Jan
19

भौं भौं प्रकारा मूत गुण अर उपयोग

 

भौं भौं प्रकारा  मूत  गुण  अर   उपयोग 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

(महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )

 खंड – १  सूत्रस्थानम पैलो अध्याय ९३  बिटेन  – तक 

अनुवाद भाग -   १३ 

अनुवादक - भीष्म कुकरेती 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

s= आधी अ

-

!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

-

आठ मुख्य मूत्र -

अब जु मुख्य मूत्र आत्रेय  ऋषिन बतैन   ऊ  छन -

ढिबरौ मूत , बखरौ मूत , गौड़ी मूत , भैंसौ मूत , हाथीs मूत , ऊंटौ मूत , घ्वाड़ा मूत ार गधा मूत  I  ९३

यि  आठ प्रकारौ मूत गरम , तीक्ष्ण , रूखा , कड़ु रस , लूण्या रस युक्त छन।  अठी प्रकारा मूत उपसादनम , आलापन म, लेपम , आस्थापनम , निरुहम , विरेचनम ,स्वेदनम , नाड़ीस्वेद (स्वेद =पसीना ) , अनाड़ म (अफरा ), विषनाशम उपयोग हूंदन।

उदर रोगुंम , अर्श रोगम , गुल्म , कुष्ठम अर  किलासम , उपनाहम ,पुलटिस आदि सेचन कार्यम , उपयोग हूंदन।  यी मूत अग्निदीपक, विषनाशक, अर कृमिनाशक बुले जांदन।  यी पाण्डु रोगियूं  कुण पीणो , आहार अर  भेषज आदि म , उत्तम , हितकारी छन।  पियूं  मूत कफौ  शमन करद।  वायु कु अनुमोलन (पेट क गाँठ  सही  करण )   म उपयोग अर  पित्त तै अधोभाग म खैंचद अर पित्तौ  विरेचन करदन।  ९४ – ९९

 

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल )

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद ;

Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  first-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita

 

Jan
19

व्याधि भाव अभिनय: व्याधि भावौ पाठ खिलण

 

 

 

व्याधि भाव अभिनय: व्याधि भावौ पाठ खिलण 

 

गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण

Performing Disorder  Sentiment  in Garhwali Dramas 

( इरानी , अरबी शब्दों क वर्जन प्रयत्न ) 

  

भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय – 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा -  55

s  = आधी अ

भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती 

व्याधयस्तैsपि  खलु मुखविकूणनगात्रस्तम्भस्रस्ताक्षिनि: श्वसनस्तनितोत्क्रुष्टवेपनादिभिरनुभावैरभिनेया:।  

(,८२ कु परवर्ती गद्य )    

गढ़वाली अनुवाद व व्याख्या  – - 

अनुवाद – व्याधि पाठ खिलणो कुण मुख मुंजमुंज (सिकोड़ना ) करण,  सरैल का अंग जड़वत करण आंख्युं म भारीपन दिखाणलम्बी लम्बी सांस लीण , कम्मण  अदि करतब  करे  जान्दन। 

व्याख्या -  वैद्य शास्त्र म सरैल म वात , पित्त अर  कफ कु  असंतुलन से व्याडि उतपन्न हूंद।  यूं  तिन्युं म विकार से चित्त वृति बिगड़दी च।  यीं  चित्तवृत्ति तैं  व्याधि बुल्दन।  व्याधि भौं भौं प्रकारै हूंद अर  वे अनुसार इ  अभिनय करे जांद।

गढ़वाली  लोक नाटकों     व्याधि भाव  उदाहरण -

गढवाली लोक नाटक में व्याधि   भाव

यह नाटक हम बच्चों /युवाओं ने जसपुर, मल्ला ढांगू , पौडी गढ़वाल के भटिंडा डांडा में  1968-69 खेला था।

रोगी (पीड़ा से बिलखते हुए, कभी  इधर कभी उधर  ) – ए ब्वे मोरि ग्यों।  शूल पीड़ा हूणी च। ब्वे असह्य पीड़ा ! मोरि ग्यों

रोगीक ब्वे -फिकर नि कौर।  हम कुछ ना कुछ करला।

रोगी (रुंद ) -अबि कुछ कौर

ब्वे -त्यार  काका तैं पुछेरम भेज्युं च

काका – मि पुछेर बिटेन पुछि ऐ ग्यों।  बकीन बोल बल नागराजा द्वाष च।  नागराजा को घड्यळ धरण पोड़ल।

ब्वे- ठीक च आजि रात नागराजा को घड्यळ धौरि दींदा।  जा जागरी जी तैं सुचना दे दे।

रोगी  (किरांद -किरांद ) – अरे वैद जी तैं बी बुलावो

अंत में हमने नागराजा का जागर गाया था और नाचे थे।

 

 गढ़रत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई

भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा

गढ़वाली काव्य म  व्याधि  भाव ; गढ़वाली नाटकों म  व्याधि भाव ;गढ़वाली गद्य म   व्याधि भाव ; गढवाली लोक कथाओं म   व्याधि भाव

Raptures in Garhwali Poetries, Disorder  Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature, Disorder Sentiments   in Garhwali Poetries,  Disorder Sentiments in Garhwali Proses

 

Jan
19

CEO must Strengthen Employees (CEO must make Empowered Employees)

CEO must Strengthen Employees (CEO must make Empowered Employees)

Understanding Foreign and Defence Policies through Shukraniti by the CEOS

Dealing Strategies with the Friend and Enemy to be known by the CEO -22

(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)

(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)

Successful Strategies for successful Chief executive Officer – 230

Guidelines for Chief Executive Officers (CEO) series – 230

By: Bhishma Kukreti (Management Acharya)

s = आधी अ

स्प्रजा  दंडभेदैश्च  भवेद्राज्य विनाशनम् I

हीनाधिका यथा नु स्यु : सदा रक्ष्यास्तथा प्रजा:

If a King raises his citizens by Punishment and separation policies, the kingdom will surely be destroyed. That is why the king should raise by those policies that the citizens don’t become weak and powerless but the citizens become strong and empowered.

(Shukra Niti Fifth Chapter Mitra -Amitra Lakshan second 41)

Methods for f Empowering /Strengthening Employees-

The CEO must recognize the fact there should be a culture for developing the employees (strengthening) by –

There must be a regular review of the needs of the employees are met.

There must be a culture of recognizing the achievement of the employees.

The employees must get growth opportunities in the organization.

There must be a skill development culture in the organization and employee training programs.

There must e an office mentoring culture in the organization.

CEO must encourage cross-departmental training.

Let the employees get outside training.

The employees must be involved in decision-making processes.

References

1-Shukra Niti, Manoj Pocket Books Delhi, page -178

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2020

Jan
18

कापकोट (बागेश्वर ) के एक भवन में ‘कुमाऊं शैली; की ‘काठ कुर्याणौ’ ब्यूंत’ की काष्ठ कला अलंकरण, अंकन

कापकोट (बागेश्वर ) के एक भवन में ‘कुमाऊं शैली; की ‘काठ कुर्याणौ’ ब्यूंत’ की काष्ठ कला अलंकरण, अंकन
Traditional House wood Carving Art in Kapkot Bageshwar, Kumaun
कुमाऊँ, गढ़वाल, के भवन(बाखली, तिबारी,निमदारी,जंगलेदार,मकान, खोली,कोटि बनाल) में ‘कुमाऊं शैली; की ‘काठ कुर्याणौ’ ब्यूंत’ की काष्ठ कला अलंकरण, अंकन- 389
संकलन – भीष्म कुकरेती
-
धीरे धीरे बागेश्वर से भी मित्र भवनों की सूचना प्रेषित कर रहे हैं परोक्ष या अपरोक्ष रूप से । आज कपकोट के एक भवन (होम स्टे ) में ‘कुमाऊं शैली; की ‘काठ कुर्याणौ’ ब्यूंत’ की काष्ठ कला अलंकरण, अंकन पर चर्चा होगी।
कपकोट का प्रस्तुत भवन (होम स्टे ) दुपुर /दोतल व दुकग्नड़ है। भवन में उत्कीर्णन विशेष नहीं है किन्तु शैलीगत कटान से भवन में काष्ठ कटान की विशेष शैली विद्यमान है।
कपकोट के प्रस्तुत भवन के भ्यूंतल में कक्ष भंडार हेतु प्रयोग हो रहे हैं व इनके कक्षों के द्वारों, खिड़कियों में व सिंगाड़ों में ज्यामितीय कटान हुआ है.
कपकोट का प्रस्तुत भवन (होम स्टे ) में खोली भ्यूंतल (ground floor ) से पहले तल तक गयी है। खोली के स्तम्भ/सिंगाड़ भी ज्यामितीय कटान से सपाट काटे गए हैं। खोली के शीर्ष /मुरिन्ड /header में अंदर की और टोटरनम स्थापित है व यह भी सपाट कटाई से निर्मित है। ऊपरी मुरिन्ड /header भी चौखट है व स्पॉट कड़ियों से निर्मित हैं।
कपकोट का प्रस्तुत भवन (होम स्टे ) के पहले तल में खोली शीर्ष के दोनों ओर एक एक जोड़ी छाज स्थापित हैं। छाजों के स्तम्भ सपाट कटान के हैं। छाजों के छेद के ऊपर तोरणम हैं जो ज्यामितीय कटान के सपाट हैं। खड़कियों के पटलों /panels व स्तम्भों में भी ज्यामितीय कटान हुआ है।
निष्कर्ष निकलता है कि कपकोट का प्रस्तुत भवन (होम स्टे ) में ज्यामितीय कटान से कटाई हुयी है किन्तु शैली आकर्षक है। भवन आकर्षक है।

सूचना व फोटो आभार: सुरेंद्र लोहानी
यह लेख भवन कला संबंधित है नकि मिल्कियत संबंधी Iभौगोलिक व मालिकाना सूचना श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए सूचना दाता व संकलन कर्ता उत्तरदायी नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
कांडा तहसील , बागेश्वर में परंपरागत मकानों में काष्ठकला अंकन ; गरुड़, बागेश्वर में परंपरागत मकानों में काष्ठकला अंकन ; कपकोट , बागेश्वर में परंपरागत मकानों में काष्ठकला अंकन )

 

Jan
18

स्नेह /चर्बी , लूण प्रकार अर यूंक कर्म

 

स्नेह /चर्बी  , लूण   प्रकार अर  यूंक  कर्म 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

(महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )

 खंड – १  सूत्रस्थानम पैलो अध्याय ८६ बिटेन  – ९२  तक 

अनुवाद भाग -   १२ 

अनुवादक - भीष्म कुकरेती 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

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!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

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 चार स्नेह -

घी , तेल , वसा /चर्बी, अर  मजा  यी चार स्नेह  छन।  ८६

यूं स्नेहों कर्म -

यी चर्री  स्नेहों  सरैल म मुख मार्ग से दीण, मालिश करण , गुदा या उप स्थानों म दीण  अर  नाक से दीण  पर  प्रयोग हूंदन।  यी स्नेह सरैल तै  कोमल  करदन, सरैल तैं  जीवन दींदन , बल अर  शक्यात  वृद्धि करदन।  यी स्नेह बात , पित्त अर  कफ नष्ट करदन।  ८७

लवण -

पांच प्रकारो लूण  हूंदन – सैंधव (सर्वश्रेष्ठ लूण ) , सैंचल।  काळो  लूण , काचो लूण  अर  समोदरो  लूण।  ८८

लवणों कर्म -

यी लूण  स्निग्ध , उष्ण , तीक्ष्ण , अर  अग्नि वृद्धि करण  (दौंकार )  वळ  हूंदन।  यी लूण  आलोपन (humidity ) , स्नेहन (चिकनाई ) म ,  पसीनाम , अधोभाग विरेचन ,  ऊर्घ्व  विरेचन (दस्त )  द्वारा दोषों तैं  भैर गडणम , निरुहण , अनुवासन म ,अभ्यंगम , भोजनम ,ार शिर विरेचनम ,शस्त्र कर्मम फल वर्ति आदिम, अंजनम , उबटनम , अजीर्णम ,अफारेम , वायु रोगम , गुल्मम ,शूल रोगम, उदर रोगोंम काम आंदन।  ८९-९२

 

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल )

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद ;  चरक संहिता में चर्बीयुक्त पदार्थों का पयोग , चरक संहिता में नमक पदार्थं का प्रयोग

Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  first-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita, Types  and  Uses  of  Fats  and  Salt  in  Charak Samhita translated  by  Bhishma  Kukreti

 

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