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Mar
29

पहाड़ों में क्यों नहीं टिकती पहाड़ों की जवानी?

आज के समय में पहाड़ो में ‘पलायन’ एक बहुत बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है| आज जब हमारा पहाड़ प्रगति की और अग्रसर है, तब सोचने वाली बात यह है की पहाड़ का युवा वर्ग पहाड़ में रहकर रोजगार करने के बजाय शहरों को और क्यों अग्रसर हो रहा है ? शहरों में ऐसा क्या है जिसके चलते पहाड़ के युवा शहरों की तरफ खिंचे चले जा रहे हैं| हमारे पहाड़ तो भारत की आत्मा है, आज जब लोग दूर-दूर से आकर पहाड़ो में रोजगार के अवसर बढ़ाने में लगे हुए हैं तब क्यों हमारा युवा वर्ग शहरों की और आकर्षित हो रहा है?

किसी का तो इंतज़ार करतीं होंगी ये बुढी आँखे..

इसका सबसे प्रमुख कारण ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी का अभाव है| ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ कृषि ही आमदनी का एक जरिया है| बिखरी जोतों के कारण मध्य हिमालयी क्षेत्र की कृषि अनुत्पादक बन गयी है| इसके कारण भी पलायन और अधिक बढ गया है|  ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश खेत बिखरे हुए है जिससे उत्पादन में प्रभाव पड़ रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों की भूमि का लगभग १०% भाग ही सिंचित है| ऊपर से अतिवृष्टि,भूस्खलन,ओलावृष्टि और सूखा इस कृषि की कमर तोड़ने के लिए हर वक़्त तैयार रहते है| अनुपयोगी कृषि और कोई दूसरा विकल्प नहीं होने के कारण पहाड़ पलायन का गवाह बन गया है|

इसका एक और  प्रमुख कारण शहरों का ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक विकसित होना है शहरों में रोजगार के अच्छे अवसर मिलते हैं | लगभग सभी प्रकार के उद्योग धंधे शहरों में ही स्थापित किये गए हैं जहाँ पर रोजगार करके युवा वर्ग अपना जीवन-यापन भली-भांति कर सकता है|

तीसरा कारण है गावों में बेहतर शिक्षा का अभाव | हर माता पिता का सपना होता है की उनका बेटा भी अच्छी शिक्षा प्राप्त कर उच्च पद को हासिल करे और एक बेहतर इंसान बने| यह तभी हो सकता है जब उसे उच्च शिक्षा मिले और इसका एक ही स्थान है शहर| लगभग सभी अच्छे स्कूल और यूनिवर्सिटीज शहर में ही स्थापित है जिसके कारण आज का युवा वर्ग शहरों की और आकर्षित हो रहा है और आधा पहाड़ शहरों में बस गया है|

इसका एक और कारण जो उभरकर सामने आ रहा है वह है आज के युवाओं के मन में पहाड़ के जीवन को लेकर गलत सोच| आज का युवा वर्ग पहाड़ में रोजगार को हीन दृष्टी से देखता है वह पहाड़ में रहकर पहाड़ की तरक्की में योगदान देने के बजाय नाम और शोहरत कमाने के लिए शहरों का रुख कर रहा है| भले ही उसे शहर में कोई छोटा-मोटा काम ही क्यों न करने पड़े वह बड़े शौक से करता है पर पहाड़ में रहकर काम करना उसे बिल्कुल गवारा नहीं है|

हमें और हमारी सरकार विशेषतः राज्य सरकार को लगातार हो रहे पलायन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए| इसके लिए सर्वप्रथम गावों में उद्योग-धंधों की स्थापना करनी चाहिए| दूसरा कदम यहाँ पर उचित शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए| स्कूलों और कालेजों में मुख्य शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी शिक्षा को भी बढ़ावा देना चाहिए और समय- समय पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए जिसमें युवा वर्ग को स्वरोजगार के गुणों के बारे में बताया बताया जाय और स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित किया जाय| कृषि की स्थिति में सुधार के लिए खेतों की चकबंदी की जानी चाहिए और किसानों को अच्छे किस्म के बीज व खाद के अलावा ब्याजमुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि लोग कृषि को भी रोजगार के रूप में अपना सकें और इसके जरिये अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण भली-भांति कर सके और लगातार हो रहे पलायन पर ब्रेक लग सके|

इस समस्या पर मुझे श्री जगमोहन जिज्ञासु जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं …श्री जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू” के शब्दों में ………..

होता रहेगा जब तक,
रुकने का इंतजाम न होगा,
रोजगार का सृजन,
गाँव के स्तर पर,
कुटीर उद्योग के रूप में,
और पर्यटन नहीं तीर्थाटन.

आगंतुक के मन में आस्था,
पहाड़ के पर्यावरण के प्रति प्रेम,
वहां के समाज का सम्मान,
पहाड़ के उत्पाद की खरीद,
और अपने मन में ले जाए,
देवभूमि उत्तराखंड की तस्वीर.

जो हमारा था अपना,
उसे मिटाने में हमारा हाथ,
जैसे अपनी बोली भाषा,
हमारी संस्कृति, धरोहरें,
पारंपरिक उत्पाद,
पर्वतीय तकनीकी,
ये सब कुछ होते हुए,
हमारे मन में,
पहाड़ छोड़ने की ललक,
पैदा कर रही है पलायन,
तनिक सोचो और,
इनमें तलाशो, पहाड़ में,
सुखमय जीवन की तलाश.

आज पर्यटन का कोढ़,
लील रहा है पहाड़,
जिसे सरकार की नीति,
दे रही है बढावा,
और पैसा लगा रहे हैं पहाड़ पर,
धनी बाहरी लोग,
खूब कमाने के लिए,
बिस्वास नहीं तो जाओ देखो,
औली,कौडियाला,मसूरी,नैनीताल,
रानीखेत, कौसानी,
कितने पहाड़ियौं के हैं,
होटल, मोटल और लाज,
जो पाश्चात्य संस्कृति के हैं प्रतीक,
पहाड़ के लोगों, अगर आप,
छान बनाकर खोलते अपना ढाबा,
बेचते वहां पर पहाड़ी उत्पाद भी,
क्या जरूरत थी पलायन की?
लेकिन, अपनी जमीन भी बेच दी,
उन लोगों को, जो पहाड़ पर बढायेंगे,
पर्यटन संस्कृति,
और वो दिन  दूर नहीं जब वे,
करेंगे कब्जा, आस्था के स्थलों पर,
पैसा कमाने के लिए.

अरे! पहाड़ी तू कितना भोला है,
या आज आलसी हो गया,
आधुनिकता की दौड़ में,
तुझे तो अपने यहाँ तक पहुँची,
काली सड़क भली लगती है,
और भाग जाता है गाडी में बैठकर,
नदी घाटियौं के किनारे किनारे,
नदियौं को निहारते निहारते,
पानी भी तो भाग रहा है,
पहाडों से दूर मेरी

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