Apr
23

अनुज ‘घंजीर’ के ‘व्यंग्य का नंग’ प्रसंग पर ‘नंग’ का रंग ढ़ग

अनुज ‘घंजीर’ के ‘व्यंग्य का नंग’ प्रसंग पर ‘नंग’ का रंग ढ़ग
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Garhwali Satire by Narendra Kathait
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‘नंग’, सीधु हमारु ‘अंग’ नी, अंगौ ‘अंग’ च।
‘दंत्वी’ हद, खबड़ा तक अर ‘नंग्वी’ अंग्ळ्यूं का ‘पोर्यूं’ तक। ब्वनो मतबल यो च कि दाँत अर नंग, द्वी इन्नी चीज छन, जु हद से जादा बढ़ीं, कुस्वाणि लग्दन्। खबडा नंग्येकि, भैर अयां दाँत, कख छा भला। अंग्ळ्यूं कि पोर्यूं सि ऐथर बढ़्यां नंगै बि इज्जत नि रै जांदि। पर याँ मा खबड़ा अर अंग्ळ्यूं तैं दोष देणु ठीक नी। थुड़ा टोका-टाकि कैकि त् दांत खबड़ा भित्र, टप्प टुपरे जंदन्। पर नंग्वा, नाक मा त् सरम नौ कि क्वी चीज छयीं नी।
नंगू, एक हि रोणू च कि मनखी तौं तैं अंगुळों का ऐथर नि बढ़्ण देंदन्। पर अंगुळौं पर नंगू इन्नौ इल्जाम लगौणु, हम तैं जमि नी। किलैकि हम त् अपड़ि आँख्यूंन् द्यखणा छां कि अंग्ळ्यूंन् त् तौंकु तैं, कै दौं बोल यालि कि जा, जख तक तुमारि मर्जि औणि, बढ़ ल्या। पर कै काम औण तनु बढ़यूं? नंग ऐथर त् बढ़ जंदन् पर बढ़ी तैं न त् तौं पैथरै सुद्ध-बुद्ध रौंदि अर् न् ऐथर तौंकि क्वी पूछ होंदि। क्वी सुद्दि थुड़ि बोलगि कि ‘हद से जादा, क्वी बि चीज कख छै भलि? टंगड़ि उथगि तलक फैलावा, जथगा तलके चदरी मिलीं’। कै गरन्थ मा इन बि पढ़ण मा ऐ- ‘स्थान भ्रष्टा न शोभन्ति-दंता, केशा, नखा’।
बढ़्यां नंग्वी, हरकत देखी, कै बार, अंगुळा गरम ह्वे् जंदन्। गरम होणै बात बि छयिं च। क्य अंगुळौंन्, इन्नै-उन्नै नि फरकुणू? य अंगुळौंन्, काम धंधा नि कन्नू। नंग्वी इन्नी हरकत देखी, एक दिन, एक अंगुळू, अपड़ा बरोबर पर खड़ा, हैंका अंगुळा मा गरम ह्वेकि ब्वनो छौ कि ‘भैजी! यूं बढ़्यां नंगून् त् हमारि नाक मा दम्म कर्यालि। एक दिन, जरा बग्त निकाळा दि! सब्बि मिलि-जुली करा छुट्टि। गंदगी, देखा दि! छिः लोळा निरभागि! आखिर… य दिक्कत, हम मद्दि कै एकै त् छ नी, परेसनी सब्यूं तैं च उठौण प्वड़णि। न क्वी चीज अंक्वे कैकि पकडे़णी न् अंक्वे कैकि खयेंणी। यूंका चक्कर मा अपड़ि बि नहेंणी-धुयेंणी नी होणी। उल्टाँ ऐंच वळों कि टुक्वे हमतैं खाण प्वड़दि’।
इथगा सूणी तैं, हैंका अंगुळौ जबाब छौ कि ‘दिदा! त्यरु ब्वनो बिल्कुल सै च! यूं बढ़्यां नंगून्, हमतैं सदानि टुक्वे खलायि। हमारा बचपना मा बि जब यि हद से ऐथर बढ़्यां रैनी त् हमारि ब्वे भग्यनिन्, सयाणौं कि गाळि खैनी। सब्यूंन् हमारि ब्वे खुण्यूं बोलि कि ‘स्या लापबाह च हमारि परबरिस पर ध्यान नी देणी’।
थुड़ा बड़ा होण पर हम बड़ौं कि टुक्वे खाणा छां कि ‘कैन हमतैं तमीज सिखलायि नी’। यूं बढ़्यां, नंग्वी त्…ऐसी-तैसी’। पर झूठी बात! अपड़ा बढ़्यां नंग्वी, ऐसी-तैसी, क्वी नि कर्दू। बढ़्या नंगू तैं मनखी, देखी भाळि कटदू। कै बार, बड़ा पिरेम भौ से मनखी, अपड़ा दांतून् बि नंगू कुतुर्नु रौंदु। नंगू तैं पता च अपड़ा नंगू दगड़ा जोर-जबरदस्ती क्वी नी कर्दू। हम बि पता च कि ‘नंग’, सीधु हमारु ‘अंग’ नी, अंगौ ‘अंग’ च। नंगै त पिड़ा पचायीं च पर जै अंगौ नंग समाळ्यूं च वे पर त् पिड़ा छैं च।
वुन त् नंगू तैं, हद से अगनै बढ़ी तैं मिलि बि क्या? इन त् छ नी कि अंगुठा वळा नंगै इज्जत, बढ़ी तैं करअंगुळा नंग से जादा ह्वे ग्ये होवु। य बड़ि अंगळ्या मुंड मा, कैन हीरा-मोत्यूं कु मुकुट धार दे होवु। य बढ़ी तैं क्वी नंग, सीधा स्वर्ग चल ग्ये होवु। बढ़्यां नग्वी इज्जत बि तब हि तक च जब तक तौंकि पकड़ अंगळ्यूं का मासा तक च। मासा से ऐथर बढ़्यां नंगू मा, मासौ तैं पिरेम-भौ नि रै जांदु। न तौं मा दया धरम, नौ कि क्वी चीज बचीं रै जांदि। पर नंग इन कबि नि स्वच्दन, कि तौंकि मुखड़ि मा ‘चलकैस’ बि तब हि तलक च जब तलक सि मासा पर चिपक्यां छन। मासू छोड़ी नंगू मा रूखूपन्न ऐ जांदु।
बढ़्यां नंग्वी, सकल बि ‘क्याप’ ह्वे जांदि। वुन् त् सरसुती, कैकि सकल सूरत पर जादा ध्यान नी देंदी। सरसुती त लगन अर् मेनत पर जादा बिस्वास कर्दि। पर बढ़्यां नंगू से त् कलम बि अंक्वे नि पकड़ेंदि। अर् बिगर कलम पकड़्यां त् कुछ होण्यां नी। जब कुछ पढ़्ल्या, कुछ लिखल्या, तबि त् भाषा सिखल्या। यिं बात तैं न् सि समझ्दन्, न् तौंकि समझ मा औंदि। सुद्दि मोळा सि माद्यो! इलै सरसुत्या नजीक रैकि बि नंगून्, ‘बुगदरा’ देणा अलौ, कुछ नि सीखी।
बढ़्यां नंगू तैं कथगा बि समळंनै कोसिस कर ल्या धौं, सि फिर्बि कक्खि न् कक्खि जरुर ‘बिल्क’ जंदन। बिल्कणा बाद य बात पक्की च कि बिलक्यूं नंग, कै न् कैकु नुकसान जरूर करलु य नुकसान न् सै त् अपड़ि मोण तुड़वैकि जरुर लालु।
कै योगि अजक्याल इना बि छन, जु नंग्वा ‘मुंड’ लड़ौण सिखौणा छन। अपड़ा नंग्वा, आपस मा मुंड लड़ौंदु, एका योगि तैं हमुन् पूछि- ‘योगि जी! नंग्वा बारा मा कुछ बतलावा’? वेन् जबाब दे- ‘तंदुरुस्त रौण चाणा छयां त् खाली बग्त मा अपड़ा नंग रगड़ा’। हमुन् अगनै पूछि- ‘नंग रगड़ि-रगड़ी त् झड़ जाला’। योगिन् बोली- ‘भुला! क्वी बात नी, एक दौं का नंग झड़ जाला त् हैंकि दौं का जम जाला’। ताँ पर हमतैं ब्वन् प्वड़ि- ‘पर आखिर कथगा दौं आला, नंग त् रगड़ि-रगड़ी हरेक दौं झड़दि जाला’। योगि जीन्, बात समाळि- ‘अच्छा इन बता, दांत कथगा ‘भै’ छन’? हमुन् जबाब दे- ‘बत्तीस’।
हमारा ‘बत्तीस’ ब्वन पर योगि जी कु ब्वल्यूं सुण्ण मा ऐ- ‘बत्तीस न भुला! दाँत, कुल-कुलांत, द्वी भै छन’। ‘हे राँ! अब वू जमानू अब कख रयूं, जब सब्बि भै मिली-जुली रौंदा छयां। अब त् भै बिगळेकि सोरा, जख देखा ओडै-ओडा। जब तक एक भै सांस लेणू रौंदु, वेका धोरा-धरम हैकू नि औंदु। दंत्वा मामला मा बि इन्नी च, जब एक टूट जांदु, तब हैंकु औंदु। द्वी दांत अगर, एक हि जगा मा ऐ ग्या त् तौं मद्दि एका तैं तोड़्ण प्वड़दू’। हमुन् पूछि- ‘अर नंग’? वून जबाब दे- ‘भुला! नंग सात भै छन’। हम अगनै पुछूण चाणा छया कि वू सात भयूं मद्दि तुमुन् कथगा द्यख्नी? पर ऐन मौका हमारि बुद्धििन् हमारु हाथ पैथर खैंच दे। हम रुक ग्यां। किलैकि वू बोल सक्दा छया कि एक दौं अपड़ा नंग रगड़ी टुटुण त् द्या।
नंग्वी कमी छुपौणू तैं दुन्या, नंगू पर लाल, गुलाबी पौलिस बि कर्दि। पर पौलिस कैकि, सकल सुधरि ह्वलि, आदत सुधुर्दू त् हमुन् कैकि नि देखी। भ्वर्यां दरबार मा त् कालीदासा जबाब ‘इसारौं’ मा पढ़ै ग्येनि। पर इसारौं का, सारा-भरोंसा पर त् जिंदगी चल्दि नि। क्वी मानुु चा नि मानु य बात बि हमारि, खूब कैकि अजमयीं च कि एक न् एक दिन त् बात खुली ही जांदि। क्य कालीदासौ पता बिद्योतमा तैं बाद मा नि चलि? हम त् साफ अर् सीधी बात जणदाँ कि नंग अंगुठाऽ मुंड मा खड़ो होवु चा करअंगुळ्या चुफ्फा मत्थि, नंग द्यख्येणा छ््वटा-बड़ा ह्वे सक्दन् पर संत-मात्मा तौं मद्दि क्वी नि।
य बात बि क्वी सुद्दि नि बोल ग्ये ह्वलू कि नंगून् बगदौर्यूं घौ, बिस्सै जांदु। घौ पर बग्त पर ध्यान नि द्या त् कीड़ा गिजबिजाण बैठ जंदन्। पर इथगा त् हम बि द्यख्णा छां कि नंगू पर बुद्धि नौ कि बि क्वी चीज नी। भुज्जी, खाण गिच्चन् च पर नंग पैलि पर्वाण बण जंदन्। लौकि, ग्वदड़ि अर भट्टै त् नंग्वा ऐथर सामत हि अयिं रौंदि। लौकि, ग्वदड़ि अर भट्टा, कुंगळा होवुन् चा बुढ़्या, नंगै मर्जि सि जख चावुन् तौं पर गंज, गंजाक मार देंदन।
एक दिन, नंग्वी सतायिं-पितायिं, एक बुढ़्या लौक्यू’ ब्वल्यूं हमुन् इन सूणी ‘भुली! पैलि हम समझ्दा छा कि दाँत हि हमारा सबसि बड़ा दुस्मन छन। पर यूं नंगुन् त् म्वन से पैलि, हमारु जीणू हराम कर्यालि। घौर होवु चा बौण, गंज, गंजाक मार देणान। ये अन्यो द्यख्ण वळु क्वी नी। परमेसुरा बि झणि किलै, आँखा बुज्यां छन’। यीं बात पर ग्वदड़िन्, चक्रबिरधि ब्याजौ सि छौंका ढेाळी बोलि- डंक मन वळौं का दाँत नि हुंदन् दीदी!
लोेग यि बि ब्वल्दन् कि ‘नंग’ अर ‘बाळ’, चैबाटौं मा पुजणा काम अंौंदन्। कुजाणि भै! हमुन् त् यि देखी कि नंग अर बाळ तैं एका-हैका सि क्वी मतबल छयीं नि। म्वर्दू-म्वरदू तक न त् बाळ अपड़ि जगा बिटि जरा बि हिटदु अर न् नंग इन्नै-उन्नै ठस्कुदु। बाळ अर नंग एका-हैकै दुख-तकलीफ मा बि सामिल नि हुंदन्। द्वी खाणा-प्येणा, अफ्वी मा मस्त रौंदन्। जब बच्यां मा दुयूं का यि हाल छन त् मुर्यां मा यि चैबाटा पुजणा काम, कनक्वे ऐ जंदन्’?
बढ़्यां नंग, खून खतरी बि कर्दन। यीं बातौ पता हमतैं, एक दौं, इंत्यान देंद दौं, तब चली जब तै इंत्यान मा हमतैं सवाल पूछै ग्ये छौ कि ‘काळा डांडा रैंदु छौं, लाल पाणि प्येंदु छौं, नंगना सहर मा मरेंदु छौं, बता दौं, कु छौं’? ये सवालो जबाब देण मा हमतैं एक घंटा त् अपड़ो कपाळ खज्योण पर लगी। पर जबाब बि कपाळ खज्यांैद-खज्यांैद तब मिली, जब तख बिटि कैन जबाब दे- ‘अरे! टपरौणु क्य छयि? म्यरु नौ लेख ली दि’। हमुन् सुरक पूछि- ‘तू कु छयि’? वेन जबाब दे- ‘अरे कु त् वु छवूं, किस्मतौ म्वर्यूं, जँू छवूं भयि’! इनै, इंत्यान मा ‘जँू’ लेखी, जनि हमारु एक लम्बर पक्कू ह्वे, नंगून् भैर खैंची, वो जँू कचमोड़ दे।
हे लोळा नंगू….! कब आलि तुम पर सुबुद्धि्?
(नंग- व्यंग्य संग्रह – नाराज नि हुयां)
Copyright@ Narendra Kathait

Apr
23

Tribute to Chinmay Sayar by Narendra Kathait

Tribute to late Chinmaya Sayar by Narendra Kathait
साहित्यकार चिन्मय जी की पैली बरसी पर द्वी सब्द
जब तक लोक साहित्ये य छतरी रालि तब तक चिन्यम जी कि याद बि बरोबर औणी आली !!
दुन्या मा औणु अर दुन्या बिटि जाणु परमेसुरा हथ मा च। पर औण अर जाणा बीच जाण वळू हमारा बीच अपड़ि ज्वा छाप छोड़ जांदु, वांकि भरपै हमारि भरसक कोसिसा बाद बि नि ह्वे सक्दि। बस, जब-जब तौं पि़त्र्वी याद औंदि त तौं पि़त्र्वा ऐथर हम गौ बंध ह्वे जंदां। चेतन चोळा छोडुण सि पैली तौं पि़त्रू बिटि ज्वा सीख अर आसिरवाद मिली, वां खुणी एक बार न बल्कि बार-बार इस्मरण कनू हम अपड़ु फर्ज समझ्दां।
आज सि ठीक साल भर पैली ठेठ गुजराता छोड़ बिटि साहित्य स्यवा मा लग्यां, छुटा भुला गीतेश नेगीन् फोन पर जब य खबर सुणैं कि ‘साहित्यकार चिन्मय सायर अब हमारा बीच नीन’। गीतेशा यूं सब्दू पर बिस्वास नी ह्वे। फौरन सायर जी का मोबैल लम्बर 9634670194 पर वूं तैं टटोळनै कोसिस कै। अपड़ा मन मा सोची कि उन्नै बिटि हमारा बीच घुलीं-मिलीं आवाज सुणैली- हलो! भुला ऽऽ ! अर मि तपाक ‘ भाई साब ऽऽ नमस्कार!!!’ ब्वनू तयार रवूं। पर उन्नै बिटि वूंकि गम्भीर आवाजै जगा, वूंकि ब्वार्या ब्वल्यां यूं सब्दू पर मन मारी बिस्वास पक्कू कन प्वड़ि- ‘ससुर जीन् दस मार्च द्वी हजार सोळौ तैं आखिरी सांस ले।’ यिं खबर सूणी तैं गीतेशा फोन कन्ना बाद धुकधुक्या जु बादळ कट्ठा ह्वे छा वू छांटा ह्वे छा वु दिल मा गैरु घौ कैकि चिन्मय जी की फकत याद छोड़ गेनी। एक इना बग्त पर जब्कि हमारि भाषा अपड़ी जगा बणौणू तैं छटपटौणी च, चिन्मय सायर जना बड़ा साहित्यकारो हमारा बीच बिटि जाणू, हमारा साहित्यो भौत बड़ु नुकसान ह्वे।
चिन्मय सायर जी कि साहित्यिक जात्रा वूंका सुरेन्द्र सिंह चैहान मूल नौ बिटि सुरु होंदि। पर भरसक कोसिसा बाद बि सुरेन्द्र सिंह चैहान बिटि चिन्मय सायर बण जाणा हालात कबि मालूम नि ह्वे सक्नी। जथगा बार पूछी, हंस्दि-हंस्दि टाळ गेनी। पर इथगा सब्बि जणदन कि 17 जनवरी उन्नीस सौ अड़तालिसा,ै पौड़ी जनपद, रिखणी खाल बिलौका अन्दरसौं नौ का गौं मा, मयाळू मां चन्दा देब्या कोख बिटि खुशहाल सिंह चैहान जी का गुठ्यार मा आपौ जलम ह्वे।
पढ़ै-लिखै कि बुन्याद गौं का नजीकै इस्कूल मा प्वड़ि। अगनै एम.ए. तक स्या पढ़ै-लिखै, छोरा-छापर्यू जन ठोकर खै-खै मिली। लुपड़ा उमुरौ कुछेक बग्त, बाॅम्बै मा बि काटी। घौर ऐकि द्वी बार मास्टरी छोड़ी। पर आखिरी मा मास्टरी मा ही सकून मिली। सन् द्वी हजार आठ मा हैड मास्टरी बिटि रिटैर होणा बाद हौळ-तांगळ अर पुगड़ा-पटळौं कि धाण दगड़ा साहित्य स्यवा मा जुट्यां छा। गौं मा कम्प्यूटर बि रख्यूं छौ त दूर आपस मित्रू दगड़ा ब्वन- बच्याणू मौबैल बि। पर बिस्वास कबि बि कैका मुंड मा नी ढोळी। हाथन ही तमाम चिट्ठी पत्री लेखणा रैनी। चिन्मय जी की चिठ्यूं का ऐंच ‘शब्द संधान’ नौ का द्वी सब्द पढ़दि बिथेक कबीरौ खाकू दिमाग मा ऐ जांदू छौ।
दरसल, चिन्मय जी हमारि लिख्वार बिरादर्या वीं सोच का अग्ल्यार छा जौं सदानि यू पक्कू बिस्वास रै कि हमारा गौं-गौंळौं की भाषन् ही हिन्दी भाषा मजबूत ह्वे। इलै गौं-गौळौं की यिं भाषा तैं बचैण जरुरी च। पर हमारि अजक्यालै लोक भासै दसा अर दिसा देखी चिन्मय जी खुस नी छा। आपन एक चिट्ठी मा अपड़ि य पिड़ा इन लेखी- ‘अफसोस च! लेख्ण वळौं कु ना,…..बल्कण वूं कु तैं, जु गढ़वाळि ह्वेकि बि गढ़वळि पढ़ण-लेख्णै नी जण्दन। य सिख्ण समस्या समझ्दन। एक जगम बेधड़क लेख्यूं बि च कि-
लोग/ब्वे ;भाषा,जन्मभूमि, राष्ट्र।’
ैडुण सि बढ़िया
कटाणा छन…..
अर/म्यार लाटा
टै लटकै/ झटकाणा छन!!!
चिन्मय जीन् हिन्दी अर गढ़वाळि द्वी भाषौ मा खूब लेखी। गढ़वळि कबिता ‘पसीनै खुसबू’, ‘तिमलाऽऽ फूल’, ‘मन अघोरी’ अर ‘औनार’ किताब्यूं मा सुनागण जन चमकिणी छन। अन्धविस्वास पर यिं चोट देखा-
म्यर मुल्कौ जगरी
रात हूंण पर/लगांद रांसा
अर, फजल हूण से पैल
से जांद
लोग खुस छन कि/ यनम मवसि ह्वे जांद।
अजक्याळै भाग दौड़ वळि जिन्दगी पर चिन्मय जी की नजर देखा दि-
खाणा छल, पींणा, हंसणा छन / रूंणा छन
पण, ऐ जिन्दगी त्वे थैइ, क्वी-क्वी जींणा छन।
कबितौं मा मजबूत पकड़ होणा बाबजूद बि चिन्मय जी छर्क्या कब्यूं का जना लटका-झटकों सि दूर रैनी। एक-आत बार कबि मंच पर गै बि ह्वला पर वुन अफु तैं वे खांचा मा फिट नि समझि। प्रसिध्यू तै सौल-दुसाला ओडुण सि बढ़िया वून अपड़ा काम मा मग्न रैकि सिद्ध होण सहि समझी।
चिन्मय जी हलन्त, नवल, दुदबोली, बाल प्रहरी, शैलवाणी, हिमशैल मा चिन्मय जी बरोबर लेखणा रैनी, छपणा रैनी। गढ़वाळि मा नप्यां-तोल्यां सब्दू दगड़ा जु भौ चिन्मय जी का लेख्यां मा देख्ण मा मिल्दू, वू हौरि कक्खि खुज्योण पर्बि नि मिल्दू। इन ब्वन मा बि क्वी बड़पन्नै नी कि चिन्मय जीन् जु बि लेखी, दमदार लेखी। मन लगै कि लेखी। गैरा मा झांकी न, गैरा मा उतरी लेखी।
चिन्मय जी कु योगदान कुछैक पन्नो मा समेटणू सौंगु नी। द्वी किताब पे्रस मा छै। अज्यूं बि चिन्मय जी, थकी नी छा। वूं सि, अबि बि भौत उम्मीद छै। पर बिधातन अपड़ि हठपनै कु जु सांसू दिखै, वांकि उम्मीद, कै तैं बि, कतै नी छै।
चिन्मय जी आखिरी तक अपड़ि लोक माटि मा डट्यां रैनी। कक्खि उड-फुड भागी नीन्। यु ये लोक माटा दगड़ा चिन्मय जी कु गैरु पिरेम भौ हि छौ कि पराण बि वूंन अपड़ा माटा मा हि त्याग्नि। म्यरा मोबैल मा चिन्मय जी कु लम्बर आज बि मौजूद च। पर यिं बात जाणी-सुणी हौरि बि खुसि होंदि कि वे ही लम्बर बिटि वूंकि कुटुम्बदार्या बि हम दगड़ा अपड़ैसा तार जोड़ी रख्यां छन।
साहित्य तैं अगर हम एक छतरु माण ल्यां त् इन समझा कि चिन्मय जी का जाणन् छतरै एक सीक सि टूट ग्या। पर चिन्मय जीन् अपड़ा ठोस कामा बदौलत, ये छतरा तैं अपड़ि तिरपां बिटि जु बल अर टिकणै सामर्थ दे, वां तैं सब्दू मा बंधणु बड़ू मुस्कल च। फिर्बि इथगा जरूर बोल सक्दां कि जब तक लोक साहित्ये य छतरी रालि तब तक चिन्यम जी कि याद बि बरोबर औणी राली !! बरोबर औणि राली!!
10 मार्च 2017

Apr
23

गौं का प्याज तुमनें मीट्ठू नै चिताया अर् सैर के पिर्रा प्याज ने तुमको घड़ि-घड़ि रुलाया.

गौं का प्याज तुमनें मीट्ठू नै चिताया अर् सैर के पिर्रा प्याज ने तुमको घड़ि-घड़ि रुलाया.

व्यंग्य – नरेंद्र कठैत

गौं का प्याज तुमनें मीट्ठू नै चिताया अर् सैर के पिर्रा प्याज ने तुमको घड़ि-घड़ि रुलाया.
कट्यां दूबलै धौंणि मा कुर्सी डाळी वून बोली- क्य रख्यूं ये पाड़ मा?
हमुन् पूछी- क्य नी ये पाड़ मा।
वून एक किनारा थूकी जबाब दे- अजि कुछ नै है।
-हमुन् अगनै तौंकी टोन मा बोली- कुछ क्या नै है इस पाड़ में? क्य सांस लेणू को खुली हवा नै है? छोया-मंगरों को ठण्डु पाणि नै है? माटै कि साफ सुथरी गन्ध नै है? गौं-गौळा नजीक है। आस-पड़ोस, आबत-मित्र है। याँ से बक्कि क्य चैये?
-अजि हवा, पाणि, माटा ही सब्बि धणी नै होता । जिन्नगी बढ़ाणे के लिए हौरि धाणि बि चैये। असली चीज है रुजगार। वो तो है ही नै ।
-किसनै बोला रुजगार नै है?
-काँ है तब?
-क्य नैपाळि अर् बिहारि पाड ़मा तमाखू खैणी चबाणै आता है। सि बि त् रुजगार करता है। खाता है, कमाता है, बच्यूं-खुच्यूं नेपाळ, बिहार भिज्ता है।
-सि त् मिनत मजूूर है।
-हम बि त् भैर मिनत मजूर है। होटलू मा भाण्डा मंजाता है। य पहरा पर डण्डा बजाता है। साब लोग त् इणती-गिणती का है। पर ये बोलो कि खाणे-कमाणे को बि सगोर चए।
-अजि सगोर तबि त् हैगा जब कुछ रस्ता रैगा। बिना रस्ता का सगोर को काँ पैटाओगे।
-अच्छा जेे बताओ संकराचार्य जीले बदरीनाथ अर् केदारनाथ जाके कै करा?
-कन कै करा? उन नै धरम को मजबूत करा। धरम का पाड़ा सिखाया।
-पर ये त् नै बोला था कि भगवान के ऐथर जो रुप्यों कि थुपड़ि दे, वे सणी अगनै गाडो। अमीर अलग अर् गरीब अलग लैन में लगावो।
-तब अमीर अर् गरीब की लैन किनै लगाई?
-रूजगार नै। अर् जरा इन बि बताओ, क्य भगवान के नौ पर होटल ढ़ाबा संकराचार्य जीन् खोला?
-तब वो होटल ढ़ाबा किनै खोला?
-रुजगार ने।
-सूणों ज्यां-ज्यां से सड़क बदरीनाथ, केदारनाथ जाते है वां सि लेके भगवान तक करोड़ो को रुजगार होते हंै। अब त् भगवान जी कु परसाद बिदेसूं बि जाते है।
-कन क्वे?
-रुजगार से।
-अजि ये काम सबका बस का नै है?
-किनै का नै है?
-हमारा बस का त् नै है।
-बस जे ही तो बात है कि पाड़ आधा त् करम कना का बाद बि सरम से नै खाता है। अर् आधा करम से नै धरम सि जादा खाते है।
-पर पाड़ में सब्बि धाण्यूं कि सुबिधा नै है।
-जै दिन तुम गौं छोड़ कै सैर में गये थे तिस दिन बि तुमनें इन्नी बोला था कि पाड़ में सुबिधा नै है। पर सैर मा ऐ के तुमनें क्य फरकाया। सैर मा ऐकी बि तुम गौं पर चिब्ट्यां राया। साक भुज्जी से लेकी चुन्नू झंगर्याळ तक गौं बिटि मेटि-माटि सैर में लाया। अल्लू तुमनंे गौं मा बि थींचा अर् सैर मा बि थींचता है। गौं का प्याज तुमनें मीट्ठू नै चिताया अर् सैर के पिर्रा प्याज ने तुमको घड़ि-घड़ि रुलाया। अब तुमी जबाब देवो तुमनें सैर में क्य फरकाया?
-भै नौनो को पढ़ाया लिखाया रुजगार लगाया।
-नौनौ को पढ़ाया! क्य पढ़ाया? ऐ बोलो तोता जन रटाया अर् कबोतर जन उड़ाया। नौना तुमारि भोणी छोड़ी दुन्ये भगलोणी मा ग्याया। तुमुन् तो सर्रा जिन्नगी दौड़ लगाया, हाय तोबा मचाया, अर् आखिरी दां क्य कमाया? खप-खप्प जिकुड़ा पर बलगम का कुटेरा।
-पर भुल्ला !गौं मा अबि बि सब्यता नै है। जंगलीपना है।
-भैजी! जाँ तक सब्यता का बात है तो सब्यता तो तुमनंे बि जम्मा नै सीखा। बोलो कैसे?
-कैसे?
-बुरू तो नै माणेगा।
-नै-न !
- अपड़ि फेमिली का बिलौज बिटाळ के कन्धौं तक लिजाणा सब्यता तो नै है। अर् जाँ तक जंगल को सवाल है। चला माण गये गौं मा जंगली लोग रैता है। पर जंगल छोड़ के सैर मा एके बगीचा त् तुमनें बि नै लगाया। हियाँ स्याम-सुबेर तुम दुबलू छंट्याता है। गौं उजाड़ कै सैर लाया, अब दुयूंकि निखाणी कैके काँ जैंगे।
तौंने बोला- दिल्ली, डेरादूण जैगैं।
झूठ क्यांे कु बुलणा है, सि गये हैं। पर आज बि तख अगर तौं दुन्या के चैबाटे में छौळ लगता है तो पुजाणे घौर आता है। भैजी! सात धारों को पाणि त् हमनंे बि पबित्रर माणा है अर् स्यो हमको खप बि जाता है। पर ताँ से अगनै खरण्यां पाणि पर तो जम्मा बि बरकत नै है। अब अगर सि आता है तो कोई चिन्ता नै है…… तिनके उपर का परोख्या पाणि हमनंे अबि तक समाळी रखा है।
(अड़ोस-पड़ोस -व्यंग्य संग्रह)

Apr
23

Tribute to Puran Pant Pathik by Narendra Kathit

नरेंद्र कठैत द्वारा स्व पूरण पंत पथिक को श्रद्धांजलि
पथिक जी की गढ़वळि साहित्य का निब्त लगायिं ‘धै’ साख्यूं तक सुण्ये जालि, गुणै जालि !
गढवळि साहित्यकार बड़ा भै पूरण पंत‘पथिक’ जी का भग्यान होणै दुखद खबर मिली। वुन त पथिक जी कु सरेर लम्बा टैम बिटि वूंकु दगड़ु नि निभौणु छौ। फिर्बि हमतैं य उम्मीद कतै नि छै कि कड़क मिजाज पथिक जी इथगा जल्दि हमसि दूर जाला। पर क्य कन उम्मीद हमतैं आखिरी तक इनी झुठू दिलासु दिलौणि रौंदि। बिधि का बिधान का ये मामला मा हम सबि बेबस ह्वे जंदां।
पथिक जी दगड़ा आखरी मुलाकात २०१२ मा एक कार्यक्रम मा देहरादून मा ह्वे छै। टेलीफून पर कबि-कबार बातचित बि होणी रौंदि छै। ब्वल्ये बि जांदु कि दुख बांटी तैं हल्कु ह्वे जांदु। पर पिछला लम्बा टैम बिटि पथिक जी ब्वन-बचल्योण मा बि दिक्कत मैसूस कना छा। यिं बात तैं हम बि समझणा रयां। हमतैं यिं बातौ अफसोस च कि वु अपड़ि वीं पिड़ा अफ्वी प्येणा रैनी। साणा रैनी। अब जबकि पथिक जी हमारा बीच ससरेल नीन त गढ़वळया पैथर हमारा आंखा खुलुण सि पैलि अर पथिक जी का आंखा बंद होण तकै सर्रा तस्बीर हमारा ऐथर जरा-जरा कैकि घुमणी च।
पथिक जी ब्वल्दा छा- ‘भुला! भाषा मा हमारि संसकिरति च अर साहित्य मा संस्कार। इलै दुयूं पर आंच नि औण चऐणी।’ अर ये हि ध्ये लेकि पथिक जी आखिर तक अपड़ि भाषा ठडयोण मा लग्यां रैनी।
पर सच बात त या च कि हम मा पथिक जी कि प्रतिभा तैं तोलुण लैक ‘बाट’ हि नि रैनि। अपड़ि ‘वाह-वाह’ मा हमुन वूंकि ‘आह’ बि नि सूणी।
फिर्बि य फकत एक ‘धै’ नि एक सचै बि च कि पथिक जी की गढ़वळि साहित्य का निब्त लगांिय ‘धै’ साख्यूं तक सुण्ये जालि, गुणै जालि ! परमेसुर सि यि प्रार्थना च कि यिं दुखै घड़ि मा पथिक जी की आत्मा तैं शान्ति अर सब्बि आपस मित्रू तैं धीरज रखणै सग्ति मिलु।
पथिक जी तैं विनम्र श्रंद्धाजलि!
Tribute to late Puran Pant Pathik by Narendra Kathait , Tribute to Garhwali Language satirist Puran Pant Pathik,

Apr
23

CEO Guidelines

CEO should exercise Neeti (Prudence or Moral code)
(CEO Refresher – 1)
By- Bhishma Kukreti

अतः सदा नीतिशास्त्रम अभ्यासेद यत्नो नृपः।
यदिज्ञानांन्नरीपाद्याश्च शत्रुजित लोकरंजकाः।। 6 ।।
सुनीतिकुशला नित्यं प्रभवन्ति च भूमिपाः।
शब्दार्थानां न किं ज्ञानं व्याकरणाद्भवेत।। 7।।
(शुक्रनीति )

The Chief Executive Officer should exercise the Neeti Shastra in the organization. The CEO that exercises Neeti Shastra becomes successful in out beating the competitors and becomes successful in offering happiness to the personnel of the organization and associates.
When the CEO is versed with Neeti then only CEO can exercise the Neeti (suitable Management Style for the organization). Therefore, it is essential that CEO knows the Neeti.

Neeti means righteous things or rules and regulations Neeti means the objectives, rules and regulations for the organization. After setting value system in the organization the CEO should live for values and should do what she/he says.
The CEO should make a note for ever that discrepancies for moral code of conducts destroy the organization.
Living for values (Neeti) means enhancing energy into organization.

प्राकृतानां यादार्थानं न्यायकैर्बिना च किम।
विधिक्रिया व्यवस्थानां न किं मीमांसया विना ।। 8 ।।
देहादीनां नश्वरत्वं वेदांतैर्न विना ही किम।
स्वस्वाभिमत बोधिनी शास्त्राण्येतानि सन्ति हि ।।9 ।।
Is it possible for getting the knowledge of nature (mind) and materials without the use of logic ?
Is it possible for knowing the executional devices of actions without analysis? Is it possible to know the ephemerical properties of material without knowing Vedas or physics etc ? It means that knowledgeable wrote books for knowledge gaining.
(शुक्रनीति )
The CEO should analyze the facts from various angles and not from one angle. Using logic is the best device for analysis. Historical knowledge (Vedas) is essential for using logic or for analyzing any fact. CEO should adapt Investigating properties for taking decision. CEO should use memory for logical thinking. The logical thinking comes by reading books, taking notes from the learned persons and by experiences.
Knowledge of Code of Conduct is must for CEO
-
(CEO Refresher – 3)
-
—Bhishma Kukreti: The CEO Management Guru
-
सर्वाभीष्टकरं नीतिशास्त्रं स्यात सर्वसम्मतं।
अत्यावश्यं नृपस्यापि स सर्वेषां परभुर्यतः ।।12 ।।
(All are aware that Neetishashtra (Treatise for Code of Conducts) is for achieving all types of target. Since, the king is master of subjects he should know it. शुक्रनीति )

The code of conducts for every organization is essential and very important. The CEO is first entity that has to know code of conducts and should follow the code of conducts set for the organization. Small organizations do not keep it in written form but large organizations should distribute the same to each employee.
The code of conducts guides all managers for taking decisions. The frame works for taking decision in the organization are based on code of conducts of the organization headed by CEO. The code of conducts helps the organization cohesive working by employees inside the organization and guides he dealing with external stakeholders. The well framed codes of conducts help in protecting the prestige, legal standing and assets of organization when needed.
Code of conducts can cover any scope, from corporate level to workgroup level.
The CEO should know that employees will act as per code of conducts when the CEO has knowledge of code of conducts and he/she follows the code of conducts. For new organization, CEO should frames code of conducts with the help of all department heads.
Copyright@ CEO Guru, Mumbai, India, 23/4/2017
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(CEO Refresher – )
By- Bhishma Kukreti: The CEO Management Guru, Mumbai, India

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