Jan
23

गढ़वाल में वसंत पंचमी सरस्वती पूजा हेतु नहीं अपितु हरियाळी पूजन और सामूहिक गीत प्रारंभ हेतु प्रचलित थी

गढ़वाल में वसंत पंचमी सरस्वती पूजा हेतु नहीं अपितु हरियाळी पूजन और सामूहिक गीत प्रारंभ हेतु प्रचलित थी
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आलेख – भीष्म कुकरेती
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फेसबुक व अन्य इंटरनेट माध्यमों में हम (मै भी ) वसंत पंचमी को सरस्वती पूजन का पर्याय मानकर के एक दूसरे को वधाईयें देते रहते हैं। किन्तु गढ़वाल में वसंत पंचमी में सरस्वती पूजा एक गौण पक्ष रहता था। हाँ यदा कड़ा कोई बच्चे को पाटी दिखा देता था बस सरस्वती पूजा यहीं तक सीमित थी (मुझे भी इसी दिन पाटी दिखाई गयी थी ). हमारे सामान्य लोक या लोक साहित्य में कहीं भी सरस्वती बंदना के कोई प्रतीक सामने नहीं आये हैं कि हम कह सकें कि वसंत पंचमी का सरस्वती पूजन से सबंध है।
वास्तव में वसंत पंचमी का वसंती रंग से भी उतना संबंध नहीं है जितना हम इंटरनेट माध्यम में शोर करते हैं। किसी ने एकाध रुमाल हल्दी के रंग में रंग दिया तो रंग दिया अन्यथा मेरे बचपन में बसंती रंग व पीले रंग में कोई अंतर् भी नहीं समझा जाता था।
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हरियाली याने कृषि और लोहार का सम्मान
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वास्तव में गढ़वाल में बसंत पंचमी का अलग महत्व है जो अन्य मैदानी क्षेत्रों में है ही नहीं।
गढ़वाल में बसंत पंचमी का पहले अर्थ होता था हरियाली लगाना। इस दिन लोहार अपने अपने ठाकुर के लिए प्रातः काल से पहले जौ को जड़ समेत उखाड़ कर अपने ठाकुर के चौक में रख देते हैं।
फिर परिवार वाले स्नान आदि कर हरियाली अनुष्ठान शुरू करते हैं
पहले दरवाजे के ऊपरी हिस्से में हल्दी से पिटाई लगाई जाती है और पिठाई जौ के पौधों में भी छिडकी जाती है। पुराने हरियाली को उखाड़ा जाता है
तीन चार जौ की जड़ों को ताजे गाय के गोबर में रोपा जाता है और फिर उन जौ के पौधों को दरवाजे के दोनों मोहरों (दरवाजे के ऊपरी कोने -क्षेत्र ) में चिपकाया जाता है। इस तरह सभी कमरों पर हरियाली चिपकायी जाती है। आळों में भी हरियाली चिपकायी जाती है। इसी तरह गौशाला के हर कमरे के मोहरों में भी जौ की हरियाली चिपकायी जाती है।
इस दिन स्वाळ -पक्वड़ भी बनाये जाते हैं और बांटे जाते हैं लोहार हेतु विशेष ध्यान रखा जाता है। लोहार को अन्न या धन दिया जाता है। इस दिन गुड़ का मीठा भात याने ख़ुश्का भी बनाया जाता है।
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गंगा स्नान
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बहुत से लोग गंगा स्नान हेतु छोटे या बड़े संगम पंहुचते थे।
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कर्ण व नासिका छेदन
वसंत पंचमी के दिन नासिका व कर्ण छेदन को शुभ माना जाता है।
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सामूहिक गीत व नृत्य की शुरुवात
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आज बसंत पंचमी की रात से गाँवों में सामूहिक नृत्य , गीत व लोक नाट्य कार्यकर्म भी शुरू होते थे जो बैशाखी तक चलते रहते थे।
मुझे एक लोक गीत की पहली पंक्ति याद है जो पहले दिन अवश्य ही गाया जाता था -
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हर हरियाली जौ की
खुद लगी बौ की।
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बद्रीनाथ कपाट खुलने का दिन निश्चितीकरण
बसंत पंचमी के दिन न्य पंचांग भो खोला जाता है और नए वर्ष की कुंडली भी देखि जाती है।
बसंत पंचमी के दिन बद्रीनाथ कपाट खुलने का दिन भी निश्चित होता है।
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Copyright @ Bhishma Kukreti , 2017
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Jan
23

मि फालतू समय पर क्या क्या करदु ?

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मि फालतू समय पर क्या क्या करदु ?
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चबोड़ , चखन्यौ , भचकताळ ::: भीष्म कुकरेती

शहरुं मा सबसे बड़ी दिक्क्त या च बल इख ना बाछी हूंदन , ना कलोड़ हून्दन अर ना बल्द हूंदन बल खाली टैम पर यूंक कांद मलासी ल्यावो। डिस्कवर उत्तराखंड का सम्पादक दिनेश कंडवाल जी अब देहरादून बिटेन अपण गाँव शिफ्ट ह्वे गेन त अचकाल फेसबुक मा दुसर तिसर दिन गौड़ी कांद मलासणो फोटो पोस्ट्याणा रौंदन। मतलब बोर त गाँव मा बि हूणा इ रौंदन।
खैर अब त इंटरनेट ऐ गे त फेसबुक , व्हट्स अप, ट्यूटर आदि ऐ गेन त सोशल मीडिया बछरो कांद बण गे। जब बोर ह्वे गे तो पिछ्ला हफ्ता फेसबुक मा कथगा Like ऐन ही गौण ल्यावो अर हौर ज्यादा बोरियत ह्वे जावो तो कै कैन Like कार इ जाणी ल्यावो। किंतु कुछ बि ब्वालो इंटरनेट मा पढ्युं समाचार से जन छपछपी नि पड़दि अर छपछपि वास्ता समाचार पत्र बंचण जरूरी हूंद उनी असली बोरियत हकाणो बान दुनियादारी का ””’बेकार ””” काम जरूरी हूंदन।
जब मि ऑफिसम हूंद त साब बोर नि हूण दींद। तातो तवा मा खड़ ह्वेक क्वी बोर ह्वे सकद क्या ? सैत च ना। पर फिर बि बोर होइ जयांद। जन कि एयर पोर्ट म प्लेन लेट ह्वे जावो , ट्रेन मा बोर हूणु हूं त इन मा मि अपण कै बि मातहत मैनेजर तैं फोन करदु अर इन सवाल पुछ्दु जु मीन पिछ्ला पांच सालम कबि नि पूछ ह्वाव या जै सवालक जबाब की आण वळ पीड्युं तै बि जरूरात नि पोड़। कुछ मैनेजर झूठि सच्ची लगाण मिसे जांदन त मि तैं अंदर इ अंदर हौंस आण मिसे जांद अर मेरी बोरियत खतम हूण लग जांद। चूहेदानी मा फंस्युं मूस देखिक जन मजा आंद तनि यूं मैनेजरों जबाब सूणी मजा आंद अर बोरियत पर बुज्या लग जांद। पर कुछ मातहत मैनेजर म्यार बि बाब निकळ जांदन। म्यार एक मातहत छौ बी मोहन। वु म्यार दगड़ यीं कम्पनी या वीं कम्पनी मा राइ त म्यार अप्रासंगिक इर्रेलिवेंट सववलो जबाब मा उल्टां पूछि लींदो बल “साब ! वो आपकी एक फ्रेंड छे मिस मारिया। अचकाल कख होलि ?” . मी बि समज जान्दो बी मोहन तै पता चल गे बल मीन बोरियत हकाणो बान फोन कार।
एक हैंक मातहत छया प्रकाश पांथरी वूंन बि म्यार दगड भौत साल काम कार। वै तै म्यार रेलिवेंट क्वेस्चन अर इरेलिवेंट क्वेस्चन का अंतर् मालुम च तो वी बि उल्टां सवाल करण मिसे जांद बल ” सर छुमा बौ गीत नरेंद्र सिंह जीन लेखी कि जीत सिंह जीन ?” इनमा बोरियतन पी टी उषा जन भगण इ च। चोरी पकड्याणो बाद या कळि लगणो बाद क्वी बोर रै सकुद क्या ?
म्यार एक हैंक मातहत छया मनमोहन जखमोला। सन अठोत्तर से दगड़ु च। जनि मि इन सवाल कौरु ना मनमोहनौ जबाब हूंद बल ” भाई साब इन लगणु ch भौत बोर हूणा छा। ”
ऑफिसम बोर ह्वावो त सबसे बढ़िया काम हूंद अपण ड्रावरौ सफाई। सफाई मतलब इर्रेलिवेंट पेपरों तै भैर फेंको। ड्रावरै सफाई कु असली उद्देश्य हूंद कि ”’बेकार ”’ का कागज जळाये जावन। किंतु जब मि सुचद कि ये पेपर तै फिंके जावो त फिर मन मा आंद ‘नै नै पता नी ये पेपर की कब आवश्यकता पोड़ जा धौं ‘. अर मि जै पेपर की पिछ्ला पांच सालम जरूरत नि पौड़ वे पेपर का वास्ता प्यून तैं बोलिक नै फ़ाइल खोलिक फ़ाइल कैबिनेट मा लगवै दींद। अपण ड्रावरौ आफत औफिसौ कैबिनट तै दे द्यावो याने -अपण नाक साफ़ कौरो अर हैंक पर लपोड़ द्यावो।
जब मि मर्फी मा छौ अर बोर हूंद चौ तो कै बि फीमेल क्लर्क तैं बुले लींद छौ अर कुछ बि काम पर डिस्कसन शुरू कर दींद छौ। वा बि खुस अर मी बि खुस। मेरी बोरियत हट जांदि छे अर वींक बि बगैर कुछ काम कर्यां टैम पास ह्वे जांद छौ।
ड्यारम बोर ह्वे जावो त क्या करदु ? अगला एपिसोड की जग्वाळ कारो जी।

23/1 / 2018, Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,

*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।
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Jan
21

मक्खी सम्मेलनुं याद

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मक्खी सम्मेलनुं याद
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चबोड़ , चखन्यौ , भचकताळ ::: भीष्म कुकरेती

मि तबै बात करणु छौ जब लोग सौकार बणणो कुण मक्खी चूसा करदा छा आज 2 G , 3 G या रॉबर्ट बाड्रा जन घपला -घोटाला करण पड़द। तब दिन अच्छा छा जब एक मक्खी चूसो अर धन्ना सेठ बण जावो। अर अब ? अब त मक्खी चुसण से धन्ना सेठ नि बणे सक्यांद अब त पूरा का पूरा हरियाणा निगळण पड़द।
त मि तबै छ्वीं लगाणु छौं जब हम छुट छया अर सफाई याने बरख पुजद दैं अर तब शरादक सफै से दूर का संबंद नि छौ। तब मक्खी से प्रेम करे जांद छौ कि मक्खी चूसो अर पैसा बचाओ। अब त जमन च बल मूस मारो अर म्युनिस्पैलिटी से इनाम पाओ। मि तबौ छ्वीं लगाणु छौं जब लालकृष्ण अडवाणी जन संरक्षक याने बूड ददा भी मक्खी नि मारदा छा। हमर बाळापन मा हम मक्खी पालक छया नै नै मधुमक्खी पालक ना अपितु हाउस फ्लाई पालक।
तब हम मक्खी चुसण से इथगा प्रेम करदा छा कि किचन कु चुल्ल से लेकि चौक तक हमन कथगा इ मक्खी पालन केंद्र खुल्यां रौंद था। कुछ मिनी केंद्र , कुछ मिडल किस्मौ अर कुछ मैगा पालन केंद्र। भितर रुस्वड़म चुल्लम थड़कण से भोजन पदार्थ जु इना उना पड़ जांद छौ , म्याळ मा गिर्यां भोजन कण या बड़ा टींड अर तौल कु पींडो मैगा मक्खी पालन केंद्र हूंद छौ। भैर त नि पूछो। भैर चौक मा दसियों छुट छुट मक्खी पालन केंद्र छा जन कि सीम्प, थुक्युं थूक, खत्यां अनाज , आदि छुट छुट पालन केंद्र छा तो इना उना ब्रिटेन सुर्युं खौड़ै ढेर अर बच्चों गूवक चिमनी। यी पालन केंद्र सूचक छा कि हम पुरातन काल से मक्खी प्रेमी छा। हम माखों से प्रेम करदा छा अर मक्खी हम से दुगण प्रेम करदी छा। प्रेम आबंटन मा हम मा अर माखुं मा ओलम्पिकी छौंपा दौड़ हूणी रौंद छे। पर तब दुयूं कुण विन विन सिच्युवेसन छौ।
मक्खी जन्मजाति सम्मेलन प्रेमी हूंदन । भैर कुछ देर मक्खी गुवक ढेर मा वृहद सम्मेलन करदा छा , कुछ छूट छुट सम्मेलन मा हि खुस रौंद छा। फिर कुछ समय बाद यूंक शिफ्ट चेंज हूंद छे। भैरक माख भितर चल जांद छा अर भितराक माख भैर ताज़ी हवा खाणो भैर ऐ जांद छा। भैराक मक्खी भितर जैक भैराक गंदगी भेंट मा दींदा छा अर खुला भोजन आदि मा गंदगी फेंकदा छा। बिचार्यूुं तै नि छौ पता नि छौ कि ऊंकी प्रेम भेंट मा गंदगी ऐ जांद अर हम बि मक्खी प्रेमाभूत ह्वेक माखुं भिड्यूं सब कुछ चपट कर जांद छा। हम तैं मक्खी चुसणम गर्व महसूस हूंद छौ। भितर बि मक्खी हर जगा छुट बड़ सम्मेलन करणा रौंद छा। सबसे बड़ो सम्मेलन तौलक किनारों पर हूणु रौंद छौ। हाँ मादा मक्खी बरोबर अंडा दीणो काम बि करणी रौंद छे।
फिर दिन मा जब बेटी ब्वारि या सास घास लखड़ लेक घौर आंद छा तो वो अपण सुपकन माखों तै भैर भगान्द छा। इनमा माख फिर से शिफ्ट एक्सचेंज का लुत्फ़ उठांद छा अर सम्मेलन करदा छा। एक हैंका कुण रामा रूमी करदा छा अर अपण अपण अनुभव शेयर करदा छा। यदि घर मालकिन म समय बची गे त वा चौक मा ब्वान फिरै दींदी छे। यां पर मक्खी कबि बि नराज नि हूंद छा उल्टां खुसी खुसी अपण खुट , अपण मुख पर लगीं , अपण पंखों पर लगीं गंदगी भेंट करणो दुसर मौक चौक -किचन मा चल जांद छा अर स्याम तक हरेक मक्खी गांवक हरेक मौक इक संग्रांद बजैक अपण जीवन समाप्त कर दींदी छे।
फिर कुछ दिन बाद डीडीटी युग आयी त डीडीटी विज्ञापनों से हमन जाण कि मक्खी प्रेम तो बीमारी जड़ च त हमन धीरे धीरे मक्खी चुसण बंद कर दे। अब त हिट का जमाना च अर हिट सिखाणु रौंद कि एक मक्खी आदमी को हिजड़ा बना सकती है तो हम अब चिड़ी मार से मक्खी मार ह्वे गेवां। अर अब त मोदी जी क शौचालय आंदोलन से हम बड़ा बड़ा मक्खीमार बि ह्वे गेवां।
अब हम स्वछता का महत्व समजण लग गेवां। एक दैं बंदूक्या जसवंत राणा से इंटरव्यू मा पूछे गे बल राणा जी ! पुरण जमन अर नै जमन मा क्या अंतर च ? त राणा जीक उत्तर छौ – पैल हम गरीब छा अब पैसा ऐ गेन। मातबरी अच्छी बात च , रिचनेस इज बेटर ।
एक इंटरब्यू मा महेंद्र सिंह धोनी से पूछे गे बल धोनी जी ! पुरण जमन अर नै जमन मा क्या अंतर च ? त धोनी जीक उत्तर छौ – पैल हम गरीब छा अब पैसा ऐ गेन। मातबरी अच्छी बात च , रिचनेस इज बेटर ।
मि तैं बि वीरेंद्र पंवार जीन पूछी छौ बल कुकरेती जी ! पुरण जमन अर नै जमन मा क्या अंतर च त म्यार साफ़ उत्तर छौ – पैल हम गंदा छा अब कुछ हद तक सफाई पसंद ह्वे गेवां । सफाई भौत अच्छी बात च , क्लीननेस इज फार बेटर ।

21/1 / 2018, Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,

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Jan
20

उत्तराखंड परिपेक्ष में घंडुगळी/गरुंडी की सब्जी ,औषधीय व अन्य उपयोग और इतिहास

उत्तराखंड परिपेक्ष में घंडुगळी/गरुंडी की सब्जी ,औषधीय व अन्य उपयोग और इतिहास

History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of Joyweed, Alternathera sessilis Himalayan in Uttarakhand context

उत्तराखंड परिपेक्ष में जंगल से उपलब्ध सब्जियों का इतिहास – 31

History of Wild Plant Vegetables , Agriculture and Food in Uttarakhand –

उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास — 71

History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes in Uttarakhand -
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आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
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वनस्पति शास्त्रीय नाम -Alternathera sessilis
सामन्य अंग्रेजी नाम – Sessile Joyweed
आयुर्वेदा नाम-मतस्याक्षी
सिद्ध नाम -पोन्नोकाणी
हिंदी नाम – Garundi , gurro गरूण्डी
नेपाली नाम -भिरिंगी झार
उत्तराखंडी नाम -घंडुग्ली , घंडुगळी , Ghandugli
जन्मस्थल संबंधी सूचना – चूँकि घुंडगळी Alternathera sessilis आदि के सबसे अधिक विविध रूप दक्षिण अमेरिका में मिलते हैं तो वनस्पति शास्त्री अनुमान लगाते हैं कि शायद दक्षिण अमेरिका ही
घुंडगळी Alternathera sessilis का जन्मस्थल हो। Sanschez del Pinto (2012 ) के अनुसार गरूण्डी , घुंडगळी Alternathera sessilis का जन्मस्थल लैटिन अमेरिका ही है और वहां से यह पौधा पुराने गोलार्ध में फैला। डा गुप्ता अनुसार गरूण्डी , घुंडगळी Alternathera sessilis के जन्मस्थल के बारे में अभी तक ठीक जानकारी नहीं मिल सकी है। फिर गुप्ता (2014 ) में सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि गरूण्डी , घुंडगळी Alternathera sessili स्थल प्रशांत महासगरीय किसी द्वीप में हुआ होगा। चीनी वनस्पति शास्त्री Fun आदि (2013 ) ने माना कि गरूण्डी , घुंडगळी Alternathera sessilis चीन , व दक्षिण एशिया होना चाहिए।
संदर्भ पुस्तकों में वर्णन – चरक (1000 BC , सी पी खरे की पुस्तक ) ने सारे पौधे को बुद्धि , स्मरणः शक्ति , बाह्य सुंदरता वृद्धि हेतु हिदयात दी है। भावप्रकाश (16 वीं सदी ) में गरूण्डी , घुंडगळी Alternathera sessili को कोढ़ , रक्तशुद्धि हेतु प्रयोग की हिदायत दी गयी है । भावप्रकाश में मत्स्यशाका Alternathera sessilis व Ethyndra fluctuans को एक ही माना गया है
चीन के पास होने व आयुर्वेदिक औषधि होने से अंदाज लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड में यह पौधा 3000 साल से किसी ना किसी रूप में प्रयोग होता रहा होगा।

हल्के गुलाबी रंग की टहनी वाले गरूण्डी , घुंडगळी Alternathera sessilis जमीन में पसरने वाली लता है जो पानी के किनारे भूमि व दलदल में ही उगती है और अनाज के खरपतवार के रूप में उगता है। वास्तव में यह फल हेतु हानिकारक है।
औषधि उपयोग -
आँखों के विकार नष्टीकरण , रक्त उल्टी रोकने, उत्पादन शीलता बढ़ाने , फोड़े आदि के उपचार में काम आती है।

सब्जी उपयोग
डा जे के तिवारी आदि ने लिखा है कि यह पौधा सब्जी पकाने के काम आता है ( जॉर्नल ऑफ अमेरिकन साइंस , 2010 )
सब्जी बनाने का तरीका
धूली व कटी पत्तियां – दो कप या आवश्यकतानुसार
उबली उड़द या अरहर या गहथ – दो चमच
हरी मिर्च कटी, लम्बाई में -चार
आधा कटा प्याज – आधा घन इंच
अदरक – पिसा हुआ
लहसून – दो जखेलि पिसा
हल्दी व धनिया पॉउडर मसाले – एक या डेढ़ चमच स्वादानुसार
काली मिर्च – एक पीसी हुयी
कटा धनिया
कढ़ाई में सरसों का तेल गरम कर राई या जख्या का तड़का डालें , तड़कने दें , वैसे सफेद दली उड़द के बीज भी तड़के में इस्तेमाल किये जा सकते हैं। उड़द बीज भूरे हो जायँ तो अदरक , लहसून डालें भूने और तब प्याज डालें। कुछ देर बाद मसाले डाल कर करछी घुमाते रहिये। जब प्याज पारदर्शी हो जायं तो कटे घुंडगळी दाल साथ में डालें व तीन मिनट तक पकाएं। फिर पकी सूखी दाल डालें। मिनट तक पकने दें। हिलाते रहिये। तरी बनानी है तो पकी दाल का पानी डालें।
फिर कटा धनिया डालकर उतार दें व ढक्क्न से तीन मिनट तक ढके रहिये। गरमागरम परोसिये रोटी या चावल के साथ।

Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

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Jan
20

Myths and Religious Importance of Bel, Wood Apple in Uttarakhand

Myths and Religious Importance of Bel, Wood Apple in Uttarakhand
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Plant Myths, Religious Importance, and Traditions in Uttarakhand (Himalaya) -18
By: Bhishma Kukreti, M.Sc. (Botany) (Mythology Research Scholar)
Botanical name –Aegle marmelos correa
Local name – Bel
Hindi Name –Bel, Bael
Sanskrit Name –Vilva, Bilva
Economic benefits –Fruits are used for pickle and medical uses.

Myths, Religious Importance and Traditions
Bel or Wood apple is a sacred tree. The three leaves together of Wood Apple or Vilva or Bel look like trident (Trishul ) the emblem of Lord Shiva. It is belief that these three leaves represent Shiva for s ‘Creation’, Preservation’ and ‘Destruction’. The three leaves of Bel or wood apple as Sin removers too. People pay tribute to Lord Shiva in his temple by offering Vilva/bel leaves as bilpatri/belpatri on Shiv Linga
Shiva devotees worship bel tree in moths as Marshirsha and Falgun. .
In Banhadadharma Puran, the sacred tree came in existence from the cut breast of Lakshmi while she was worshiping Shiva.That is why bel fruit is called fruit of destiny.
As Banhi Puran, Lakshmi was cow in a birth and from her dung, Bel tree was born.
There are stories about bel related to Lord Rama too.
In Skand Puran, the tree merged from sweat from Parvati forehaed.
Likewise, there are many other region wise folk stories and stories of legends connected with Bel tree in Shiv Puran, Garur Purans,.
Ritual Performers use Bel wood for Homa or havan.
There are more than 108 mantras for offering belpatra on Shiva Linga.
Bel Leaves and Fruits in Tantric and Mantric Rituals
On a n Ashwini nakshtra day, Mantric or Tantrik purifies Bel patra and cow milk together and offers that purified milk mixed with bel leaves to childless woman for getting pregnant.
Mantric suggests for worshipping Surya Graha or Sun on Saturday by worshipping Bel tree.
Satya Narayn Shastri Khanduri (1996) detailed about uses of Bel for performing Uddamarehwar tantra in the book Uddamarehwar tantra .
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Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai 2017
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