Mar
28

संसोधित गटकोट (मल्ला ढांगू ) की लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार

संसोधित गटकोट  (मल्ला ढांगू ) की लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार

 

संसोधन में कमल जखमोला की महत्वपूर्ण भूमिका है

ढांगू संदर्भ में गढ़वाल की लोक  कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  – 5

(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी अपरिहार्य नहीं है )

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संकलन – भीष्म कुकरेती

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गटकोट मल्ला  ढांगू का एक महत्वपूर्ण ही नहीं प्राचीन गाँव है. गटकोट के बारे में कमल जखमोला गटकोट  को खस समय का वसा गाँव बताते हैं।

गटकोट के दक्षिण  में मंडळु गदन , पश्चिम में हिंवल नदी तो पूर्व में घणसाळी , जल्ली , व उत्तर में मित्रग्राम, पंयाखेत  गाँव हैं. गटकोट की जमीन मंडुळ पार गुदड़ में भी है।

अन्य गढ़वाल क्षेत्र की भाँति (बाबुलकर द्वारा विभाजित  ) गटकोट   में भी निम्न कलाएं व शिल्प बीसवीं सदी अंत तक विद्यमान थे. अब अंतर् आता दिख रहा है।

अ – संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ

ब -   शरीर अंकन व अलंकरण कलाएं व शिल्प

स -फुटकर। कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि

द  - जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें

अ – संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ व शरीर अंकन

 

 

जखमोला जाति के कई परिवार पंडिताई करते थे तो पूजन समय चौकल में चित्रकारी व दीवाल में पूजन चित्रकारी सामन्य बात है।  विवाह समय हल्दी हाथ  चढ़ाना , वर वधु का मेक अप /शरीर सौंदर्यीकरण , होली वक्त रंग चढ़ाना भी सामन्य कला प्रदर्शन होता ही है।  तेरहवी व बार्षिकी श्राद्ध में वैतरणी पार करने हेतु मिट्टी , चावल से कला प्रदर्शन  गढ़वाल के अन्य गाँव सामान है।  कर्मकांड , धार्मिक उतस्वों की कला भी प्रदर्शित होती है। जनेऊ, राखी  निर्माण गाँव के पंडित करते थे।

ब - अलंकरण कलाएं व शिल्प

सुनार गाँव में न था और शायद अलंकार निर्माण , रिपेयर हेतु गटकोट गाँव जसपुर या पाली पर निर्भर था।  वनस्पति आभूषण भी गढ़वाली गाँव जैसे प्रचलित थे।

स फुटकर कला

कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि    भी सामन्य थी।  गटकोट से कई प्रसिद्ध अध्या पक हुए व वर्तमान में भी हैं व अचला नंद जखमोला सरीखे गढ़वाली  विद्वान् भी गटकोट से ही हुए जिन्होंने गढ़वाली - हिंदी, अंग्रेजी व अंग्रेजी -गढ़वाली शब्दकोश रचा  व अभी सतत कार्यरत हैं । वर्तमान में  गटकोट के कमल जखमोला  गढ़वाली गद्य व कविता में प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं

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द -जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें

ओड /भवन निर्माता – परवीन सिंह , जीत सिंह (म्वारी गाँव )

बक्की /भविष्यवक्ता – गणत हेतु चैनु,  डखु

जागरी – हरकदेव , खीमानंद जखमोला, भगली राम

ढोल बादन – गरीब दास , सतरु  दास , राम दास , मानदास , श्यामदास बच्चू ,

दर्जी – उपरोक्त ढल बादक परिवार

लोहार – मलंगी , तलंगी , थामा , गूड़ी प्रेम ,

मच्छे मार विशेषज्ञ – मुल्तान , चतरु , , मथुरा प्रसाद वर्तमान में रज्जी

बादी – बिजनी के हीरा बादी

कर्मकांडी  ब्राह्मण – आशाराम जखमोला, महाबंद , लीलानंद , ज्योतिराम , आदित्यराम जखमोला वर्तमान में गुना नंद,  प्यारेलाल जखमोला।

चर्मकार – मंडुळ  में चमड़े कमाया जाता था।  कांगड़ा से चर्मकार आये थे (रोशन लाल के पूर्वज ) आज भी मोची छप्पर के नाम से स्थान प्रसिद्ध है

गाँव में तीनेक तिबारियां थीं।  एकतिबारी  पधान  की थी जिसमे लकड़ी पर नक्कासी थीं। शम्भु प्रसाद जखमोला की सूचना अनुसार तिबारी की लकड़ी पर नक्कासी में फूल पत्ती , पशु पक्षी, मोर की पूंछ  थे।

माँगळ  गीत व ने लोक गीत व चैत में गए जाने वाले गेट।  नृत्य , स्वांग – लगभग सभी महिलाएं , प्रत्येक  बारह वर्ष बाद बादी लांग खेलने आते थे व गीत , नृत्य  स्वांग  करते थे ,

थड्या।  चौंफला नृत्य गीत विशेषज्ञ – जल्ली की दादी , संकरी देवी , भगा देवी व अन्य सभी महिलाएं

रामलीला कलाकार – दाता  राम जखमोला, मनोहर , लीला नंद , अभयराम , टंखीराम , अनिल जखमोला आदि

रामलीला के विदूषक – कल्याण सिंह , बीणी राम

गटकोट में उपयोग होते कृषि यंत्र जो गढ़वाल के अन्य गाँव जैसे ही थे जैसे – हल-ज्यू  , जोळ (पाटा ) , काष्ठ दंदळ , लौह दंदळ,   कूटी , भद्वाड़  खणवा कूटी , फाळु /फावड़ा , सब्बल , दाथी , थांत , , कील , पल्ल -टाट ,  कुल्हाड़ी , बसूला , फरसा , मुंगर अधिकतर कुल्हाड़ी , बसूला , फरसा , सब्बल छोड़ कर गाँव में हर परिवार बना सकता था।  अब स्थिति बदल गयी है।

स्वतंत्रता से पहले सफ़ेद कपड़ों पर रंग  हल्दी या ढाक ।  किनग्वड़ से चढ़ाया जाता था तो हरा रंग जौ के पौधों से रंग चढ़ाया जाता था।

 

(आभार – शम्भू  प्रसाद जखमोला, कमल जखमोला  की सूचना पर आधारित ) 

 

 

Mar
28

दिवागी ( उदयपुर ) में सोहन सिंह बिष्ट की निमदारी में भवन काष्ठ कला -अलंकरण

 

 दिवागी ( उदयपुर ) में सोहन सिंह बिष्ट की निमदारी  में  भवन काष्ठ कला -अलंकरण 

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साइकलवाड़ी /दिवांगी  में भवन काष्ठ कला /अलंकरण -2

 

उदयपुर  संदर्भ में गढ़वाल  , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर भवन काष्ठ अंकन कला – 9

Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya

दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल ,स्यूं  अजमेर , , लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण

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गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार भवन   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( अलंकरण motifs )  -  50

Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -

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संकलन – भीष्म कुकरेती

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दिवागी /साइकलवाड़ी वास्तव में  किमसार (उदयपुर पट्टी ,दक्षिण  पश्चिम गढ़वाल  ) के ही भाग हैं।  साइकलवाड़ी /दिवागी से जण द्वीएक तिबारी व निम दारी की सूचनाएं मिली हैं व फोटो आनी बाकी है।  अभी दिवागी (साइकलवाड़ी ) के  सोहन बिष्ट की निम दारी  की सूचना फोटो सहित हरीश कंडवाल ने भेजी है।

दिवागी के सोहन सिंह बिष्ट की  निमदारी  कला दृष्टि से नहीं अपितु बृहद भवन आकर की दृष्टि से भव्य है और अपने क्षेत्र में उच्च श्रेणी  में रखी  जाती रही है।  भवन में पहली मंजिल में काष्ठ जंगला कसा  गया है जिसमे 12 कमरे से अधिक।   भवन तिभित्या   अंदर व एक कमरा  बाहर  शैली में है।

ऊपरी मंजिल के सभी कर्मों को बांधे  काष्ठ जंगला है।     काष्ठ जंगल  तीन ओर से बंधा हुआ व  पूरी जंगले  में 19 से अधिक काष्ठ स्तम्भ है व फिर आधार पर दो फिट के ऊपर रेलिंग है।  जंगले का आधार थांत पट्टी नुमा याने  bat blade  नुमा है व फिर सीधे  ऊपर छत से शीर्ष /मुण्डीर है।  स्तम्भ की पट्टी सपाट है याने कोई   मानवीय व प्राकृतिक अलंकरण दृष्टिगोचर नहीं होते है।  केवल ज्यामितीय कला के दर्शन होते हैं।

ऐसी जंगले दार निम दारी  निर्माण का समय 1970  से पहले ही रहा है।  उदयपुर  ढांगू , शीला में 1970  के बाद मैदानी भवनों की शैली आने लगी थी।

सोहन सिंह बिष्ट की निम दारी   प्राकृतिक व मानवीय अलंकरण हेतु  नहीं याद की जाएगी बृहद आकर हेतु याद की जाएगी व एक समय क्या आज भी सोहन सिंह बिष्ट की निमदारी  दिवागी व साइकलवाड़ी को बृहद बड़ी निम दारी हेतु पहचान (Recognition ) दिलाने में सक्षम है।

 

सूचना व फोटो आभार : हरीश   कंडवाल साइकलवाड़ी 

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020

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Mar
27

बुरांसी (लंगूर ) के अर्जुनदेव डोबरियाल के भवन की लौह लोक कला

 

बुरांसी (लंगूर )  के अर्जुनदेव डोबरियाल के भवन की लौह लोक कला 

 

लंगूर,   गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -2

House Wood  Carving  Art of  Langur Patti  -2

Traditional House Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya

पश्चिम लैंसडाउन तहसील /गंगा सलाण (ढांगू , उदयपुर, डबराल स्यूं , अजमेर , लंगूर , शीला ) गढ़वाल  हिमालय में  तिबारी , निम दारी भवन  कला  व लोक कलाएं

-गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   )  अंकन लोक कला ( विशेष -तिबारी अंकन )  – 49

Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  49

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संकलन – भीष्म कुकरेती

लंगूर गढ़ी या भैरव गढ़ी एक ऐतिहासिक स्थल है जहां गोरखा सेना को बारह साल तक गढ़वाली प्रजा से युद्ध से जूझना पड़ा।  इसी गढ़ी के निकटवर्ती गाँव है बुराँसी।  बुराँसी , प्राचीन ढाकर मार्ग (डाडा मंडी – बांघाट ) में द्वारीखाल , रजकिल , बरसुडी के निकट का गांव है।  रजकिल की भाँती इस गाँव में डोबरियाल बहु संख्या में हैं।  व बुरांसी रजकिल पंचायत का ही भाग है।  बुरांसी  का सीधा सीधा अर्थ है जहां बुरांश अधिक हों याने ऊंचाई वाला गाँव।

पलायन एक चिंतन के टीम सदस्य दिनेश कंडवाल, मुकेश बहुगुणा व मनोज इस्तवाल ने अर्जुन देव डोबरियाल के निमदारी  की सूचना भेजी , बुराँसी के अर्जुन देव डोबरियाल की निमदारी में काष्ठ जंगला  नहीं अपितु पहले मंजिल पर लौह जंगला  है और बारीक स्तम्भ /छड़ी भी लौह के हैं ,  मुकेश बहुगुणा ने सूचना दी कि  अर्जुन देव डोबरियाल  की निमदारी  का निर्माण 1936  में हुआ था व कुल  रु 200   में लौह जंगला  तैयार हुआ था।  जंगले  की विशेषता है कि  बिन जोड़ के यह जंगला  है (मुकेश बहुगुणा की सूचना )

अर्जुन देव डोबरियाल की  निम दारी  की एक अन्य  विशेषता है कि 12 घरों का बड़ा मकान है और आज भी पक्का है याने बास्तु कला में ड्यूरेबिलिटी का नमूना है।

अर्जुन देव डोबरियाल की इस निमदारी की बड़ी विशेषता है कि  लौह जंगले  का निर्माण स्थानीय कलाकारों /मिस्त्रियों ने किया।  अतः   अर्जुन देव डोबरियाल की निमदारी   गंगा सलाण  की लोक कला का अभिनव नमूना है।  निमदारी मेके जंगल में लौह के छः छड़ियाँ व छः जालीदार भाग हैं /

पुरातन शैली का यह एक नमूना है।  लैंसडाउन तहसील के इस ऐतिहासिक जंगले के बारे में अन्य जरूरी सूचनाओं का डॉक्युमेंटेसन आवश्यक है

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सूचना व फोटो आभार :  दिनेश कंडवाल , मुकेश बहुगुणा , मनोज इष्टवाल                                        

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020

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Mar
26

Mention of Treatments while Seeds Germinating in Kautilya’s Arthashastra

Mention of Treatments while Seeds Germinating in Kautilya’s Arthashastra

Agriculture Science in Kautilya’s Arthashastra -5

Applied Botany in Arthashastra -6

Plant Science aspects in Kautilya’s Arthashastra -10

Botany History in Maurya Period -11

BOTANY History of Indian Subcontinent –65

By: Bhishma Kukreti M.Sc. {(Botany), B.Sc. (Honours in Botany), Medical Tourism Historian)

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Kautilya, Chanakya or Vishnugupta took care of each process in cropping in Arthashastra. In 34th paragraph of 24th chapter of 2nd book, Kautilya suggests that there should be supply of compost after seeds germination of the above crops. The compost should be of small fishes and milk. (1). Further, Kautilya explains that by applying the above, there is protection from insects.

Snake Repellent

In 35th paragraph of 24th chapter (Seetadhyaksha) of 2nd book (Adhyaksha Prachar), Kautilya states that if snake skin and cotton are burnt in the farm, the snakes would not appear up to the area where smoke was there. This is snake repellent method (1).

In 36 Paragraph of 24th chapter of 2nd book, Kautilya suggested that the soil is to be mixed with the seeds before sowing and Kautilya suggested a Mantra for chanting at the time of seed sowing in 37 paragraph of 24th chapter of 2nd book.(1)

By the above analysis it might be said that the agriculture science was well developed in Kautilya period (300 BC to 200 AD). The agriculture science   scholars had knowledge of each stages of cropping in India and Kautilya compiled that scattered knowledge in one book. There was system of gathering the knowledge from farmer’s experiences in India.  Agriculture was very important economic activity in India in Kautilya time.

 

References

1-Kautyaliya Arthashastra (Hindi) Translated by Prof Udayveer Shastri) Publihser- Mehrachandra , Lakshmandas Adhyaksha , Lahore, August 1925 p 265

Copyright@ Bhishma Kukreti, bckukreti@gmail.com , Mumbai India, 2020

Mar
26

Mistresses or Khavasan of King Sudarshan Shah

Mistresses or Khavasan of King Sudarshan Shah

General Characteristics of Sudarshan Shah Administration -18

History of King Sudarshan Shah of Tehri Riyasat – 145

History of Tehri Kingdom (Tehri and Uttarkashi Garhwal) from 1815 –1948- 145

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) – 1379

By:   Bhishma Kukreti (History Student)

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According to Hari Krishna Raturi (Garhwal ka Itihas page 470), Sudarshan Shah had more eight wives than authorized marriages.  Those wives were not called queens but Khavees /Khavasan (mistress or up Patni) .  Khavees or Khavasan means she friend or she maid servant.  Sudarshan Shah had eight sons from Khavasan or mistresses.

Bandi was lower than Khavasan in position.  The Khavasan of King Sudarshan Shah were from Rajput families as Bisht or higher status Rajput.

Copyright@ Bhishma Kukreti, bjukreti@gmail.com

Mistresses of Sudarshan  and History of Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Uttarkashi Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Ghansali, Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Bhatwari ,  Uttarkashi Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Tehri, Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Rajgarhi Uttarkashi Garhwal;  Mistresses of Sudarshan  and History of Narendranagar,  Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Dunda ,  Uttarkashi Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Dhantoli, Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Chinyalisaur Uttarkashi Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Pratapnagar , Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of  Mori, Uttarkashi Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Devprayaga, Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of  Puraula, Uttarkashi Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Jakhanikhal Tehri Garhwal; Mistresses of Sudarshan  and History of Gangotri- Jamnotri Uttarkashi Garhwal to be continued …

 

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