Tag Archive: जौनसार

Feb
22

कोटि बनाल (जौनसार , देहरादून ) के रावत परिवार के जंगलेदार, तिबारीयुक्त भवन (संख्या 3 ) पारम्परिक गढ़वाली शैली के ‘काठ लछ्याणौ , कुर्याणौ पाड़ी ब्यूंत’ की काष्ठ कला अलंकरण, उत्कीर्णन

                    कोटि बनाल (जौनसार , देहरादून ) के  रावत परिवार के जंगलेदार, तिबारीयुक्त  भवन (संख्या 3 ) पारम्परिक गढ़वाली शैली के ’काठ लछ्याणौ ,  कुर्याणौ पाड़ी  ब्यूंत’  की काष्ठ कला अलंकरण, उत्कीर्णन गढ़वाल,  कुमाऊँ , के  भवन  ( कोटि बनाल   , तिबारी , बाखली , निमदारी)  में   पारम्परिक गढ़वाली शैली के ’काठ लछ्याणौ ,  कुर्याणौ …

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Sep
18

कोटि गाँव (देहरादून ) में स्व रणजोत सिंह रावत परिवार के तिबारी युक्त मकान में काष्ठ कला

कोटि गाँव (देहरादून ) में   स्व रणजोत  सिंह रावत परिवार के तिबारी   युक्त मकान में  काष्ठ कला अलंकरण अंकन, लकड़ी नक्काशी     Traditional House wood Carving Art of  village Koti  Banal  , Dehradun गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली   , खोली , छाज,   कोटि बनाल   ) ’काठ लछ्याणौ ,  कुर्याणौ पाड़ी  ब्यूंत’ की काष्ठ कला अलंकरण अंकन, लकड़ी नक्काशी- 292 संकलन – भीष्म कुकरेती – कोटि गाँव का प्रस्तुत मकान काष्ठ  …

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May
31

बृनाड (देहरादून ) में प्रीतम सिंह चौहान के भव्य मकान में रोचक काष्ठ कला , अलंकरण / लकड़ी पर नक्कासी

बृनाड  (देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान के  भव्य मकान में रोचक काष्ठ  कला , अलंकरण / लकड़ी पर नक्कासी  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार , बखाली , कोटि बनाल , खोली , मोरी    ) में  काष्ठ अंकन लोक कला  अलंकरण, नक्कासी    – 146  – संकलन – भीष्म कुकरेती – देहरादून …

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May
24

कोटि बनाल गांव में 300 साल पुराने मकान में काष्ठ कला

  कोटि बनाल   गांव  में    300 साल पुराने मकान में काष्ठ कला    कोटि बनाल  ( बड़कोट उत्तरकाशी  ) में कोटि बनाल  शैली में निर्मित  300 साल पुराने मकान में काष्ठ कला , अलंकरण  ( नक्कासी )   गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  ( कोटि बनाल    , तिबारी , बाखली , खोली  )  में काष्ठ …

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Apr
18

अपण धरोहर अपण कोशिश: मौण मेला (जौनसार)

जौनपुर का ऐतिहासिक मौण मेला अपने आप में एक अनोखी पहचान बनाए हुए है। मेले में हजारों लोग अगलाड़ नदी से सामूहिक रूप से मछलियां पकड़ते हैं। यह मेला टिहरी रियासत के राजा नरेन्द्र शाह ने स्वयं अगलाड़ नदी में पहुंचकर शुरू किया था, लेकिन वर्ष 1844 में आपसी भतभेद के कारण यह बंद हो गया। …

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