May
01

Bedupako Voice Against Child Labor

In its endeavor to take social causes to masses via its 24×7 global radio, team bedupako dedicates the month of May 2012 to the cause of CHILD LABOR. 

Any and every 10-15 secs audio or video recording is welcomed as your voice against child labor all this month.

टीम बेडुपाको की अपील…

कोई कूँ नानतिन भगवान् रूप हुनि…
कोई कूँ नानतिन भोवक तस्वीर हुनि…
पे कस छू ऊ  मजबूरी …
जो हमर नानतिन हमर मजदूर हुनि…
बाल मजदूरी हमर आजक लिजी ना भो लिजी लै श्राप छू… अपण और अपण आस पासक सब्बे ननाओं को स्कूल भेजो…
भविष्य हमर तब जगमगाल…सब नानतिन जब पढ़ लिख जाल….

हिंदी रूपांतर

कोई कहता बच्चे ईश्वर का स्वरुप हैं…

कोई कहता बच्चे आनेवाले कल की तस्वीर हैं,

फिर कैसी है वो मजबूरी…
जो बच्चे मजदूरी करने पर मजबूर हैं…
बाल मजदूरी हमारे वर्तमान ही नहीं भविष्य पर भी अभिशाप है…अपने और अपने आस पड़ोस के सभी बच्चों को स्कूल भेजें…
भविष्य हमारा तब जगमगायेगा…हरेक बच्चा पढने लिखने जब जायेगा…

May
01

रमानी (Ramani)

चेला रमानी से कब उसे रमानी पुकारा जाने लगा उसे भी पता नहीं चला, गाँव- बखई वाले तो छोडो अब तो ईजा भी उसे रमानी पुकारने लगी वैसे रमानी उसका वास्तविक नाम नहीं था, उसकी अच्छाइयो की तरह उसका असली नाम भी कहीं खो गया था.
रमानी बहुत अच्छा अभिनेता था होली के स्वांगों में यह देखा जा सकता था हर पात्र को सहजता से सजीव कर देता. नाच वाह बीन बाजे और राम ढोल की धुन पर बाराती उस पर पैसे लुटाते न थकते थे.
स्कूल से उसे कुछ बैर था, मासैप उसे अखरते थे सो सात-आठ से आगे वह गया ही नहीं. इसका मतलब यह भी नहीं कि खेती-बाड़ी में वह निपूर्ण हो गया हो यह काम तो वह गवारों के लिए समझता था, पिता कचहरी में चपरासी थे कुछ ऊपर की कमाई कर लेते थे सो रमानी के ठाट कुछ बुरे न थे, पेंट की क्रीज कभी टूटी नहीं होती यू भी रमानी चार भाइयों और दो बहनों में बड़ा था सो आमा और ईजा उसपर प्यार उडेलती थीं.

रमानी १८ वर्ष पार कर गया उसके बौज्यू भी बीमार रहने लगे उधर रमानी के शौक भी बीड़ी और सुरती को पीछे छोड़ पैनामा और शराब पर जा पहुचे. रमानी मन ही मन सोचा करता की ‘बौज्यू मर जाय तो सरकारी नौकरी कहीं नहीं गई फिर तो दिल्ली वाले कुनिया- सुनिया उसके आगे क्या बेचते हैं बीए पास होकर भी प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं’. पर बौज्यू भी थे पुराने चावल दस- बारह दिन बिस्तर पकड़ते फिर भले चंगे पहुच जाते अल्मोड़ा कचहरी. रमानी भी मन मार कर रह जाता.

मनान कुछ गावों के बीच का एक छोटा सा बाजार, रमानी की दैनिक सैरगाह वही रमानी को मिले कुछ उसके हमख्याल. अव्वल दर्जे के हुड्ड पहाड़ी. एक दिन कौसानी जाती टूरिस्ट बस को देख रमानी ने अपने हमख्याल नबुवा से कहा ‘यार सब देशी गरमी में यहाँ आते हैं हम तो हुड्ड के हुड्ड ही ठहरे, हम भी देख आते हैं प्लेन्स’. कसिक जायेगा रे रमानी डबल कहाँ से आयेंगे ?’ हरु बौना बोला.
‘मेरा कहना मानो तो डबल तो आ ही जाएगें’ रमानी ने सबको भरोसा दिलाया. फिर रमानी के श्रीमुख से जो उपाय निकला उसे सुन सबकी आँखे चमक उठी. उपाय एकदम सरल था नबुवा, हरु, शिबुवा, पनुवा सबने अपने घर में कहा कि रानीखेत में मिलटरी में लांगरी (कुक) की भर्ती हो रही है, भला कौन रोकता सबके घरवालों ने गोलू, भगवती और ईष्ट देव का नाम ले भेज दिया रानीखेत. रानीखेत आना-जाना लगभग महिने भर तक लगा रहा. आखिर एक दिन सबने अपने- अपने घर खुशखबरी दे ही डाली के वे भर्ती हो गये है पर घूस के लिए पांच हजार रुपये देने हैं, सरकारी नौकरी के लिए पांच हजार वैसे कुछ के लिए बड़ी रकम थी सो किसी की ईजा ने गर्व से नथ बेची किसी ने कर्जा उठाया और थमा दिया अपने होनहारों के हाथ.
फिर आया विदाई का दिन रमानी की आमा ने जो आंसू किसी शुभ अवसर के लिए बचा रखे थे सब बहा डाले. ईजा भरे मन से केमू की बस में बिठा आई, सबके ईजा-बौज्यू, आमा-बुबू के यही हाल था कोई घी का डब्बा पैंच ले आया, किसी की ईजा ने खजूर की पोटली बांध दी. आस-पास के गावों में आग की तरह यह खबर फैली कई माँ-बाप अपनी लिकामिल (नालायक) औलादों को कोस रहे थे. खबर तो दिल्ली के बिरादरो तक भी पहुची किसी के मन में जलन हुई तो किसी ने कहा चलो अच्छा हुआ गरीब के बेटे को दो रोटियों का आसरा मिल गया.
रमानी और उसकी मित्रमंडली कहीं आर्मी में भर्ती नहीं हुई थी यह तो रमानी के शातिर दिमाग की उपज थी भारत भ्रमण के लिए. सभी अल्मोड़े में मिले वहाँ से बरेली, लखनऊ , कानपुर, आगरा, मथुरा दिन में सैर सपाटा, फिल्मे और रात को अंगरेजी बोतल मानो दुनिया के ये सबसे सुखी इंसान हों. कुछ दिनों में सब पहुचे गोरखपुर यहाँ एक समस्या पैदा हुई जमापूँजी लगभग समाप्ति के कगार पर थी. पनुवा तो रोते हुए रमानी को कोसने लगा, हरु बोणा को भी अब अपनी ईजा और भाई पकसु याद आने लगा बोला ‘भोते हों गया घुमन- फिरन हिटो घर’. पैसे की समस्या का हल भी था रमानी के पास उसने झोले से निकाली छोटी सी डायरी जिसमें थे अनगिनत पते. मनान के पोस्टमैन पंतज्यू जब भी रमानी को उसके गावं की चिट्ठियाँ गाववालो को देने के लिए देते वह भेजने वालों के पते अपनी डायरी में लिख लेता. आज वह मेहनत रंग लाने वाली थी. गोरखपुर का एक पता था गंगोत्री बुआ, पधानज्यू की बेटी जो वर्षों से गोरखपुर में रह रही थीं. रमानी और गंगोत्री बुआ दोनों ने एकदूसरे को कभी नहीं देखा था लेकिन यह रमानी की वाकपटुता ही थी जो वह उनसे ५०० रुपये झटक लाया. ‘हल्दुवानी तक का तो हों गया हगिल के देखी जायेगी’ रमानी बोला. ‘अरे घरपन के कहेंगे’ नबुआ बोला. ‘कह देंगे भाजी आये मिलटरी से’ रमानी का जवाब था.
हल्दुवानी आकर रमानी की मंडली एक होटल में काम पर लग गई, एक महिने बाद जो पैसे मिले वह लेकर रवाना हुए अपने – अपने गावं. वापसी का कारण पहले से तय किया था ‘भोते काम कराते हैं हो मिलटरी में सहन नहीं हुआ आ गये भाग के’ रमानी गावं भर को अपने हाथों के छाले दिखाते हुए कहता जो की हल्दुवानी के होटल में कोयले तोडते हुए बने थे. कुछ को यकीन हुआ कुछ को नहीं, लेकिन अब वह कुए का मेढ़क न रहा रमानी दुनिया का एक छोटा सा हिस्सा देख आया था सो उसकी चाल में कुछ अकड़ आ गयी पहनावा भी मार्डन हो चला. महिने की पहली तारीख को वह अल्मोड़ा पहुच जाता ताकि बौज्यू से कुछ रुपये ऐठ सके, ठीक सत्तर के दशक के बम्बइया खलनायकों की तरह. आखिर कब तक चलता यह सब रमानी की ईजा ने रमेश चंद्र ज्यू को अपना दुखड़ा कह सुनाया. गुहार लगाई कि इसे दिल्ली में कही काम पर लगा दो. रमेश चंद्र ज्यू ठहरे दिल्ली में सरकारी मुलाजिम सरकारी मकान मिला था परिवार उनका पहाड़ में ही रहता था, आदमी बड़े भले थे सो गावं – रिश्तेदार तमाम के लिए दिल्ली में उचित पड़ाव बन गया था उनका घर. रमानी को भी मिल ही गया एक नया पड़ाव.
रमेश चन्द्र ज्यू ने इधर- उधर करके रमानी को लगवा दिया एक फेक्टरी में हेल्पर. कुछ महिने ठीक रहे रमानी एक पुरानी सायकिल खरीद लाया अपने कद के कारण गद्दी पर बैठ कर नहीं चला पाया तो उसने कैरियर पर बैठ कर चलाना सीख लिया, मानो कोई राजकुमार घोड़े पर बैठा हो ऐसा अहसास रमानी को होता. दिन बीतते गये एक दिन रमेश चंद्र ज्यू को पता चला कि रमानी फेक्टरी में सहकर्मियों से सच्चे- झूठे कारण बता कर उधार लेता रहा है धीरे- धीरे तगादा करने वालों कि संख्या भी बढ़ने लगी जिनमें कालोनी के दुकानदार भी थे. रमेश चंद्र ज्यू ठहरे सीधी लैन में चलने वाले, लो़क-लाज से बचने वाले रमानी की हरकतें उन्हें नागवार गुजरी उन्होंने भी रमानी को अपने घर से नमस्ते कह दिया. अब फिर काम आई रमानी की डायरी जिसमें अबतक कई गुना पते जमा हो चुके थे, काम आया रमानी का अभिनय कौशल और वाकपटुता. कंजूसों में कंजूस से भी रुपये निकलवाने का हुनर रखता था वह, डायरी की फेरहिस्त इतनी लंबी थी की आज रमानी जिसके पास जाता उसका दोबारा नम्बर साल दो साल बाद ही आता. जब बिना काम किये कमाई हो रही हो तो कौन बेवकूफ होगा जो आठ-दस घंटे खटेगा रमानी भी इसी मंत्र का मुरीद हो चला था, उसका चरित्र ठीक प्रेमचंद की कहानी के चरित्र घीसू और माधव से मेल खाने लगा. रमानी ने प्रेमचंद को पढ़ा नहीं था पर उसकी सोच घीसू-माधव से भी आगे निकल गयी.
एक सुबह वह जा पंहुचा रमेश चंद्र ज्यू के दरवाजे पर बोला ‘कका बौज्यू चल बसे हो कल, माल बखई का रजुआ आया है घर से वह कह रहा था, तीन सौ रुपये दे दो घर जाने के लिए’. ‘तू के जायेगा रे हम सब को जाना पड़ेगा लिजा फिर डबल’ रमेश चंद्र ज्यू ने तीन सौ रुपये थमा दिये रमानी को. खुद पहुचें सर मुंडवा कर अपने चचेरे भाई के पास बोले ‘हिट गोपाल घर रमदा नहीं रहे’. मोबाईल और फोन का जमाना अभी दूर था. सारी बात गोपाल के गले नहीं उतरी उसने गावं की बिरोजा फेक्टरी में पांडेजी को फोन किया पता चला की रमदा ढोन के खेतों में हल चला रहे हैं, रमेश चंद्र ज्यू को काटो तो खून नहीं कभी गोपाल को देखते कभी अपने मुंडाए सर पर हाथ फेरते.
रमानी की शादी की उम्र पीछे छूट रही थी, छोटे भाई बहन भी ब्याह लायक हो गये थे, घर वालों ने सोचा की इसका पैर उलझा दो तो शायद सुधर जाय सो दिल्ली में एक कंपनी में सुपरवाइजर बता रमानी की शादी हो हो गई, अपनी औकात से अधिक दान-दहेज लेकर गरीब घर की सुशील बहू घर आई. इस बहू की परिणिति भी कफन कहानी के पात्र बुधिया जैसी ही होनी तय थी. रमानी के किस्से जगजाहिर होते जा रहे थे शौक हर कीमत पर पूरे किये जाने थे सो अब नजर पत्नी के गहनों पर थी कुछ तो बिक भी चुके थे. तंग आकर पत्नी ने जहर की शीशी गले में उतार ली और चल बसी. एक और बुधिया दम तोड़ गयी प्रमचंद की बुधिया की प्रसव के दौरान मौत स्वाभाविक थी लेकिन इस बुधिया ने स्वयं मौत का आलिंगन किया था, बेमौत मौत.
पत्नी की मौत का दुख रमानी की आँखों में नजर आया हो ऐसा तो किसी को लगा नहीं. अलबत्ता वह और अधिक यायावर हो गया. दिल्ली, मुंबई, देहरादून, कानपुर जहां भी वह जाता महिने दो महिने में जहाज के पंछी की तरह लौट आता अपने गावं. वह स्वयं को अस्पताल कर्मचारी, एक्सपोर्ट हाउस सुपरवाइजर, सुरक्षा अधिकारी, पटवारी, सेल्समैन जाने क्या-क्या बताता, यहाँ बात काबिलेगौर है की वह इन पदों के बारे में पूरी जानकारी भी रखता था. जेब में लटके दो पेन, कंधे पर काला बैग, चमचमाते जूते लोग उसे ताड़ ही नहीं पाते कि असल में रमानी है क्या ? वह तो उसके द्वारा ठगे जाने पर भी उससे सहानुभूति रखते. वैसे रमानी की ठगी कोई बड़ी नहीं थी बल्की कुछ तो इसे ठगी भी नहीं मानेंगे. वह तो मात्र २०० से ८०० रुपये तक की रकम ऐठता था ताकि उसका एक दो दिन का खर्चा चल जाय, शायद सोने का अंडा देले वाली मुर्गी की कहानी से वह वाकिफ था, ऐसा कभी नहीं हुआ की उसने कोई लंबा हाथ मारा हो. जनकुली काकी के घर एक शाम रमानी एक दर्जन केले लेकर पंहुचा, रात खिमु काका में मुर्गा बनाया बोतल भी आई रमानी खा पी कर वही सोया. सुबह खिमु काका चले अपनी ड्यूटी उनके जाने के बाद रमानी बोला ‘काकी पांच सौ दी दियो, तनखा नहीं मिली दो महिने से’ जनकुली काकी बोली ‘नहीं है चेला अपने कका से क्यों नहीं मांगे.’ रमानी दार्शनिक कई मुद्रा में बोला, ‘जब तुमर पास पांच सौ नहीं तो के कर रहे हो दिल्ली घर हिटो, तुम ना कह रहे हो तो चचा कौन सा हाँ करते क्यों मांग कर अपना मुह खराब करना ठहरा’.
इसी तरह रमानी ने दस- पन्द्रह साल गुजार दिये, आमा और बौज्यू चल बसे बौज्यू की जगह छोटे भाई को नौकरी मिली, छोटे भाई बहनों के विवाह हो गये. घर में रमानी को न्यार करके एक पुराना घर दे दिया गया. आज भी रमानी कभी दिल्ली, हल्दुवानी, अल्मोड़ा, देहरादून कहीं भी मिल जायेगा ४० पार कर चुका रमानी सन्यासी के समान जीवन जी रहा है, जहाँ शाम ढले वहीँ बसेराकर लिया, परिवार और समाज का कोई बंधन नहीं, ना कोई अपना न पराया. उसकी वाक्पटुता और भी परिपक्व हो चली है रमानी आधुनिक युग का पीर फकीर हो गया है, वह सोने के अंडे में विश्वास करता है मुरगी हलाल करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं.
समाप्त
कई मित्रों के अनुरोध पर रमानी की पूरी कहानी की इती हो रही है.

Apr
25

मानव निर्मित एक उत्क्रष्ट रचना “घराट” या “घट” का अस्तित्व खतरे में

घराट  जिसे पनचक्की भी कह सकते हैं आज अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है | प्राचीन काल में जब विद्युत चक्कियां नहीं हुआ करती थी तब लोग घराट से ही कूटने-पीसने का कार्य  किया करते थे | प्राचीन काल में इसका बहुत प्रयोग किया जाता था,परन्तु आज विद्युत् चालित चक्कियु के आ जाने के कारण इनका प्रयोग बहुत कम  होने लगा है या ये कहें कि ना के बराबर हो रहा है | इसका मुख्य  कारण आज लोगों के पास समय की कमी है आज कि भाग-दौड़ भरी जिंदगी में मनष्य के पास इतना समय  नहीं है,वह हर काम को जल्दी में निपटाना चाहता है  इसलिए वह घराट के बजाय चक्कियु का प्रयोग अधिक करता है | विद्युत् चालित होने के कारण घराटों की अपेक्षा इसमें कम समय लगता है जिससे समय की बचत होती है और बचे हुए समय को अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में व्यय किया जा सकता है.

घराट का निर्माण  मनुष्य स्वयं ही करता था,यह मानव  निर्मित  एक  उत्क्रस्ट  रचना है | पानी से चलने के कारण इसे “घट’ या “घराट’ कहते हैं। पनचक्कियाँ प्राय: सदानीरा नदियों के तट पर बनाई जाती हैं। इसमें पानी लाने के लिए लगभग  २०० से ३०० मीटर का निर्माण किया जाता है यह गूल पीछे से चौड़ी और आगे की ओर संकरी बनायीं जाती है जिससे कि पानी में वेग उत्पन्न हो सके | गूल द्वारा नदी से पानी लेकर उसे लकड़ी के पनाले में प्रवाहित किया जाता है जिससे पानी में तेज प्रवाह उत्पन्न हो जाता है। इस प्रवाह के नीचे पंखेदार चक्र (फितौड़ा) रखकर उसके ऊपर चक्की के दो पाट रखे जाते हैं। निचला चक्का भारी एवं स्थिर होता है। पंखे के चक्र का बीच का ऊपर उठा नुकीला भाग (बी) ऊपरी चक्के के खांचे में निहित लोहे की खपच्ची (क्वेलार) में फँसाया जाता है। पानी के वेग से ज्यों ही पंखेदार चक्र घूमने लगता है, चक्की का ऊपरी चक्का घूमने लगता है।

पनचक्की प्राय: दो मंजिली होती है। कही पंखेदार चक्र के घूमने की जगह को छोड़कर एक मंजिली चक्की भी देखने में आती है। भूमिगत या निचली मंजिल में पनचक्की के फितौड़ा, तलपाटी (तवपाटी), ताल (तव), काँटा (कान), बी, औक्यूड़, तलपाटी को दबाने के लिए भार या पत्थर तथा पनेला (पन्याव) होते हैं। ऊपरी मंजिल में निचला चक्का (तवौटी पाटि), ऊपरी चक्का (मथरौटी पाटि), क्वेलार, चड़ि, आधार की लकड़ी, पन्याइ तथा की छत की रस्सियों से लटका “ड्यूक’ जिसे कुमाओं में ‘डव्क’ कहा जाता है होता है।

पनचक्की निर्माण के लिए सर्वप्रथम नदी के किनारे किसी उपयुक्त स्थान तक गूल द्वारा पानी पहुँचाया जाता है। उस पानी को फिर ऊँचाई से लगभग ४५  के कोण पर स्थापित लकड़ी के नालीदार पनाले में प्रवाहित किया जाता है, इससे पानी में तीव्र वेग उत्पन्न हो जाता है। पनाले के मूँह पर बाँस की जाली लगी रहती है, उससे पानी में बहकर आने वाली घास-पात या लकड़ी वहीं अटक जाती है। गूल को स्थानीय बोली में “बान’ भी कहा जाता है। पनाले को पत्थर की दीवार पर टिकाया जाता है। गूल के पानी को तोड़ने के लिए पनाले के पास ही पत्थर या लकड़ी की एक तख्ती भी होती है, जिसे “मुँअर’ कहते हैं। इसे पानी की विपरीत दिशा में लगाकर जब चाहे पनाले में प्रवाहित कर दिया जाता है या पनाले में पानी का प्रवाह रोककर गूल तोड़ दी जाती है। “पनाला’ प्राय: ऐसी लक़ड़ी का बनाया जाता है, जो पानी में शीघ्र सड़े-गले नहीं। स्थानीय उपलब्धता के आधार पर पनाले की लकड़ी चीड़, जामुन, साल (Shoera robusta ), बाँस, सानड़ (Ougeinia oojennesis ), बैंस, जैथल आदि किसी की भी हो सकती है। पनाले की नाली इस तरह काटी जाती है कि बाहर की ओर नीचे का सिरा संकरा तथा भीतरी ओर गोल गहराई लिए हुए हो। पनाले का गूल पर स्थित सिरा चौड़ा और नीचे का सिरा सँकरा होता है। सामान्यत: पनाले की लंबाई १५-१६ फीट होती है और गोलाई लगभग २ फीट तक होती है, परन्तु यह नाप घट-बढ़ भी सकती है। पनाले को जंगल में ही बनाकर ग्रामीण लोग सामूहिक रूप से घराट तक लाते हैं |

फितौड़ा लकड़ी का ऐसा ठोस टुकड़ा होता है, जो बीच में उभरा रहता है और दोनों सिरों पर कम चौड़ा होता है। इसका निचला सिरा अपेक्षाकृत अधिक नुकीला होता है, जिस पर लोहे की कील लगी होती है। यह कील आधार पटरे के मध्य में रखे लोहे के गुटके या चकमक पत्थर के बने ताल पर टिका रहता है। इन दोनों को समेवत  रुप से ताल काँटा कहा जाता है। तालकाँटे को कही “मैनपाटी’ भी कहा जाता है। फितौड़ा प्राय: सानड़, साल, जामुन, साज (Terrninalia alata ) की लकड़ी का बना होता है। आधार पटरा प्राय: साल या सानड़ की लकड़ी का होता है। “तालकाँटे’ की कहीं मैणपाटी भी कहते हैं। फितौड़े के गोलाई वाले मध्य भाग में खाँचों में लकड़ी के पाँच, सात, नौ या ग्यारह पंखे लगे रहते हैं। इनकी लंबाई १-१ /४ फीट तथा चौड़ाई ३ /४ फीट तक होती है। पंखों की लंबाई-चौड़ाई ऊपरी चक्के के वजन और फितौड़े के आकार-प्रकार पर निर्भर करती है। पंखों को “फिरंग’ कहा जाता है। पंखों में प्राय: चीड़ या साल की छड़ फँसाई जाती है, जो निचले चक्के के छेद से होती हुई ऊपरी चक्के के खाँचे में फिर लोहे की खपच्ची (क्वेलार) में फँसाई जाती है, निचले चक्के में स्थिति छेद में लकड़ी के गुटके को अच्छी तरह कील दिया जाता है, जिससे मडुवा आदि महीन अनाज छिद्रों से बाहर न निकल सके। लोहे की इस छड़ को “बी’ कहा जाता है। आधार के पटरे को पत्थरों से अच्छी तरह से दबा दिया जाता है, जिससे वह हिले नहीं। आधार पटरे के एक सिरे को दीवार से दबा कर दूसरे सिरे पर साज या साल की मजबूत लकड़ी फँसा कर दो मंजिलें तक पहुँचाई जाती है, जहाँ उस पर एक हत्था लगाया जाता है। इसे “औक्यूड़’ कहते हैं। औक्यूड़ का अर्थ है – उठाने की कल। औक्यूड़ को उठाने के लिए लकड़ी की पत्ती प्रयोग में लाई जाती है, जो सिरे की ओर पतली तथा पीछे की ओर मोटी होती है। इस पर भी हत्था बना रहता है। औक्यूड़ उठाने से घराट का ऊपरी चक्का निचले चक्के से थोड़ा उठ जाता है, जिससे आटा मोटा पिसता है। औक्यूड़ को बिठा दिया जाए, तो आटा महीन पिसने लगता है। औक्यूड़ की सहायता से आटा मोटा या महीन किया जाता है। दुमंजिले में “बी’ को बीच में रख कर निचला चक्का स्थापित किया जाता है। निचले चक्के (तवौटी पाटि) को स्थिर कर दिया जाता है। फिर निचले चक्के के ऊपर ऊपरी चक्का रखा जाता है। इसी ऊपरी चक्के के खांचे में फंसी लोहे की खपच्ची को फितौड़ से ऊपर निकली लोहे की छड़ की नोक पर टिकाया जाता है। ऊपरी चक्के को “मथरौटि पाटि’ कहा जाता है। ये चक्के पिथौरागढ़ जनपद के बौराणी नामक स्थान के सर्वोत्तम माने जाते हैं, जो घिसते कम हैं और टिकाऊ भी होते हैं। इन्हें निर्मित करने में बौराणी के कारीगर सिद्धहस्त माने जाते हैं। चक्की को भी गांव वाले सामूहिक रुप से पनचक्की स्थल तक लाते हैं। ऊपरी चक्के पर अलंकरण भी रहता है। बौराणी के चक्के उपलब्ध न होने पर स्थानीय टिकाऊ व कठोर पत्थरों के भी कई लोग चक्के बनाते हैं।

ऊपरी चक्के से लगभग दो-ढाई इंच छत में बँधी भांग (cannabis Sativa) , रामबांस (Agave americana ) या बाबिल (Eulalipsis binata ) की रस्सियों की सहायता से किंरगाल (Chimnobambusa faicata and C. jaunsarenisis ) का “डोका’ बनाया जाता है। यह किसी पेड़ के तने का शंक्वाकर खोखल का भी हो सकता है सामान्यतः यह लोहे की पतली पत्ती का बना होता है जिसका निर्माण  लोहार द्वारा किया जाता है, जो उल्टा लटका रहता है, अब यह तख्तों से बॉक्स के आकार का भी बनने लगा है। इस डोके के निचले संकरे सिरे पर एक “पन्याइ’ या “मानी’ लगी रहती है। यह आगे की ओर नालीनुमा मुख वाली होती है। मानी डोके में डाले गए अनाज को एकाएक नीचे गिरने से रोकती है। इस मानी के मुखड़े की ओर से पीछे की ओर नाली लगभग २५ अंश से ३० अंश का कोण बनाती हुई काटी जाती है। यह मानी या पन्याइ गेठी (Boehmeria regulosa ) जामुन, बाँज आदि की बनी होती है। मानी की नाली से अनाज की धार को नियंत्रित करने के लिए कभी गीले आटे का भी लेप उसके मुँह पर लगा दिया जाता है। इस मानी या पन्याइ के पीछे की ओर छेद करके उसमें कटूँज (Castanopsis tribuloides ) बाँज या फँयाट (Quercxus glauce ) की तिरछी लकड़ी फँसा दी जाती है। यह लकड़ी मानी और डोके का संतुलन बनाए रखती है। आवश्यकता पड़ने पर इस तिरछे डंडे पर रस्सी बाँध कर मुँह को ऊपरी चक्के में बने छेद के ठीक ऊपर रखा जाता है। जिससे अनाज के दाने चक्के के पाट के भीतर ही पड़े, बाहर न बिखरें। डोके और मानी की रस्सियों पर गाँठे लगी रहती हैं। इनमें लकड़ी फँसाकर आवश्यकतानुरुप डोके व मानी को आगे-पीछे कर स्थिर कर दिया जाता है। इस तिरछे डंडे पर एक या एकाधिक पक्षी के आकार के लकड़ी के टुकड़े इस प्रकार लगाए जाते हैं कि उनका निचला सिरा चक्के के ऊपरी पाट को निरन्तर छूता रहे। इन्हें “चड़ी’ कहा जाता है, क्योंकि ये चक्के के ऊपरी पाट पर सदा चढ़ी रहती है। ये चड़ियाँ चक्के के घूमते ही मानी और डोके को हिलाती है, अनाज के दाने मानी की धार से चक्की में गिरने लगते हैं और चक्की अन्न के दानों को आटे में परिणत कर देती

पानी से चलने वाले इस पूरे संयंत्र को “घट’, “घराट’ या “पनचक्की’ कहते हैं। घराट को वर्षा या धूप से बचाने के लिए उसके बाहर १० से १६ फीट तक लंबा तथा ६ से १० फीट तक चौड़ा एक कमरा बना दिया जाता है। रात में आदमी वहाँ सो भी सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्र में पानी की माप “घट’ या “घराट’ से मापी जाती है जैसे – इस नदी में इतने “घट’ पानी है|

प्राचीन काल में अधिकाँश लोगों के पास अपने घराट हुआ करते थे जो उनके जीवन-यापन का एक प्रमुख  साधन हुआ करते थे |लगभग सभी लोग घराट में ही गेहूं,जों,बाजरा आदि पीसते थे.इसके बदले में घराट स्वामी को पिसे हुए अनाज में से कुछ हिस्सा दिया जाता था,जिसे कुमाउनी भाषा में ’भाग’ कहा जाता है | इस  हिस्से से घराट स्वामी के पूरे परिवार का भरण-पोषण  बड़ी ही आसानी से हो जाता था |

परन्तु आज पनचक्की या घराटों का अस्तित्व खतरे में आ गया है,कुछ गिने-चुने घराटों को छोड़कर लगभग सभी घराट बंजर हो चुके हैं इनको पुनः अस्तित्व में लाने के लिए सरकार को भी ठोस कदम उठाने चाहिए | सरकार को चाहिए कि घराट स्वामियु को कुछ पारिश्रमिक दे जिससे वे फिर से अपना ध्यान  घराटों कि तरफ आकर्षित करें और हमारी प्राचीन संस्कृति की एक बेहतरीन कृति अपना अस्तित्व फिर से प्राप्त कर ले.

 

Apr
25

उत्तराखंड की प्राकृतिक धरोहर – पाताल भुवनेश्वर (Patal Bhuvaneshwar)

पाताल भुवनेश्वर उत्तराखंड की पहाड़ी वादियुं के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है | रहस्युं को खुद में समेटे यह गुफा अपने आप में प्राचीन शिल्प का एक जीता जागता उदहारण है | यहाँ पत्थरों से बना एक-एक शिल्प तमाम रहस्युं  को अपने आप में समेटे हुए है | मुख्य द्वार के बाद ८० फिसलन  भरी सीढियां उतरने के बाद एक ऐसी दुनिया के दर्शन होते हैं जो युगों-युगों का इतिहास एक साथ साथ बयां करती है | गुफा में बने पत्थरों के ढांचे देश की आध्यात्मिक वैभव की की पराकास्ठा के विषय में सोचने को मजबूर कर देते हैं |  पुराणों में इस गुफा के विषय में लिखा है की त्रेता युग में सबसे पहले इस गुफा को राजा ऋतुपर्ण ने देखा था,द्वापर युग में पांडवों ने यहाँ पर चौपड़ खेला था और कलयुग में जगतगुरु शंकराचार्य का ८२२ ई० के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहाँ तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया | इसके बाद कहीं जाकर चंद राजाओं ने इस गुफा को खोजा |

आज यह गुफा सैलानियुं के आकर्षण का केंद्र है | देश विदेश से अनेक सैलानी यहाँ वर्षभर आते रहते हैं और गुफा के स्थापत्य को देखकर दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं |  मान्यताएं चाहे जो भी हो पर एक बार गुफा को देखने के बाद उस समय के स्थापत्य कला के नमूने को झुठलाया नहीं जा सकता | गुफा के शुरुआत में पत्थरों पर शेषनाग के फनों की तरह उभरी आकृति नज़र आती है | मान्यता यह है की धरती इसी शेषनाग के फनों पर टिकी है | आगे बढ़ने पर एक छोटा सा हवन कुंड दिखाई देता है | ऐसा कहा जाता है की राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जन्मेजय ने इसी कुंड में सभी नागों को जला दिया परन्तु तक्षक नाम का एक नाग बच निकला और उस नाग ने राजा परीक्षित को डस लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी | हवन कुंड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी हुयी है | इससे आगे चलने पर ऐसा महसूस होता है जैसे हम किसी की हद्दियुं पर चल रहे हों | सामने की दीवार पर काल भैरव की जीभ की आकृति दिखाई देती है | इससे कुछ आगे चलने पर एक मुड़ी गर्दन वाला गरुड़ एक कुंड के ऊपर बैठा दिखाई देता है | इसके विषय में ऐसा खा जाता है भगवान शिव ने इस कुंड को अपने सापों को पानी पिलाने के लिए बनाया था , इस कुंड की देख रेख के लिए एक गरुड़ को रखा था लेकिन जब गरुड़ ने ही इस कुंड से पानी पिने की कोशिश की तो शिव ने उसकी गर्दन मरोड़ दी |

कुछ आगे चलने पर एक ऊँची दीवार पर जतानुमा संरचना उभरी हुई दिखाई देती है | यही पर एक जलकुंड है ऐसी मान्यता है की पांडवों के वनवास के समय विश्वकर्मा ने उनके पानी पिने के लिए इस कुंड का निर्माण किया था | कुछ आगे बढ़ने पर  दो खुले दरवाजों के अन्दर एक संकरा रास्ता जाता है , इन दरवाजों के विषय में कहा जाता है की यह द्वार धर्म द्वार और मोक्ष द्वार है | इसके आगे ही आदिगुरू शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित तांबे का शिवलिंग है | माना यह भी जाता है की गुफा के अंतिम छोर पर पांडवों ने शिवजी के साथ चौपड़ खेला था | लौटते हुए चार पत्थर नज़र आते हैं जो चारों युगों के प्रतीक हैं | इसमें से एक पत्थर धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रहा है माना यह जाता है की यह कलयुग है जो धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बाद रहा है ओर जब यह पत्थर दीवार से टकरा जायेगा तो प्रलय होगा ओर कलयुग का अंत हो जायेगा |

गुफा की शुरुआत पर वापस लौटने पर एक मनोकामना कुंड है इस कुंड के बीच में एक छेद बना हुआ है इस कुंड के विषय में मान्यता है की इसके बीच से धातु की कोई चीज़ पार करने पर मांगी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है | जमीन के इतने अन्दर होने के वावजूद भी यहाँ पर एक अद्भुत शांति का एहसास होता है यह किसी चमत्कार से कम नहीं है | देवदार के घने जंगलों के बीच बसी रहस्य और रोमांच से सरोबार  सैलानियुं के बीच आज अपनी एक अलग पहचान रखती है | कुछा श्रद्धा से और कुछ रोमांच का अनुभव लेने के लिए यहाँ आते रहते हैं और यहाँ आकर एक अभ्युतम शांति का एहसास करते हैं | यहाँ आकर सभी अपने साथ कुछ न कुछ नयी जानकारी लेकर जाते हैं | गुफा के बाहर हरे-भरे वातावरण में पर्यटकों के लिए सुन्दर होटल भी बनाये गए हैं |

गंगोलीहाट की एक ख़ास बात यह है की यहाँ ऐसी ही दस से अधिक गुफाएं है जो अपने आप में अनेक रहस्युं को छिपाए हुए है | इसीलिए गंगोलीहाट को गुफाओं की नगरी के नाम से भी जाना जाता है |

 

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Apr
24

उत्तराखंड का एक औषधीय वृक्ष ‘तिमूर’ ( जेंथेजाइलम अरमेटम )

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उत्तराखंड राज्य अपनी वन सम्पदा और प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण समस्त संसार में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है | यहाँ के पावन वातावरण में अनेक प्रकार की जड़ी बूटियां उत्पन्न होती हैं जो हर पल मानव के लिए उपयोगी सिद्ध होती हैं | ऐसी ही एक औषधीय गुणों से युक्त वृक्ष का नाम है ‘तिमूर’, जो यहाँ पर बहुतायत से पाया जाता है |

यह वृक्ष उत्तराखंड में लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई पर पाया जाता है | इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम ‘जेंथेजाइलम अरमेटम’ (Zanthoxylum Armatum or also known with other bilogical names such as Zanthoxylum Alatum or Zanthoxylum Americanum or Zanthoxylum Oxyphyllum) है | परन्तु इसे कुमाओं में ‘तिमूर’ (Timur), गढ़वाली में ‘टिमरू’ (Timru) और संस्कृत में तेजोवटी (Tejowati in Sanskrit) के नाम से जाना जाता है | झाड़ीनुमा इस वृक्ष की लम्बाई लगभग 10 -12 मीटर तक होती है | यह सम्पूर्ण वृक्ष अपने आप में औषधीय गुणों से परिपूर्ण है | झाड़ीनुमा इस वृक्ष का जड़ से लेकर तना,छाल,पत्ती,बीज ही नही अपितु फूल भी मानव शरीर की तमाम व्याधियुं के लिए रामबाण साबित होता है |
जिस प्रकार मैदानी क्षेत्रों में नीम में तमाम गुण पाए जाते हैं, उसी प्रकार ‘तिमूर’ को पहाड़ का नीम कहा जा सकता है | सामान्य तौर पर इसकी टहनियुं का इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों में दातून के लिए किया जाता है | तिमूर के दातून से दांत सम्बन्धी सभी रोग दूर हो जाते हैं | इसका नित्य प्रयोग दांतों को सुन्दर व मजबूत बनाता है | पायरिया जैसे रोग के लिए यह गुणकारी साबित हुआ है | ‘उत्तराखंड हिमालयी आजीविका सुधार परियोजना’ प्रबंधक के० सी० भट्ट का कहना है की तिमूर को ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अर्थोपाजन का बेहतर जरिया बनाने के लिए कार्य योजना तैयार की गयी है | इसकी खेती के लिए काश्तकारों को तैयार किया जा रहा है | उनके अनुसार इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन  से सुखद तथ्य सामने आये हैं | इसके बीजों का प्रयोग माउथ फ्रेशनर,क्रमिनाशक,पेट सम्बन्धी रोगों के लिए तो होता ही है इसके बीज का बाहरी छिलका मसाले के रूप में भी प्रयोग किया जाता है |
इसके बीजों में सुगन्धित तेल की भरपूर मात्रा पायी जाती है |  इसके तेल में ‘लीनानूल’ नामक रसायन पाया जाता है, जो ‘एंटीसेप्टिक’ है अनेक दवा बनाने वाली कंपनी में इसकी बहुत मांग है | इसकी पत्तियुं का चूर्ण दातों को साफ़ रखता है | यह वृक्ष रक्तचाप नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण  भूमिका निभाता है | इसकी मोती टहनियुं को नियमित हथेलियुं में दबाकर रक्तचाप नियंत्रित होता है | इस वृक्ष को खेतों की मेड़ों में लगाने से जंगली जानवरों से खेतों की रक्षा की जा सकती है और आय भी उपार्जित की जा सकती है | सरकार द्वारा भविष्य में इसकी खेती के लिए विशेष योजनायें संचालित करने का कार्यक्रम है | इससे गाँव के बेरोजगार लोगों को वर्ष भर रोजगार भी मिल सकेगा और साथ-साथ लगातार हो रहे पलायन पर कुछ हद तक ब्रेक भी लगेगा |

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