Tag Archive: garhwal

Jan
02

बरसुड़ी (लंगूर ) की लोक कलाएं व कलाकार लंगूर संदर्भ में गढ़वाल की लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला – 1 (चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है ) – संकलन – भीष्म कुकरेती – बरसुड़ी लंगूर का एक महत्वपूर्ण गाँव है स्थान नामसे इंगित होता है कि यह स्थान खस -द्रविड़ काल से ही चिन्हांकित हो चुका था। लंगूर भैरों, द्वारीखाल निकट ही हैं। प्रदीप शाह युग में अवश्य ही इस गाँव ने गोरखाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभई होगी व कई त्रास भी भुगते होंगे। बरसुड़ी के कुकरेती जसपुर ढांगू से माइग्रेट हुए थे व दो लोक कथाएं भी प्रसिद्ध हैं। बरसुड़ी से कुकरेती द्यूसी मनियारस्यूं माइग्रेट हुए। रजकिल , कुटळी , पटळी सीमावर्ती गाँव हैं। गढ़वाल के अन्य क्षेत्र समान ही यहाँ की लोक कलाएं बीसवीं सदी के अंतिम भाग तक विद्यमान थीं। अब बदलाव ा गए हैं। बरसुड़ी (लंगूर ) में निम्न कलाएं व कलाकार प्रसिद्ध हुए हैं – लोहार , ओड – रद्दु , कुत्ता। पंचमु , मूसा बढ़ई – जयचंद कुकरेती ढोल वादक, मसुकबाज व दर्जी – गुलाम , , असिलु दास , बुदासी पठळ खान – गुदड़ी निसुड़ निर्माण कौशल्य – सुखदेव कुकरेती , रगबहादुर सिंह , फतेह सिंह मंदर – फते सिंह बांस , टम्टागिरि हेतु – अन्य गांव पर निर्भर झरखंडी – आदित्यराम सर्यूळ /पाक कला – टेकराम कुकरेती , सुखदेव कुकरेती पंडित – श्रीकृष्ण कुकरेती , सच्चिदा नंद कुकरेती , रवि दत्त कुकरेती , आदित्यराम कुकरेती वैद्य – वीमखांद गाँव के गुर दयाल डोबरियाल कुकरेतियों के ब्राह्मण – डुं डयख के देवरानी – योगेश्वर प्रसाद तिबारी -बालादत्त , कलीराम कुकरेती की प्रसिद्ध थीं – सूचना आभार – बरसुड़ी के उदयराम शर्मा कुकरेती , Copyright @ Bhishma Kukreti , 2020 Folk Arts of Langur Garhwal ,Folk Artisans of Langur Garhwal ; लंगूर गढ़वाल की लोक कलायें , लंगूर गढ़वाल के लोक कलाकार

बरसुड़ी (लंगूर ) की लोक कलाएं व कलाकार लंगूर संदर्भ में गढ़वाल की लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला – 1 (चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है ) – संकलन – भीष्म कुकरेती – बरसुड़ी लंगूर का एक महत्वपूर्ण गाँव है स्थान नामसे …

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Nov
21

गढ़वाळम  संस्कृत नाट्य परंपरा

गढ़वाळम संस्कृत नाट्य परंपरा – भीष्म कुकरेती – सैकड़ों साल से चाहे वु क्वी बि कि कत्यूरी राज रै या शाह वंश राज राइ , संस्कृत उत्तराखंड की राजभाषा राइ तबि त शिलालेख अभिलेख अर ताम्र पत्र अधिकतर संस्कृत म इ छन। मध्य अंध युग से ब्रज भाषा दरबारों साहित्यिक ही ना राजाओं व आम …

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Nov
06

गढ़वाल में ईगास बग्वाल की विशिष्ठ परम्परा

गढ़वाल में ईगास बग्वाल की विशिष्ठ परम्परा – डॉ. नंद किशोर हटवाल – दीपावली के ठीक ग्यारह दिन बाद गढ़वाल में एक और दीपावली मनाई जाती है जिसे ईगास बग्वाल कहा जाता है। इस दिन पूर्व की दो बग्वालों की तरह पकवान बनाए जाते हैं, गोवंश को पींडा ( पौस्टिक आहार ) दिया जाता है, …

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Jul
28

गावों में सहकारी उद्यमों की संभावना

गावों में सहकारी उद्यमों की संभावना लेखक ­- जगत सिंह बिष्ट, ग्राम खुटीडा, धुमाकोट, गढवाल गावों में सहकारी उद्यमों की संभावना उत्तराखंड के पहाडी गांवों में न्यूनतम आर्थिकोपार्जन की नहीं बल्कि अच्छी आय की बात अधिक बेहत्तर होगी. हाल ही के वर्षों में हुए प्रयासों और प्रयोगों से लोंगों में एक नए उत्साह का संचार …

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Jun
05

मंदिरों , गुरुद्वाराओं के भंडारे/लंगर व भोग -प्रसाद भी भोजन पर्यटन अंग ही हैं

मंदिरों , गुरुद्वाराओं के भंडारे/लंगर व भोग -प्रसाद भी भोजन पर्यटन अंग ही हैं Bhandra, Bhog from temples are Tourism oriented भोजन पर्यटन विकास -14 Food /Culinary Tourism Development 14 उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना – 398 Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -398 आलेख – विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती – अमूनन हिन्दू भारतीय पूजास्थलों में देवताओं …

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