Tag Archive: उत्तराखंडी संस्कृति

Nov
01

अपण धरोहर अपण कोशिश: Aipan (उत्तराखंड की लोककला- ऐपण)

Aipan

हमारी उत्तराखंडी संस्कृति में विभिन्न प्रकार की लोक कलाएं मौजूद है। उन्ही में से एक प्रमुख कला “ऐपण” भी है। उत्तराखंड की स्थानीय चित्रकला की शैली को ऐपण के रूप में जाना जाता है। मुख्यतया ऐपण उत्तराखंड में शुभ अवसरों पर बनायीं जाने वाली रंगोली है। ऐपण कई तरह के डिजायनों से पूर्ण किया जाता …

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Mar
20

अपण धरोहर अपण कोशिश: प्राचीन लोकगाथा फाग

“फाग” कुमाओं में विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जाने वाले मंगल गीत हैं। इन गीतों का संस्कारों से सम्बन्ध होने के कारण इन्हें ”संस्कार गीत” भी कहा जाता है। कुमाओं में इन्हें ”शकुनाखर” भी कहते हैं गर्भाधान, पुत्र- जन्म, षष्ठी, नामकरण, व्रतबंध, विवाह आदि संस्कारों के अवसरों पर ”फाग” और ”शकुनाखर” गाये जाते हैं । किसी धार्मिक उत्सव में देवी - देवताओं की गाथाओं को भी फाग के रूप में गाया जाता है। फाग फाल्गुन महीने के ”फगुवा” या ”फागु” गीतों से भिन्न होता हैं। अन्य प्रदेशों के सोहर, बन्ना- बनड़ी, सगुन आदि गीतों की ही भांति कुमाओं में ”फाग” गीतों का प्रचलन है। कुमाउनी लोक साहित्य के कुछ अध्येताओं ने कुमाओं में ”फाग” गीतों का अभाव माना है, किन्तु यह सत्य नहीं है। लगता है उन विद्वानों ने कुमाउनी लोकगीतों का सर्वागीण अध्यन किये बिना ही भ्रामक निष्कर्ष निकाल लिये हैं| “शकुनाखर”, “सगुन” या ”सगुनाखर” गीतों में अवधी और ब्रज भाषा का प्रभाव अधिक है। कुछ सगुन गीत कुमाउनी भाषा में मिलते हैं, पर उनके मूल रूप का कुमाउनीकरण कर दिया गया है। कही कही इनमें कुमाउनी शब्द प्रयोग मात्र ही परिलक्षित होता है, अत: “फाग” के अंतर्गत इन गीतों को सम्मिलित  नहीं किया गया है। फाग केवल स्त्रियों द्वारा ही गाये जाते हैं। इनमें गीतात्मकता एवं  कंठ- स्वर का विशेष महत्व होता है। “फाग” गीतों में दो या दो से अधिक गायिकाएं होती हैं। इन गीतों में नारी कंठ की पूर्ण कमनीयता और सरलता विद्यमान रहती है। समय अथवा विषय की दृष्टि से इन गीतों की दो कोटियाँ हैं - प्रासंगिक गीत और अनिवार्य गीत। “फाग” प्रासंगिक गीतों के रूप में मांगलिक कार्यों, उत्सवों और गाथाओं में गाये जाते हैं और विविध संस्कारों पुत्र-जन्म, नामकरण, व्रतबंध और विवाह आदि अवसरों पर अनिवार्य गीत गाये जाते हैं। इन गीतों में लोक- वेद की रीती का अभूतपूर्व समन्वय परिलक्षित होता है। इनका प्रारंभ आकाश- पातळ, पृथ्वी आदि के देवी- देवताओं की वंदना से होता है। इनमें गणेशपूजन, माँतृपूजन, कलश स्थापन आदि गीतों के साथ परिवार व उसके सदस्यों एवं सम्बन्धियों के प्रति मंगल कामना निहित रहती है। संस्कार- भेद के अनुसार जन्म, नामकरण, यज्ञोपवीत और विवाह आदि के विभिन्न गीत हैं ”देशकर्म”, गणेशपूजा और न्युतने के गीत सभी में समान रूप से गाये जाते हैं। नामकरण और व्रतबंध सम्बन्धी गीतों में बालक के गर्भावास से लेकर विद्याअध्यन, यज्ञोपवीत, न्यूतन आदि के गीत गाये जाते हैं। विवाह में कन्या और वर पक्ष के अलग- अलग फाग गाये जाते हैं। इनमें सुआल पथाई, पूर्वांग, न्यूतन आदि गीतों में समानता होती है। कुछ गीत उभयनिष्ट रूप में भी गाये जाते हैं। वर पक्ष के गीतों में श्रृंगार,बारात प्रस्थान, माँ का पुत्र से दूध का मोल मागना, रौत्याली, बिरादरों व् बारातियों की विदाई आदि के गीत मुख्य हैं। कन्या पक्ष के गीतों में बारात आगमन, धुलर्घ्य, श्रृंगार, कन्यादान, सप्तपदी, बारात विदाई मुख्य हैं | कन्या के विदाई के असवर के गीत इतने व्यथापूर्ण, करुण, व् हृदयद्रावक होते हैं कि श्रोता के मानस की सीपी अपने अपने द्वार खोलकर मुक्ताश्रुओं से रोती हुई बालिका का अभिषेक करती जान पड़ती है। कुमाउनी ”फाग” गीत अपभ्रंस युगीन ”फाग” अथवा ”फागु” से भिन्न है। किन्तु कुमाउनी ”फाग” गीत मंगलगीतों की एक विशेष गायन पद्यति है। यह भी संभव है कि लोक प्रचलित फाग गीतों कि गायन शैली ने तत्युगीन काव्यरूप ”फागु’ को परिनिष्ठित  साहित्य में प्रतिष्टित किया हो।  “फाग” गीतों में प्राय: वाक्यांश और पदों कि पुनरावर्ती होती है। इनमें अतुकांतता पाई जाती है। फाग एक गायन शैली भी है और छंदरूप भी है यह कुमाउनी का अर्द्सम मुक्तक वर्णिक अतुकांत छंद है।

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