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Sep
21

डर

बंद कीजिये खिड़कियाँ रौशनी से हम तो डर ने लगे खिडकियों से रौशनी क़ि जगह दबे पाऊं अबतो दर्द आने लगे ! खुली छत के नीचे जब से हादसों पे हादसे घटे कांपते है पाऊ मेरे अब तो देहलीज को भी लांघते जिद ना कीजिये रौशनी के लिए अब तो बंद कमरे भी हमको रास …

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