Jun
26

Forest Treasure of British Garhwal

Forest Treasure of British Garhwal

British Administration in Garhwal -122
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History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -139
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History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -976
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By: Bhishma Kukreti (History Student)

The most prominent forest products were bamboos. Bamboos were contributing 50% forest revenues of Ganga division . Bamboo forest of Gohari range was spread in large area. Gohari forest range was easily approachable. Therefore, there was sizable demand for Bamboo from Gohari range. Woods were flown through Ganga easily at cheap cost. There was demand for Sal, Shisam trees but those forests were already destroyed. Government constructed roads inside Ganga Division forests too.
Road going through Ganga –Kotalidun –Saneh to Nazibabad and railway transport from Kotdwara were suitable transport medium. Delhi and Meerut traders were major wood buyers. The main depos for Garhwal forest produces were in Haridwar and Saneh. Nazibabad was also trading centre for Garhwal forest wood and Rurki was major consuming center for wood using in government factories.
Government relaxed rules in Garhwal for villagers using forests. Garhwalis used to graze heir cattles in reserved forests and could take dry wood , branches felled on the ground. Villagers also used trees for their agriculture appliances making.

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References
1-Shiv Prasad Dabral ‘Charan’, Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 287-312
2- Walton Garhwal Gazetteer pages 11-15

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Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 26/6/2017
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -977
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*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
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(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

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Jun
26

थ्री चियर्स फॉर बेगैरत , बेशरम , शमलेस चीफ मिनिस्टर !

थ्री चियर्स फॉर बेगैरत , बेशरम , शमलेस चीफ मिनिस्टर !

झूठिस्तान रिपोर्टर -भीष्म कुकरेती

कल मुंबई के सात सितारा होटल में शराब निर्माता संघ का वार्षिक उत्स्व था जिसमे शराब विक्रेताओं को की इनाम दिए गए। कुछ पारितोषिक इस प्रकार थे।
सर्वपर्थम पारितोषिक है ‘कैच देम यंग ‘ जो दिया जा रहा है सभी प्रदेशों के आबकारी अधिकारियों को जो स्कूल व कॉलेजों के सामने व बिलकुल पास शराब की दुकानें , होटल खोलने के लाइसेंसलज्जाहीन होकर देते हैं। हमें नाज है उन भूतपूर्व घूसखोर अधिकारीयों पर जिन्होंने मुंबई के जोगेश्वरी में इस्माइल कॉलेज के ठीक सामने एक विदेशी-देसी दारु की दूकान , ठीक सामने व कॉलेज की दिवार से सटी जगह में बार रेस्टोंरेंट खोलने की परमिशन दी। थ्री चियर्स फॉर कैच दैम यंग अवार्डीज।
‘नियमों की धज्जी उड़ाओ ‘ के लिए लाखों अभ्यार्थी थे किन्तु प्रोत्साहन हेतु सभी पारितोषिक बिहार के शराब माफिया व सरकारी अधिकारियों को दिया जाता है। कालू यादव उर्फ़ चक्कूसे छील दूंगा इन परितोषिकों को लेंगे।
‘कंट्री लिकर इन ट्यूब’ का अवार्ड मुंबई के खूंखार मुर्गी चोर उर्फ़ काणिया को दिया जाता है।
‘आजीवन निर्लज्ज पारितोषिक’ हर साल की तरह भी गुजरात के अवैध शराब के सभी विक्रेताओं को दिया जा रहा है जिन्होंने शराबबंदी का हर वक्त मजाक उड़ाया। ‘क़ानून मेरी जूती से ‘ का पारितोषिक भी गुजरात के अधिकारियों को दिया जा रहा है जिनके सहयोग से गुजरात में होम डिलीवरी सिस्टम से सालों से अवैध शराब कारोबार चल रहा है।
‘पुलिस पटाओ , ‘पुलिस को धमकाओ’ , ‘घुस खाओ और पिलाओ’ आदि पारितोषिक लेने सभी मंच से अपने आप आएं और अपनी मर्जी से अवार्ड ले जाएँ।
और हर साल की तरह जिस पारितोषिक को लेने सभी सफेदपोश नेता, मंत्री , संतरी ललायत रहते हैं और वह इनाम है – ‘अभिनव दारु विक्रेता’ … याने ‘इन्नोवेटिव लिकर सेलर ‘ . जैसे कि आप सब जानते हैं कि यह पारितोषिक सबसे बेशरम , बिलंच व लज्जाहीन व्यक्ति को दिया जाता है।
आपको पता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सभी राज्यों में हाई वे का आस पास शराब बेचना या बार बंद करना पड़ा और उत्तराखंड में स्त्रियों द्वारा दारुबंदी आंदोलन में शराब की दुकानों को बड़ी हानि पंहुचायी जा रही थी। हम लालचियों का धंधा ठप्प पड़ गया था। तब आये शराब निर्माताओं के चेहते , शराबियों के पालनहार , बेशर्मों के बादशाह -उत्तराखंड सरकार !
शराब बेचने के प्रबल समर्थक उत्तराखंड सरकार ने एक अभिनव तरीका निकाला। उत्तराखंड सरकार ने शराब को मोबाइल वैन से बेचने का फैसला लिया और इससे सभी कानूनों की धज्जी भी उड़ गयी और हम मानव हन्ता , मानव कलंक , मानव भक्षियों का व्यापार भी खूब चलने लगा है।
इसलिए शराब निर्माताओं की ओर से सबसे शर्मनाक , लज्जाहीन , बेशर्म पारितोषिक ‘अभिनव ब्योड़ा विक्रेता’ … याने ‘इन्नोवेटिव लिकर सेलर पुरुष्कार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को दिया जा रहा है।
थ्री चियर्स फॉर बेगैरत, बेशरम , शमलेस चीफ मिनिस्टर !

Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India
*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम सत्य नहीं हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान सत्यता दिखाने हेतु उपयोग किये गए हैं।

Jun
25

Dharmendra Negi: One of the most Promising Garhwali poets

Dharmendra Negi: One of the most Promising Garhwali poets
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part – 165)
( गढ़वाली कविता क्रमगत इतिहास भाग – 165 )

By: Bhishma Kukreti
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Dharmendra Negi is one of the promising poets of Garhwali language. Dharmendra Negi was born in Churani village of Rikhanikhal block of Pauri Garhwal Uttarakhand in 1975. Dharmendra preferred joining education profession.
Dharmendra Negi published about 20 poems in various publications. Dharmendra posted more than 80 new poems in online media at various sites. Readers, children and critics appreciated his children story with sketches ‘Sikasauri’.
Dharmendra created poetries, Ghazels and free verses on various subjects as society, education, and political value deterioration, falseness in modern society, environment protection, routine Garhwal life and pain of migration. His ways of illustrating Garhwal geographical images is different and it is because of his uses of metaphoric methods.
Dharmendra Negi created poems of inspirational nature, serious, satirical and humorous.
Senior poet and Editor Madan Duklan stated that Dharmendra Negi is capable of tackling big idea and successfully conveying his views to the readers.
A renowned poetry critic Dr. Manju Dhoundiyal appreciated for his words choices for creating free poems, Ghazels or lyrics and appreciated his creating desired images by his proverbs, folk sayings and conventional as well as newer symbols.
Famous Garhwali Humorist Harish Juyal says that Dharmendra creates perfect emotions and intellectual emotional reactions and that could be felt among audience when he reads his poems before audience.
His uses of proverbs in his verses is appreciated by many critics as –
१ पकयां चखलों तैं हवा मा उड़ै दिन्दन उडाण वळा

२ ढंडि क माछौ तैं डाळों मा चढै़ दिन्दन चढ़ाण वळा

३ हैंसै- हैंसै की भि कतगै दौं त रुवै दिन्दन रुवाड़ वळा

४. रौतौं बळ्द मोरि दिदौ अपणि खुशिन

५ कर्यां- धर्यां मा मोळ -माटु छोळि दिन्दन छ्वळण वळा

६ मारि- बांधिऽ मुसळमान भि बणै दिन्दन बणाण वळा

७ पड़म- पड़म कुबथा बोली भि जुते दिन्दन जुत्याण वळा
In private conversation, famous Garhwali critic Virendra Panwar sees high promises from Dharmendra Negi in Garhwali poetry world.

हम सैणs का गोर भ्याल हकै सकदां

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हम सैणs का गोर भ्याल हकै सकदां
हम गौं कि द्वी सार्यूं गोर चरै सकदां
हम कैका भि पुंगड़ा को वाडु सरै सकदां
हम खास भयों मा भी लड़ै करै सकदां
किलैकि हम आजाद छां, किलैकि हम निरदुन्द छां
हम गौं का नवळौं मा मैणु छोलि सकदां
हम कैका भि डाळिकि नारंगी चोळि सकदां
हम कैका भी खल्यॉण मा दैं फोळि सकदां
हम कैखुणै,कखिम भी कुछ भी बोलि सकदां
किलैकि हम आजाद छां, किलैकि हम निरदुन्द छां
हम कैकि भि कूड़ि फरै बुजिना खे सकदां
हम अपणि बांठि खैकि हैंककि हते सकदां
हम कैकि भि कूड़ि अर छनुड़ि घंटे सकदां
हम कैका भि कान्धाउन्द झुंटे सकदां
किलैकि हम आजाद छां, किलैकि हम निरदुन्द छां
हम कल्यो खैकि कंडा भ्यालुन्द लमडै सकदां
हम बैलि भैंस्यों तैं लैन्दि बतैकि बेचि सकदां
हम कैकs भि मुंड कि लटुळ्यों तैं झमडै सकदां
हम खुटि अलगैकि बडु़ आदिम बणि सकदां
किलैकि हम आजाद छां किलैकि हम निरदुन्द छां
हम कैका बण्यॉ काम मा भांचि मारि सकदां
हम उकाल काटिकि सरपट भाजि भि सकदां
हम कैका भी तैकs मा अपणि भूड़ि तैलि सकदां
हम कैखुणैं भी कखिम भी बौंळि बिटै सकदां
किलैकि हम आजाद छां किलैकि हम निरदुन्द छां
हम जळड़ा घाम लगाण मा माहिर छां
हम हैंकका नौकि संगरांद बजाणका उस्ताद छां
हम हैंककि कुटीं घाण मा बणदा झट पर्वाण छां
हम भैरा खुणि बिर् वळि अर भितरा खुणि ढिराक छां
किलैकि हम आजाद छां किलैकि हम निरदुन्द छां
आप सब्यूं तैं आजादी कि भौत-भौत शुभकामना
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” छोड़ि दे ”
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रूणु गंगजाणु छोड़़ि दे
आँखा मळकाणु छोड़ि दे
उंठड़ि उफार ब्वलणु सीख
गिच्चु पळकाणु छोड़ि दे
स्यूं सांसु कैर हिकमत दिखौ
दगड़्या घबराणु छोड़ि दे
घ्वीड़-काखड़ सि मार उदाक
कौंपणु थथराणु छोड़ि दे
सर-सर कै हिट,अबेर नि कैर
घुमका लगाणु छोड़ि दे
बांठु अपणु हत्यो रै ‘खुदेड़’
मंगणु , टपराणु छोड़ि दे

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2017
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चमोली गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत इतिहास ; टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत इतिहास ; देहरादून गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत इतिहास ; हरिद्वार गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत इतिहास ;

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History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Uttarkashi Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Tehri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Dehradun Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Chamoli Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Pauri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History Garhwali poems from Haridwar ;

Jun
25

Interview with Garhwali Poet Dharmendra Negi by Bhishma Kukreti

Interview with Garhwali Poet Dharmendra Negi by Bhishma Kukreti
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गढ़वाली कवि श्री धर्मेंद्र नेगी के अपने बारे में कुछ विचार (लिखाभेंट /इंटरव्यू द्वारा )
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part – 165)
( गढ़वाली कविता क्रमगत इतिहास भाग – 165 )

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नाम- धर्मेन्द्रसिंह नेगी
गाँव- चुराणी, रिखणीखाळ

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पट्टी- इड़ियाकोट मल्ला
जिला- पौड़ी गढ़वाल
वर्तमान पता- स.अ., रा.पू.मा.वि.- जगदेई, पत्रालय- गौलीखाळ, नैनीडांडा पौड़ी गढ़वाल
जन्मतिथि- 19-06-1975
जन्मस्थान -ग्राम चुराणी, Rithakhal Pauri Garhwal
[ साहित्यिक ब्योरा- मेरी अज्यूं तक एक बाल उपयोगी पुस्तक कथा- चित्र- गीत “सिकासेरी” प्रकाशित ह्वेयीं छ अर कथा -चित्र -गीत “तीलू बाखरी ” अर “वीर बाळातीलू रौतेळी ” व छ्वट्टी छ्वट्टी बाल कविताओं की बाल पोथी प्रकाशनाधीन छन /
यांका अलावा कविता, कहानी, नाटक ,एकांकी आदि भी लिखीं छन / कुछ नाटकों को मंचन विद्यार्थियों द्वारा स्कूल का समारोह मा करेगे / कई पत्र पत्रिकाओं मा लेख अर कविता छपेणी रौन्दन /
सौभाग्य से उत्तराखण्ड का प्रतिष्ठित साहित्यकारों का दगड़ी मंचों मा कविता पाठ को सुअवसर भी मिलणूं रैन्द /
: समीक्षकों की राय- मेरा लेख अर कविताओं तैं जौं भी पाठकौं न पैढ़ी अर सूणी सब्यूंन भली भली सलाह देनी अर पीठ भी थपथपैइ / जब भी क्वी वरिष्ठ साहित्यकार अपणी सौसलाह देन्दन ता भौत भलु लगद अर भौत कुछ सिखणा को भी मिलद / नै छ्वाळी का लिख्वारों का वास्ता अड़ंदरौं का रूप मा वरिष्ठ साहित्यकारों को होणू भौत जरूरी छ /
: कविता क्षेत्र मा आणौ कारण – स्कुल्या दिनौ मा ही पिताजी का दगड़ा गढ़वाली साहित्य पढ़णौ चस्का लगिगे छौ | आकाशवाणी नजीवाबाद अर लखनऊ बिटि प्रसारित होण वला गढ़वाली अर कुमाऊंनी कार्यक्रमों का हम नियमित श्रोता छया | स्कुल्या दिनों मा ही लिखणौ शौक लगिगे छौ | कौप्यूं का पिछनै का पेज मा लेखिकी दगड़्यों तैं सुणाई वाहवाई लूटी अर फिर फाड़िकी फेंकी दे | नौकरी पर आणा बाद ब्यो ह्वेगे अपणी नै -नै ब्योली तैं भी अपणी कविता सुणैनी |वीन बोली जब तुम लिखदा छयॉ ता यूंको संकलन किलै नि करदा | मिन बोली संकलन कौरि मिन क्या करण ? कौन से मिन क्वी किताब छपवाण | वीन स्वयं मेरी रचनाओं तैं संकलन करणौ जिम्मा ले | एक बार विभागीय प्रशिक्षणा दौरान डायट चड़ीगाँव मा भैजी गिरीश सुन्दरियाल जी अर हरीश जुयाल जी से भेंट ह्वे साहित्यिक चर्चा परिचर्चा दौरान मिन भी अपणी रचना वूंतैं सुणैनी | वून रचनाओं की तारीफ कैरी अर लिखदा रैणा की अर रचनाओं तैं संकलित करणै सलाह दे | बस वी मेरो जीवनौ टर्निंग प्वाइन्ट छयो | आज अपणी रचनाओं तैं जब सोशियल मीडिया पर पोस्ट करदू ता पाठकों द्वारा भौत भला भला सुझाव , कमेन्ट्स अर लाइक मिलदन त औरि लिखणै हिकमत मिलदा |
रचनाओं पर कव्यूं को प्रभाव- मेरी रचनाओं पर कौं कव्यूं को प्रभाव छ यु त मि नि बतै सकदू हाँ मेरी रचनाओं का पाठक अर श्रोता जरूर यीं बात तैं बींगि सकदन अर बतै सकदन |
जख तक गढ़वाली साहित्यकारों का साहित्यै बात छ मितैं कन्हैयालाल डंडरियाल जी , निर्मोही जी, गोविन्द चातक जी , सायर साहब, अयाळ जी,ललित केसवान जी ,नरेन्द्रसिंह नेगी जी, देवेन्द्र जोशी जी, छिपड़ु दा ,नेत्रसिंह असवाल जी, भीष्म कुकरेती जी(सोशियल मीडिया पर), मदनमोहन डुकलाण जी, नरेन्द्र कठैत जी,वीरेन्द्र पंवार जी , गणी भैजी, गिरीश सुन्दरियाल जी, हरीश जुयाल जी , जगमोहन बिष्ट जी को गढ़वाली मा लिख्यूं साहित्य भौत उत्कृष्ट अर प्रेरक लगदा | कती बार पैढ़ी की भी ज्यू नि भुरेन्दो | यूंका साहित्य की जरा भी लसाक मैमा ऐजाव ता मी अपणो धनभाग समझुलु | भौतिक संसाधनों को महत्व – टेबल, खुर्सी को त मैं ज्यादा महत्व नी समझदो | हाँ पेन , नोटबुक अर इकुलांसौ साहित्यकारा जीवन मा भौत महत्व छ |
परिस्थिति का अनुसार लिखणा का वास्ता पेन, पेन्सिल , मोबाइल या कम्प्यूटरौ इस्तेमाल करदो |
कागज कनी भी मिलजो लेखिदिन्दो | हाँ रफ कॉपी मा लिखणमा भौत आनन्द औन्द | लेखा अर पसन्द नी औ त कागज चीरीकी फुन्ड धोलिद्यो |
शिक्षक होणा कारण अब पेन अर पॉकेट डायरी जेब मा रखणै आदत सी ह्वेगे |

कैबेरी क्वी विचार मन मा ऐ जाव अर नोट करणा को ज्यू नी ब्वनों ता मोबाइल मा वूं पंगत्यों तैं रिकॉर्ड कैरी देन्दो अर घौर मा ऐकी फुरसत से फिर फेयर कैरी देन्दो /
हाँ कतगै दौं भौत ज्यादा अलगस ह्वे जान्द अर मन मा अयॉ विचारों तैं ना ता नोट करेन्दो अर ना रिकॉर्ड / मन बोद कनु नी रालु घौर पौंछद पौंछद तक याद अर घौर मा ऐकी जब पंगती याद नी औन्दी ता अफु फरै भौत गुस्सा औन्द तब /
: अपणी रचनाओं तैं रिवाइज करणै जखतक बात छ मैं तैं अपणी कविता याद ता ह्वे जान्द पर व ज्यादा दिनों तक याद नी रौन्दी | यां मामला मा मिन गिरीश सुन्दरियाल भैजी से ज्यादा याद रखण वलो क्वी नी देखी वूंतैं अपणी त ह्वे ह्वे वांका अलावा सब्बि प्रसिद्ध गढ़वाली साहित्यकारों की रचना भी याद रैन्दन |
कविता की वर्कशॉप – मेरो मनणो यो छ की कविता जिकुड़ा बिटि उपजद , पर हाँ जु भी हम लिखदा छां वु अगर एक फौरमेट मा हो ता औरि भी दमदार अर मजेदार ह्वे जान्द | इलैई नै छ्वाळी लिख्वारों वास्ता कविता ही ना साहित्यै हर विधा की वर्कशॉप आयोजित करे जाण चैन्दी | जैमा वरिष्ठ साहित्यकारो तैं ऐक्सपर्ट अर मास्टर ट्रेनर का रूप मा आमन्त्रित करे जाण चैन्द | अब तक लिख्यूं सब्बी उत्तराखण्डी भाषाओं साहित्य वख उपलब्ध होण चयेन्द |
मैंतै भी अज्यूं तक यनि वर्कशॉप मा शामिल हूणौ सुअवसर नि मिली अगर भविष्य मा कभी मिललो ता मी जरूर शामिल होणौ प्रयास करलो |
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Copyright@ Bhishma Kukreti, 2017
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Jun
25

Working Plans in Resettlement of Garhwal Forests

Working Plans in Resettlement of Garhwal Forests

British Administration in Garhwal -121
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History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -138
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History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -975
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By: Bhishma Kukreti (History Student)

Deputy Conservator used to manage Ganga Ji Forest Division. His office for summer was in Lansdowne and in winter when forest cutting season used to start, it was in Kotdwara. Government divided Ganga Forest division into 7 ranges and rangers or deputy rangers used to supervise forest ranges.
In 1887, officials prepared a exploitation plan or working plan for the above forests. T.B.Bryant prepared working plan for Palain and Kotaridun forests in 1890. T.B. Byant was provided for preparation working plan for Ganga Forest Division barring Lansdowne range.
Bryant divided forests into four classes as per economic indexes-
1-A Grade forest – Those forests were full of mature Sal trees as Palain range. He prepared a selection method for selecting, and cutting the trees.
2-Second Grade Forests- There was shortage of tress suitable for furniture in those forests. Such forests were in Gohari, Udaypur, Kotari and Sona River regions. Only those forests were selected for cutting trees where useful trees were in abundance.
3-Third Grade Forests- In those forests, Shisam trees were selected and those cut trees could be flowed at the time of flooding. It was planned that such forests should be cut at the intervals of twenty year. Some trees were to be left for seedlings etc.
4-Fourth Grade Forests- No cutting to be carried out as those were non economical by many senses.

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References
1-Shiv Prasad Dabral ‘Charan’, Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 287-312
2- Walton Garhwal Gazetteer pages 11-15

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Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 25/6/2017
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -976
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*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
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(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

Forest settlement , History of British Rule, Administration , Policies, Revenue system, over Garhwal, Kumaon, Uttarakhand ; Forest settlement , History of British Rule , Administration , Policies Revenue system over Pauri Garhwal, Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system over Chamoli Garhwal, Nainital Kumaon, Uttarakhand; Forest settlement , History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system over Rudraprayag Garhwal, Almora Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system over Dehradun , Champawat Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule, Administration, Policies, ,Revenue system over Bageshwar Kumaon, Uttarakhand ; Forest settlement ,
History of British Rule, Forest settlement , Administration, Policies, Revenue system over Haridwar, Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand; Forest settlement ,

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