है, वरना तो वे लोग शिकार तो खुद हजम करते फोटो खिंचवाते और जुर्माना अलग ठोकते महकमे को सक्रिय होने के लिये ऐसी घटनायें तो चाहिये पर जंगल के किनारे बसे गाँवों में गांव वाले शिकार मारने के बाद गजब की षड़यंत्रकारी रहस्यमय हरकतें करते हैं, मानों सीआईए के ऐजेंटों की खूनी सस्ते उपन्यासों जैसी कहानियों या होलीवुडिया रहस्यमय फिल्मों की भांति मारे जानवर का गोशत पतिलों में पक जाता और बाकी की लाश ऐसे गायब होती की ना कुत्ते सूंघ पाते हैं ना सियार और खून के धब्बे भी गायब हो जाते हैं A पर यहां तो रामसिंह जी के कुत्ते भी कुछ चट कर गये और बाकी कुनबे में काफी पेट थे सो मीट का कोई रेशा कतरा बाकी ना बचा |

गूंगे माधो ने पूरे अभिनय के साथ बताया कि कि कैसे सूकर गंदगी और कीचड़ में लोटता है लोगों का खूब मनोरंजन होता है सीधे-साधे लोग सादा मनोरंजन वरना तो सुविधाऔं की कीचड़ में लोटते लोगों के मनोरंजन के तरीके और भद्दे हास्य ह्रदयहीन कुटिल हंसने के तरीके हुआ करते हैं, पर अचानक माधो की बातों पर रामसिंह बोले अरे सूवरों को कीचड़ में लोटना ही अच्छा लगता है A खिली चटख धूप और हरी घाटियों में रेवड़ और चरवाहे चले चलते हैं कई दिनों का यह सफर जारी रहता है दिन में सब लदे-फंदे चलते हैं, रात को आराम अभी तो मीलों की उतराई बाकी है A यहां हवा भारी होने लगती है फेफड़ों को सूकून मिलता है, बकरियों भेड़ों की पीठ पर भी छोटे-छोटे थैले मजबूती से बंधे हैं कई जड़ियां जो पैसा दिलायेंगी इनमें बंधी हैं, कुदरत के पास अपने दवाओं के खजाने हैं पर अगर मेहनती शरीर हो रगों खून की रवानी और खून में घुली ताजा हवा शरीर को तंदुरुस्त रखती हैं दवा की जरुरत तो तभी पड़ती है जब जिंदगी की चाल सुविधाओं के कीचड़ में फंसकर गाढ़ी और मंद पड़ जाये |

वैसे भी कभी परिवार के मुखिया नैंनसिंह जी कहा करते थे, काम की चीजें जोड़ो कचरा इकठ्ठा मत करो नहीं तो फिर एक फालतू काम हो जाता है कि कचरे से काम की चीजें ढूंढो और फिर वो चीज जिसमें जोडोगे वो अच्छी भली चीज का भी कचरा कर देती है A आज वही चीजें रामसिंह जी अगली पीढ़ी को समझाते हैं कि काम के औजार हमेशा मजबूत खरीदो और कुल्हाड़ी, दरांती हमेशा धार पर रखो तो जिंदगी की धार भी बनी रहती है A हर पड़ाव के बाद रास्ता कटता जाता है कितना भी लंबा रास्ता हो कितनी भी मोटी पुस्तक हो खतम होती है………….(क्रमश:)

 तेरहवीं किस्त (हवा भारी हो जाती है पर जिंदगी कदरन हल्की)

 ज्यों-ज्यों आप पहाड़ों में नीचे उतरते जाते है पीछे मुड़कर देखेंगे तो उंचे पहाड़ों पर उदास कर देने वाली नीली धुंध छायी दिखती है, और ह्रदय को मथ देने वाली उदासी छाने लगती है पर नीचे आने पर हवा भारी हो जाती है और सुविधाओं से भरी भारी भरकम साजो-सामान से लदी-फंदी जिंदगी भी हल्की लगती है A यहां से भी नीचे उतरो तो और उतार है और ज्यादा उतरो तो मैदान का अंतहीन फैलाव बेतरह सिमटी बस्तियां शहर अलसायी सी मंद प्रवाह में बहती नदियां गर्दो-गुबार शोरगुल बेतरह भागते लोग मानों बगैर चरवाहे का रेवड़ हो ऐसा लगता है, हर भेड़ के पीछे भेड़िया पड़ा हो दुर-दुर फिरते लोग, लोग ही लोग, तपती जमीन या ठंड़ में कोहरे की फटी चादर लपेटे गंदी अभागन सी लगती है, गरमी हो शोरोगुल और गर्दो-गुबार के बीच लगता है कि मानों किसी बड़े से कड़ाहे में सारी चीजें भदक रही हों A नैंनसिह जी के जो साथी यहां आये तो वापस आकर ऐक ही बात कही कि जमीन में तो खूब फैलाव है पर जो भी लोग वहां बसे हैं, ऐसे बसे हैं कि हर रास्ता तंग हो जाता है, हर फैलाव को अपने दिलों की तरह तंग और असहज बना देते हैं लोग, सुविधायें बहुत हैं पर ना उनका समुचित वितरण है ना होने के आसार हैं |

जीने के तरीके हैं कानून-कायदा है लोगों के दिमागों में ज्ञान के कोठार भरे हैं पर जीवन का धागा जगह-जगह से टूट गया है सब साथ में हैं पर फिर भी अकेले हैं, खेत-खलिहान बाजार सब भरे पड़े हैं पर हर जगह दम घोटूं असंतोष भरा पड़ा है खूब साधनों के साथ भी जिंदगी साधनों के भार तले दब गयी है, सांस ही रुक जाती है लच्छेदार बातों के ढेर हैं पर पत्थर की लकीर जैसी सच्चाई से भागते हैं लोग समझ में नहीं आता कि ऐसा भी जीना क्यों ? ऐसा भी जीवन किसलिये ?

इधर काफिला उतर रहा है उन के व्योपारी तौल कांटे दुरुस्त कर रहे हैं जड़ी-बूटी से लेकर भेड़ के घी की खासी मांग रहती है बदले में चरवाहों को जिंसी जरुरतें हैं, खरीद-फरोख्त होगी निचली घाटियों में प्रवास के दौरान सुविधा की जिंदगी देखेंगे चरवाहे, पर अस्थायी प्रवास का दौर रहेगा जिंदगी में बारीक से अनदेखे बदलाव होंगे पता ही नयी चलता कि कब अनुभव के खजाने में नयी चीजें आ जुड़ीं और नये विचारों की जमीनें तैयार हो गयीं इसी का नाम तो जीवन है हम सोचते हैं कि हम चला रहें हैं पर कुदरत और परिस्तिथियां मंद-मंद हंसती हैं हमारी चरम विद्वता पर तभी तो कहते हैं कि “जंजीरें कायम थीं पर दिखतीं न थीं” ये कोई आध्यात्म नहीं है जीवन एक प्रोग्राम है………….(क्रमश:)

 चौदहवीं किस्त (जीवन भी एक आदत है और आदत ही आदत की दुश्मन है)

 जो जीवन एक प्रोग्राम है, जो स्वयं उच्चीकरण कर लेता है एक अदद शरीर उसे अनुकरण करने के लिये बाध्य है अगर जो प्रोग्राम को उठा न सके वो शरीर फेल होने लगता है A पर कदरन दो-दो तरीकों से ये चींजे परिभाषित की जाती हैं जिस कारण शरीर फेल होता ही दिमाग भी अनुसरण करने में चुक जाता है A पर परिस्तिथियों को साध कर पूर्वनिर्धारण करके चलता आदमी जीवन को हर हाल में किसी भी कठिन रास्ते से निकाल ले जाता है A शरीर हर पल चौंकन्ना हो और दिमाग स्वस्थ मौलिकता और जिज्ञासा से लबरेज हो तो रास्ते तो खुलने ही लगते हैं और नयी चुनौतियों का पूर्वाभास कर नये संभावित रास्तों और औजारों के लिये खाके भी तैयार कर लेते हैं |

सच मानों तो कितना भी कठिन जीवन क्यों ना हो, अगर वो आपकी आदत में ढल जाये तो रास आने ही लगता है आदतन हर इंसान के भीतर एक चरवाहा, एक किसान, एक खोजी का स्वभाव मौजूद होता ही है A सभ्यता के इतने पड़ाव पार करके यहां तक पहुंची इंसानी जमात अपने साथ कई लासे-फंदे भी लायी है कुछ हाथों में औजार के रुप में हैं तो कुछ दिमाग में बारीक जाल के रुप में A चरवाहों का रेवड़ और गडरिये उतर आये हैं खरीद-बेच की बस्ती में सभ्य सुशील व्यौपारी मीठी जबान और तीखे तराजू-कांटों से लैस हैं, हर तौल को ऐसा तोलते हैं कि बढ़ती उनकी ही तरफ गिरे पर व्योपारी का वंश भी अगर पुराना है तो चरवाहों की सरलता भी बड़ी पुरानी है A वे मामले को इतना ढील देते हैं कि समेटने की आदत से मजबूर व्योपारी हर चीज को समेटता है और जब तक समेटने में भटकता है तब तक चरवाहा अपने मतलब का भाव निकाल लेता है |

यहां गांव-गधेरों में सड़कों में रेवड़ और पड़ावों मे रखवाली के तमाम तरीकों के बाद भी गांवों के लड़के कहीं ना कहीं मौका ताड़ कर बकरी या भेड़ पार कर देते हैं, बेजान जानवर इंसानी धात लगाकर किये हमले का प्रतिरोत नहीं कर पाता मुंह से आवाज निकालने पहले ही सांसे घोंट दी जाती है, पट्ट बंद मुँह और नाक बस आंखे फट पड़ती हैं और चरवाहों के रेवड़ से एक जानवर कम हो जाता है A दस-पंन्द्रह का नुकसान चोरी से, इतना ही बन बिभाग और सरकारी कारिंदों को राजी से भेंट करना ही पड़ता है, ये नुकसान भी पहले से तय होता है पर यहां शिकारी ,चोर और दबंगयी के नुकसान को तय किये अनुमान से हमेशा बहुत कम रखा जाता है कमाल होती है चरवाहों की नजरें भी झुंड़ देखकर ही गिनती की घट-बड़ भांप लेते हैं आप सर मारते रहो कि ऐसा कैसे संभव है पर पीढ़ियों से बनी आदत है…………(क्रमश:)

 पनद्रहवीं किस्त (ऊँचाई में अभिमान नहीं गहराई में निराशा नहीं)

 रेवड़ की घट- बड़ पर पैनी निगाह रहती है, पसेरी की बढ़त हो तो छटांक भर का नुकसान कोई मायने नहीं रखता पर, हाय-तौबा दिखाने का अवसर मिल ही जाता है, ये भी ना करेँ तो चरवाहे के भीतर का व्यापारी गुण फीका पड़ने लगता है । इन निचली गरम घाटियों में जल, जंगल, जमीन के मुद्दे सिटौले की कहावत की तरहा दोहराये जाते हैं पर गाड़-गधेरे-नौले-धारे हांफ रहे हैं, मनख्यों का सैलाब क्षुधित और अधीर हो अंधाधुंध चरने में लगे हैं और असहनीय कचरा पीछे छोड़ जाते हैं और ये कचरा विचारों में आचरण में, यहां तक कि भावी धरोहर के रुप में ध्वंसावशेष रह जायेगा रामसिंह जी खिन्न होकर सोच रहे हैं।

हुर्र-हुर्र होट-होट लै लै लै की पेशेवर चरवाहा आवाजों से कायदे में लाते अपने रेवड़ को हांकते रम दा मुझे रिक्रूट सधाने वाले आफीसर जैसे लगते हैं उनके अपने दिमाग भर ज्ञान में बेकायदे दिखने वाली इंसानी जमात की आपाधापी को कायदे में लाने के लिये कुछ अपने मौलिक और सादे विचार हैं पर तकनीक और तरक्की के मौजूदा तरीकों के लिहाज से वे अति पिछड़े हैं|

अति उन्नत अहंकारी दिमागों में विज्ञान अब मिसाईलों और ड्रोन तक इंसानी रेवड़ हाँकने के उन्नत समाधान ढूंढ चुका है और वे दूर की हांकते भी हैं तो बकरियों के सोटे के साथ ।

”जीवन अनेक रुप में जिया जाता है” वे मुझे समझाते हुए कहते हैं- पर जीवन का असल रुप एक ही होता है, हां रंग अलग हो सकता है गोधूलि की सांध्य वेला में डेरे की तरफ भरे पेट वाले जानवर लौट रहे हैं प्रकृति मानो मौन हो जाती है, ऐसे क्षणों में, हम डेरों में लौट आये चूल्हे के धुयें की लकीरें आसमान में जाकर फैल कर मिटती दीख रहीं थीं. चाय पीते हुए मैं चरवाहों के इस कुनबे के जीवन के बारे में सोच रहा था तो पता नहीं क्यों ? ये शब्द मेरे दिमाग में आये, कि ऊँचाई में अभिमान नहीं, गहरायी में निराशा नहीं………………(क्रमश:)

 सोलहवीं किस्त (ठिकाना-डेरा साथ रहे,न आगे चले न पीछे चले,चलते रहे और आदमजात रहे)

 सुविधाजनक जिंदगी से दूर यहां तो बस वन्यता है ज्यों-ज्यों उतरते जाओ सघनता है पर कभी जो अनछुयी बेदाग धरती के हिस्से थे वे अब दाग-दगीले और इंसानी जख़्मों के निशान लिये थे पर वनोँ की वन्यता और मरमरी हवा के बीच वनों, घाटियों का सूकून भरा एकांत तो कहीं-कहीं खूब मिलता है, हरी घास इफरात में डंगर-खूब चरते हैं, चौंक-चौंक जाते हैं जानवर कभी सड़कों पर चलती गाड़ियों के तीखे हार्न सुनकर पर इन गाड़ियों के मालिकों को पता होगा कि पहला हार्न (सींग की तरहा मुड़ा बाजा) चरवाहों ने ही इजाद किया बस किसी उत्सव के लिये पर ये कमबख्तों ने तो हांका लगाना शुरु कर दिया A इससे क्या ? लोग हैं कितना शोर मचाते हैं ।

ठीक भी है बगैर शोरोगुल के यहां जियें भी तो कैसे ? रामसिंह जी ने तय किया था कि अब दो पोतोँ के लिये भी परिवार जोड़ देना चाहिये ताकि कुनबे का रेवड़ जगह पर बना रहे, इसलिये उन्हौंने पुराने परिचित चरवाहे परिवार को तय किया था लड़कियां भी वही चल पायेंगी जो ऐसे कष्टकर माहौल में पली-पढ़ीं हों कुदरत की सच्ची पाठशाला में कठोर वक्त के सच्चे मास्टर की कक्षा में नकली मास्टरों का सतही और छिछला ज्ञान न तो उंचाईयों की समझ रखता था और गहरायों की खोज की ताब न रखता था A वे तो पैमाना माप के तौल कांटे के उस्ताद हों तो हों ।  जीवन सादा और नजर पारखी समझ के सादे शब्द जो सीधे और लागू करने लायक हों तो प्रपंच और छद्म के लिये तो कोई स्थान नहीं बचता ।

एक कामकाजि थकावट भरे दिन की एक शाम देर रात तक अच्छी दावत और घर की बनी शराब के तेज घूंटों के बीच तय हुआ नये रिश्ते का ताना-बाना तरीका वही पारंपरिक रहा कि दो भावी युवा दूल्हे और उनके साथ दो सयाने भेड़-बकरियों का एक छोटा रेवड़ लेकर अपने भावी ससुर के रेवड़ के साथ साझा चरायी करेंगे और इतने समय में समझने वाले एक दूसरे को समझेंगे पुरानी कहावत भी है कि “ऊन धोने से और आदमी साथ रहने से ही समझ आता है”|

आधुनिक दूनियां में फैले उलझे ऊन के गोले की तरहा फेसबुकिया परिचय की तरहा नहीं जो कटे में पेशाब करने के काम भी न आये पर ढपोरशंखी देवता की तरहा बातों की ठग-माया में मन को कुम्मरों में उलझा दे, ये जीवन सच और तीखा है आभासी नहीं ।

अगली सुबहा रेवड़ के दो हिस्से अलग-अलग राह चले एक शारदा नदी के साथ वहां तक जहां से मैदान शुरु होता है और रामसिंह जी ने कोसी नदी का किनारा, तो कौल-करार बोल-बचन तय हूए और तय हुआ कि गर्मियों की शुरुआत में फिर उंचाइयों पर मिलेंगे । डेरा-ठिकाना साथ है न आगे चले ना पीछे चले बस चलते रहे और आदमजात रहे वक्त को वैसे तो हरेक ने अपनी तरहा परिभाषा दी पर बाज के साथ घोंघें भी चले आये हैं अपना वंश लेकर आगे भी चलेंगे पर कुदरत मुस्कुराती है वक्त थमता नहीं मंद मंद मुस्कुराता है और जब लगता है कि चाल समझ में आ गयी तब तक वक्त बदल जाता है…………….(क्रमश:)

 सत्रहवीं किस्त (कितना भी कायदा बाँधों कुदरत का कायदा बड़ा बेकायदा होता है)

 जहां नदियाँ मिलती हैं वहां दो तरह की रवायतेँ और जीवन सार भी मिला करते हैं, पहाड़ों की ऊँची-ऊँची दीवारों की हदबंदियों से नजदीकी रास्ता बनाती, जिद्दी से जिद्दी पहाड़ भी अगर रास्ता रोके तो भी नदी एक निराले मनुहार के साथ मान रखते हुए नया कोलाज बनाती हुयी ऐसे निकल जाती है कि जिद्दी पहाड़ अपनी उंचाइयों से नदी को बहते हुवे देखता रह जाता है और चट्टानी ताकत के बावजूद नदी की चतुराई  पर अपनी अबूझ भाषा में मुस्कुराता है तो मंद समीर बहता है पेड़ों पर लयबद्ध सरसराहट के साथ ।

इधर नीचे दो नदियों कोसी और शारदा के रौखड़-रिवाड़ों, पगडंडियों से ,डामरी सड़कों से रेवड़ चरते गुजरते जा रहे हैं, एक में रामसिंह जी है शारदा के किनारे-किनारे तो कोसी के किनारे जगतसिंह जी पहाड़ों की तलहटी में जहां नदी बहती है, गांव-कस्बे संपन्न दीखते हैं चहल-पहल होती है लगता है मानो चींटियों का झुंड ठहर सा गया हो A नीचे नदी से आती जाती गाड़ियां-मोटरें आती जाती सरपट भागती चींटीयों सी मानो कतार भर चींटियां यहां-वहां दौड़ती फिरती रुकी टोह लेती सी भी । और कदरन उंचाई पर बसे गाँव बारिश के भरोसे हैं चौमासे में तो खूब फलते हैं पर गर्मियों में निपट सूखे और बासिंदे भी भरे मन लिये हुए से बोझिल से कहीं निपट सूखे से पहाड़, तो कहीं खूब-खूब हरियाली से लदे-लदे निचली सूखी जगहों से रेवड़ जल्दी गुजर जाये तो अच्छा है A घास-चारा तो दूर पत्ती सूंघने को जानवर तरस जायें और नदी के किनारे डांसी पत्थरों गंगलोड़ो से बेतरह पटे हुए नदी के बीच बड़े-बड़े पत्थर बेकायदा पड़े हुए मन करता है काश कुदरत ने कायदे से ये पत्थर चुन-चुन कर किनारे रख दिये होते तो नदी भी सहजता से बहती और सुंदरता किनारों को भी निखरती, पर कितना भी कायदा बांधों कुदरत का अपना कायदा है Aबदसूरती को वो छिपाती नहीं ये भी जरुरी सबक देती है कि बदसूरती जरुरी है अगर ना हो खूबसूरती का भी अस्तित्व ना हो यहाँ तक कि खूबसूरती का ख्याल ही ना बने ।

नदी भी ज्यों-ज्यों मैदानों के करीब आती जाती है मानो “निसास” से भरी जाती रोती हुयी सी बहती है मानो पहाड़ों को मुंह न दिखायेगी और तब किनारे चौड़े होने लगते हैं और नदी अपने कम पानी के आकार पर सकुचाती सी बहती है, वहीं बड़े आकार की नदी जो तंग किनारों पर हरहराती क्रुद्ध बहती हैं चौड़े पाट मिलते ही निखर जाती हैं रामसिंह जी के इस नदी ज्ञान को मैंने आपको बाँटा है, हिंदी शब्द देकर ना तो  उनकी भाषा के जीवित जागृत शब्द तो व्याकरण के फंदों से बाहर है लंबी छोटी भावनाओं को व्यक्त करती उनकी भाषा खुद में कभी नदी है तो कभी पहाड़ पर आज तो सफर की शाम होती है  चलते-चलते………….(क्रमश:)

 अठ्ठारहवीं किस्त (हम भी तुम भी दोनों आमने सामने हैं पर दोनो में कितना फासला है)

गरम दोपहर में बंद से पहाड़ों की नदी घाटियों से आसमान भी सीमित और धूसर लगता है और दूर धार कभी-कभी बहुत दूर लगती है और छल-छल बहती छिछली नदी का सूसाट मंद पड़ जाता है, एक टुकड़ा भर बादल सफेद पड़े आसमान में आवारा भटकते-भटकते छितरा कर खतबम हो जाता है A  मधुवा लाटा गधेरे से खूब सारे गिङाज (केकड़े) और कीते (छोटी मछलियां) पकड़ लाया कभी इन्हीं गधेरों में मोटी-मोटी मछलियां हरे-हरे खावों (छोटे तालाबों) खूब दीखती थी, अब तो वैसी मछलियां दुर्लभ हो गयीं A कारतूस और ब्लीचिंग पाऊडर डाल कर मछलियां उजाड़ दी लोगों ने, नदी उपर बकरियां डंगर भेड़े चर रहे हैं कुरी के बूजों (झाड़ियों) में खूब छड़बड़ाट हो रहा है एक दाड़िम के पेड़ की छाया में चूल्हे में भात पक रहा है, एक मोटा भोटिया कुत्ता ध्वां-ध्वां-ध्वां-ध्वां जीभ निकाले गरमी से बेहाल गधेरे के पानी में घुस गया जगतसिंह जी ने साफ पत्थरों में मसाला पीस लिया गिंङाज का और मछली का झोल-बांट बनेगा |

मधुवा ने तल्लीनता के साथ गिंङाज और मछलियां साफ कर ली एक जना गधेरे के किनारे पड़ी प्लास्टिक की बोतलों को खूब साफ करके एक सोते का ठंडा पानी भर लाया A गरमियों को धोपरी (दुपहर) में पता नहीं क्यों थाली भर-भर भात पचकाने वाला मधुवा भी दो थाली से ज्यादा नी खा पाता, खाना चल रहा था और थाली में  भात ओलते हुए जगतसिंह ने बताया कि भाबर के रेवड़ों तक पहूंच गये हैं और अब कुछ दिन यहीं रुकेंगे फिर हम लोग वापस हो लेंगे, यहां तो बाग (बाघ)लगने का खतरा भी है, खाली ज्यादा आगे जाने का झंझट ठीक नहीं होगा |

मधुवा ने इशारों से बताया कि खूब चारा है इस लिये कुछ दिन ज्यादा रुका जाय, खाना खतम करके ये लोग सुस्ता रहे थे तभी दो कारों से छ: सात बियरधारी भाबरिये भाबर की गरमी और पैसों की गरमी से बेहाल पिकनिक मनाने नदी में नहाने उतर आये, सबके फांचे जैसे मोटे ल्धोडे (तोंद) निकल आये थे जगतसिंह जी ने बताया ध्यान रखना इनका ये लोग एकाध पाठा (बकरी का बच्चा) ना चुरा लें, हां अगर खरीदें तो भाव-ताव कर लेना पकाने को बोलें तो पका देना पर पैसे ले लेना A ज्यादा मुंह मत लगना इनके ये तो खाये-बमकते लोग हैं, सरकारी नौकरी वाले ठेकेदार फार्मर पता नहीं कौन क्या हो ?

तो सावधान रहना सबने जगत सिंह जी की बात पर तत्तकाल अपनी-अपनी पोजीशन तय कर ली । बूढ़े चरवाहे जगतसिंह का इन शहरी लोगों के प्रति मन में कोई मैल न था पर………………….(क्रमश:)

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